रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबालकांड ५९
“इसके पश्चात् विश्वामित्र ने उस शुन शेप को बडे प्रेम से अपने पास बुलाकर
कहा--'मै तुम्हें दो मंत्र देता हूँ । तुम सतत उनका जप करते रहो । वे (मंत्र) तुम्हारी
रक्षा करेंगे और अवरीष का यज्ञ भी सफल हो जायगा ।' यो कहते हुए उन्होने उसे दो
मंत्रो का उपदेश किया ।
“दूसरे दिन राजा अपनी यज्ञ-भूमि में पहुँच गया । उसने उस निर्मल आत्मा (शुन -
शेप) की पूजा आदि करके उसे यूपकाष्ठ से बाँध दिया । तब वह मुनि-पुत्र अत्यत शात
तथा निश्चल चित्त से उन मंत्रो का जप करने लगा । तब देवेन्द्र ने वहाँ आकर अवरीष
का यज्ञ सफल बनाया तथा रुचि मुनि के पुत्र को चिरंजीवी बनाकर देवताओ के साथ
(अपने लोक में) चला गया ।
“एक हजार वर्ष तक घोर तप करने के उपरान्त ब्रह्मा ने विश्वामित्र को दर्शन दिये,
और बोले—'तुम्हारी तपस्या सफल हुई । तुम्हें ऋषित्व प्राप्त हो गया ।'
“उनके चले जाने के पश्चात् भी विश्वामित्र अत्यत निष्ठा के साथ तपस्या करने
में ही संलग्न रहे । तब कामरूप धारण करने में चतुर, कामदेव का कमनीय वाण ही
अप्सरा के रूप में प्रकट हुआ हो, ऐसा दिखाई देनेवाला ललित योवन-कला-विलास से युक्त
मेनका (अप्सरा) जलक्रीडा करके वहाँ आई । उसका जूडा शिथिल हो रहा था । मनोहर
नेत्र, स्निग्ध कपोल, मंत्रमुग्ध करनेवाला मुख, माणिक्य के-से ओठ, मधुर-मद मुस्कान, स्वर्ण
कलश के समान कुच, सोलहो कलाओ से परिपूर्ण काति, स्वर्ण-चूर्ण झरनेवाले बाहुमूल,
ललित रोमराजि, सिंह की-सी कटि, पुन्नाग के पुष्प के सदृश नाभि, गुरु नितब, तथा काम-
विकारो को उद्दीपन करनेवाले ऊरुभाग से युक्त वह सुदरी विश्वामित्र के सामने उपस्थित हुई ।
अपने शरीर