रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 78, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें४८ रंगनाथ रामायण
“इसपर वसिष्ठ के पुत्र ने कहा—‘राजन्, तुम्हारे-जैसे दुर्मतियो के अतिरिक्त दूसरां
कोई निर्मल चित्तवाला व्यक्ति ऐसे यज्ञ की बात सोच भी सकता है ?' मुनि-पुत्र के यह
कहने पर गजा ने उपेक्षा से कहा—'आपके पिता ने यज्ञ कराना अस्वीकार कर दिया है,
और आप भी अस्वीकार करते हैं । मेरे हित की चिंता न करनेवालो से अब मेरा क्या
सबंध ? मै किसी और से यह यज्ञ कराऊँगा ।'
“तव रुष्ट होकर उस पुण्यात्मा ने कहा—'तुम चाडाल हो जाओ ।' तुरत राजा का
रूप ऐसा विकृत हो गया, मानो उसका दीप्तिमान् तेज वासिष्ठ की क्रोधाग्नि से भस्म हो
गया हो । उसका शरीर काला हो गया । उसके शरीर पर के वस्त्र काले हो गये । उसके
केश विखर गये । उसका रूप इतना मलिन हो गया, मानो उसके स्पर्श-मात्र से दूसरा भी
मलिन हो जायगा । उसके शरीर पर रहनेवाले कान्तिमान् मणिमय स्वर्णाभरण लोहवत
हो गये । उसके रूप, रग, वाणी आदि चाडाल-जाति के अनुरूप हो गये ।
“इस प्रकार राजा को भयकर चाडाल-रूप धारण किये हुए देखकर नागरिक, सेवक,
अमात्य तथा वधु-वर्ग ने उसे त्याग दिया । तब राजा अत्यन्त भयभीत होकर लोगो (के
मार्ग) से वचता हुआ अपने-आपको छिपाता हुआ धीरे-धीरे महातेजस्वी विश्वामित्र
मुनि के पास जा पहुँचा । उसे देखकर गाधि-पुत्र का हृदय दया से उमड आया । वे
बोले—'अयोध्या का शासन करनेवाले, तुम्हें यह चाण्डालत्व कैसे प्राप्त हुआ ?'
“तब राजा ने हाथ जोडकर कहा—'हे महात्मा, मैंने वसिष्ठ से सशरीर स्वर्ग-
गमन का यज्ञ कराने की प्रार्थना की थी, तो उन्होने अस्वीकार कर दिया। उनके पुत्र ने
कहा कि जब वसिष्ठ की ऐसी सम्मति है, तब यज्ञ हो नही सकता । इसपर मैने दूसरो
से यज्ञ सपन्न करवा लेने का विचार प्रकट किया, तो अत्यन्त क्रुद्ध होकर उन्होने मुझे चाण्डाल
वन जाने का शाप दिया । इसी कारण मुझे यह रूप मिला है । मैने जो यज्ञ करने
का सकल्प किया है, उसे अवश्य पूरा करूँगा । विपत्ति में भी मै असत्य नही बोलता ।
भविष्य में भी किसी भी प्रकार से मैं सत्य का पालन करूँगा । मैने अबतक कितने ही
यज्ञ किये, कितने ही धर्म-सबधी कार्य किये और सुख-समृद्धि प्राप्त की । मैने गुरुओ से
प्रार्थना की, परन्तु उनकी कृपा न रहने से यह धर्म-कार्य पूर्ण नही हो सका । दैव-वल के
अभाव में पुरुषार्थ में भी दोष आ जाता है । हे अनघ, आप मेरे लिए ईश्वर-तुल्य है ।
किसी भी प्रकार आप मेरी रक्षा कीजिए ।'
“तव विश्वामित्र ने उसे देखकर कहा—'हे राजन्, अब तुम दुःख मत करो । तुम्हें
दीन जानकर मैं त्रिकरण शुद्धि (पवित्र मन, वचन एव शरीर) से तुम्हें शरण दे रहा हूँ ।
में मुनियो को बुलाकर तुमसे यज्ञ कराऊँगा और तुम्हें सशरीर स्वर्ग भेजूँगा, जिससे तुम्हारी
प्रतिज्ञा झूठी न हो । मैं तुम्हें पवित्र वनाऊँगा ।' इस प्रकार कहकर उन्होने अपने शिष्यो
से कहा—'तुम लोग तुरत जाओ और त्रिशकु के यज्ञ के लिए ऋत्विजो तथा मुनियो को
लेकर शीघ्र आओ ।'
सभी शिष्य तुरत गये और श्रेष्ठ मुनियो को साथ लिये हुए विश्वामित्र के पास
आकर बोले—'हे अनघात्मा, हम सभी मुनियो को वडी प्रसन्नता से ले आये है । वसिष्ठ के