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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 508 में से

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पृष्ठ 92

६२ रंगनाथ रामायण
उनके बछडे भी थे । ये गायें श्रेष्ठ वस्त्रो से सज्जित थी । गायो के साथ उनको दूहने
के लिए काँसे की दोहनी भी राजा ने दान में दी । इनके अतिरिक्त राजा ने स्वर्ण, भूमि
तथा रत्नादि दक्षिणा के साथ अलग-अलग (पुत्रो के हितार्थ अलग-अलग ब्राह्मणो को) दिये ।
इसी समय भरत का मामा युधाजित् वहाँ आ पहुँचा । वह अपने पिता कैकय-
नरेश की आज्ञा से भरत को ले जाने के लिए अयोध्या आया था। किन्तु पुत्रो के विवाहार्थ
दशरथ को मिथिला गये हुए जानकर वह सीधे मिथिला आ गया । दशरथ ने बडे
प्रेम से उसका आदर-सत्कार किया और कुशल-समाचार पूछे ।
दूसरे दिन स्नातक आदि विधियो को पूर्ण करने के पश्चात् (राम) अपने भाइयो
के साथ दशरथ के सम्मुख उपस्थित हुए । दशरथ ने उनका अलकार करने का आदेश दिया ।
(परिचारक राम का अलकार करने लगे) उनके सिर पर मुकुट, उदयाद्रि के शृग
के समान शोभा दे रहा था । उन्होने हाथो में ककण धारण किये, मानो वे भक्तो की
रक्षा के लिए बद्ध-ककण (कृत-सकल्प) हो रहे हो ।
उनके वक्ष पर हार ऐसे शोभ रहे थे, मानो उनके वक्षःस्थल से उत्पन्न चन्द्रकिरणें
चारो ओर छिटक रही हो । कटि-प्रदेश में कनक-वस्त्र ऐसे गोभित हो रहे थे, मानो पृथ्वी ने
उनके कनकावरण को धारण कर लिया हो । उनके कानो में कुडल ऐसे शोभ रहे थे,
मानो रावण के अत्याचार से पीडित अष्ट-दिक्पालो का यश दोनो ओर मोतियो के बहाने
अपनी विनती (श्रीराम को) सुना रहे हो । ऐसे सौदर्य से सपन्न उनके मुख की कान्ति
को बढाते हुए कस्तूरी-तिलक शोभित हो रहा था । उदित होनेवाले भानु के तेज के समान
विलसित, एव कुडल केयूर, मुकुट तथा हारो से मडित लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न के बीच
राम ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो दिक्पालको के मध्य इन्द्र विराज रहा हो ।
वहाँ (जनक के अत पुर में) जनक ने (अपनी) चारो कन्याओ को सुसज्जित करने
के लिए दासियो को आदेश दिया । उन्होने उन कन्याओ को दीप्तिमान् मणिपीठ
पर बिठाया, सुमगलियो के मगल-गीतो और गारिका तथा कीरो के कलरव के बीच प्रत्येक को
कुकुम, कस्तूरी, गोरोचन तथा जवादि की सुगधि से सुवासित उबटन लगाया । ककणो
की मृदु ध्वनियो से मुखरित कर-पल्लवो से उनके केशो में चपा का तेल लगाया, हरिचदन
का लेप किया और घनसार की सुगधि से युक्त कुनकुने जल से उन कन्याओ का
स्नान कराया, महीन कपडो से (उनके शरीर को) पोछा और गुलाबी रग के लहगो पर सुनहली
जरीदार अचलवाले वस्त्र पहनाये । (उसके बाद) उन्होने उनके जूडे ऐसे सुदर ढग से बाँधे
मानो समस्त शृगारो की राशि एकत्र कर दी हो । उन जूडो में जूही की कलियाँ
सजाई । कर्पूर तथा गुलाब-जल में कस्तूरी घोलकर (सारे शरीर पर) लेप किया, सुनहली
जरीदार कचुकी पहनाई तथा उनके वक्ष पर मरकत-मोतियो के हार पहनाये । फिर
उनके (कन्याओ) के कमनीय मुखो के सौंदर्य की वृद्धि करते हुए तिलक लगाये, कपोलो पर
मकरिका-पत्रो को रचा, नाक में बेसर पहनाये, रत्नो के कर्णफूल, मोतियो की वालियाँ
और माणिक्य के कुण्डल सजाये । सके पश्चात् (उनके पैरो में) मरकत के कड़े, पद्म-
राग जडे नूपुर तथा गोमेदक-जडे पाजेव पहनाये ।