रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 86, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें५६ रंगनाथ रामायण
बल को आहुति के रूप में निगलने के लिए उद्यत हो । राम जब उस धनुष की डोरी
चढ़ाने का उपक्रम करने लगे, तब विश्वामित्र बोले—‘राम अपनी समस्त शक्ति से सपन्न
होकर शिवजी के धनुष की प्रत्यच्च चढ़ा रहे हैं । हे धरती, तुम दोलायमान मत होओ ।
हे शेषनाग, तुम विचलित मत होओ । हे दिग्गजो, तुम सावधान रहो ।'
इसी समय राघव ने धनुष की डोरी चढ़ाई और अपने भुज-बल का परिचय दिया ।
वे जनक से बोले—‘हे भूपाल, यह धनुष बहुत ही पुराना, कमजोर, और घटिया है ।
यदि वाण का सधान किया जाय, तो यह टिक नही सकेगा । इसी धनुष की आपने इतनी
प्रशसा की थी ?'
इस प्रकार कहते हुए (राम ने) सुर, खेचर, भूसुर, किन्नर, नर तथा नृपतियों के
समक्ष धनुष की ऐसी टंकार की, मानो वह सब दिशाओ में उनकी विजय की घोषणा कर
रही हो । इसके पश्चात् उन्होंने चाप के गुण को (धनुष की प्रत्यचा को) आकर्णात् इस
प्रकार खींचा, मानो सीता के गुण उनके कानो तक पहुँच गये हो । (फिर) उन्होंने
अपनी मुट्ठी की पकड़ इस तरह ढीली कर दी, जैसे राक्षसो की पकड़ (शक्ति) ढीली
पड़ गई हो । तुरंत वह धनुष अरराकर टूट गया । दिशाएँ उस ध्वनि से गूँज उठीं ।
धनुष के टूटते ही सभी राजाओ का अभिमान भी चूर-चूर हो गया, सारी पृथ्वी में दरारें
पड़ गईं, दिग्गज कुचल गये, शेषनाग धँस गया, समस्त भूत भीत हो गये और सभी
लोक थर्रा उठे । उस कठोर ध्वनि को सुनते ही जनक, राम, लक्ष्मण तथा विश्वामित्र को
छोड़कर शेष सभी लोग मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े । जनक महाराज हर्ष तथा
विस्मय के साथ कौशिक को देखकर बोले—‘मैं अपने वचन के अनुसार विना विलव के '
ही अपनी पुत्री का विवाह इस महान् व्यक्ति से कर दूँगा । महाराज दशरथ को विवाह
के लिए सादर निमत्रण भेजूँगा ।'
इस प्रकार कहने के पश्चात् उन्होंने तुरंत अपने प्रिय मंत्रियो को बुलाकर दशरथ
को सारा समाचार सुनाकर उन्हें शीघ्र लिवा लाने के लिए भेजा । वे भी जवनाश्वो (तेज
घोड़ो) पर रवाना हुए और तीन दिन की यात्रा के उपरान्त साकेत (अयोध्या) पहुँच गये ।
वहाँ अपने पुत्रो की कुशल की चिंता में निमग्न राजा (दशरथ) को देखकर जनक के
मंत्री बोले—‘हे राजश्रेष्ठ, आपके पुत्र शौर्यनिधि रामचन्द्र ने कौशिक मुनि के यज्ञ की रक्षा
की और जनक महाराज का यज्ञ देखने (मिथिला) आये । वहाँ मुनि तथा अन्य राजाओ
के समक्ष उन्होंने उस शिव-धनुष का सधान करके उसे सहज ही तोड़ डाला, जिसे उठाना
सुरो तथा असुरो के लिए भी असंभव है । इसपर महाराज जनक ने अपनी पुत्री सीता का
विवाह राम के साथ करने का निश्चय किया है । उस विवाह में आपको सादर आमंत्रित
करने के लिए हमें भेजा है । इसलिए आप शीघ्र पधारें ।'
यह समाचार सुनकर राजा आनन्द-सागर में डूब गये । उन्होंने नगर-भर में विवाह
की सूचना देने के लिए दूत भेजे और महाराज जनक के मंत्रियो को श्रेष्ठ रत्न, आ