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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 508 में से

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पृष्ठ 87

बालकांड ५७
तथा अपने अमात्यो को बडे आदर के साथ बुला भेजा और अत्यन्त नम्रता से बोले--
“राम और लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ विदेह के घर में है । राम ने राजाओ की प्रशसा
प्राप्त करते हुए इन्दु-शेखर (शिव) का कठोर धनुष तोडा है । अत महाराज जनक ने
सीता का विवाह राम के साथ करने का निश्चय करके, विवाह के लिए हमें आमंत्रित करने
के लिए इन्हें (मंत्रियो को) भेजा है । क्या जनक के साथ (हमाग) सबंध प्रजा को
स्वीकृत होगा ?” तब सबने उस सबंध की प्रशसा की ।
दूसरे दिन वसिष्ठ आदि मुनियो, बधु-मित्र तथा अन्य राजाओ के साथ राजश्रेष्ठ
दशरथ ने रथ में बैठकर बडे आनन्द से मिथिला के लिए प्रस्थान किया । उनके साथ
रमणीय दिव्यावर, कमनीय रत्न-समूह, हाथी, रथ, तुरग तथा पदचर सेना, परम आप्त
मत्री तथा पवित्र स्त्रियो के समूह थे । राजा के पार्श्व में उनके पुत्र भरत तथा शत्रुघ्न
हाथियो पर, मोतियो के छत्र की छाया में चल रहे थे । मगल-वाद्यो के घन-नाद से
सभी दिशाएँ मुखरित हो रही थी । इस प्रकार, जहाँ-तहाँ ठहरते हुए, चार दिन की यात्रा
के पश्चात्, दशरथ (अपने परिवार के साथ) मिथिला पहुँच गये ।
तब महाराज जनक सूर्यवश में श्रेष्ठ राजा (दशरथ) की अगवानी करने आये और
बडे उत्साह एव आदर के साथ उन्हें ले जाकर उनका उचित रीति से आदर-सत्कार
किया । उसके बाद सभी मुनियो को प्रसन्न करते हुए वे बडे हर्ष से बोले--“महाराज,
अपनी पुत्री का विवाह आपके पुत्र के साथ करने का निश्चय करके मैने आपको निमंत्रित
किया है । आपके आगमन से मैं कृतार्थ हुआ । इन वसिष्ठ, वामदेव आदि मुनियो के
आगमन से मेरी इच्छाएँ पूर्ण हो गई । मेरा जन्म सफल हुआ । मेरा वश पवित्र हुआ ।
रविकुल के उत्तम नरेश के साथ सबंध करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ। कल ही विवाह का
शुभ मुहर्त्त है । आप अपने इष्ट-मित्रो को बुलाकर उचित तथा आवश्यक कार्य सपन्न कीजिए ।”
उनके वचन सुनकर दशरथ ने बडे प्रेम से कहा—‘ऐसा ही हो’ और जनक के
द्वारा सपन्न कराये गये जनवासे में प्रसन्न-चित्त से ठहरे । तब विश्वामित्र राम तथा लक्ष्मण
के साथ वहाँ आ पहुँचे । दशरथ ने उस मुनि को प्रणाम करके बडे विनय से कहा--“हे
अनघात्मा, आपकी कृपा से मैं धन्य हुआ ।” तब कौशिक बोले--“हे राजन्, तुम अकलक-
चरित्र हो । अपने पुण्य-कार्य से तुम पवित्र हो गये हो । रविकुलोत्तम राम को पुत्र के रूप
में प्राप्त करके तुम विशेष रूप से पवित्र हुए हो । उस दिन तुमने यज्ञ की रक्षा करने
के लिए सद्बुद्धि से अपने पुत्र राम-लक्ष्मण को मुझे दिया था । यह लो, तुम्हारे पुत्र कुशल-
मगल से है । उन्हें स्वीकार करो ।” इतने में दोनो (राम-लक्ष्मण) ने राजा को प्रणाम किया ।
राजा ने उन्हें आशीर्वाद देकर बडे स्नेह से गले लगा लिया ।
दशरथ उस दिन अपने नित्य-नैमित्तिक वैदिक कर्मों से निवृत्त हुए । दूसरे दिन
जनक अपने मंत्रियो के साथ विवाह-मडप में आ विराजे । अपने पुरोहित शतानन्द को
देखकर कहा—‘हे अनघात्मा, मेरे भाई कुशध्वज को भी इस विवाह में अवश्य आना
चाहिए । वह इक्षुमती के किनारे साकाश्यपुरी में रहता है ।' यो कहकर उन्होने (अपने
भाई को) बुला भेजा ।
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