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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 508 में से

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पृष्ठ 89

बालकांड ५९
उन ऋषियो को अतुल धन देकर उनका सम्मान किया और वे विदा हुए । मातृहीन
वह शिशु भूख से व्याकुल होकर जब रोने लगा, तब इन्द्र वहाँ आया और उसकी भूख
मिटाने के लिए अपना अंगूठा उस शिशु के मुंह में दे दिया । शिशु उससे अमृत-पान करने लगा ।
सुधा-पान करने के कारण इन्द्र ने बुधजनो के द्वारा उस शुभलक्षण का नाम
मान्धाता रखवाया और इन्द्र-लोक को लौट गया ।
“मान्धाता पूर्ण-चन्द्रप्रभा-सम दीप्तिमान् होकर बढने लगा । यौवन के आते ही वह
अत्यन्त शौर्य-सपन्न हुआ और रावण आदि (बलशाली) राजाओ को कई युद्धो में परास्त कर
समस्त भूमडल का शासक बन बैठा । विष्णु की भक्ति करते हुए इन्द्र का वल प्राप्त करके
उसने बहुत-से यज्ञ किये । उस राजा के विमलागी नामक स्त्री से अत्यन्त तेजस्वी मुचुकुद
और सुसंधि नामक दो पुत्र और पचास पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं । कन्याओ के युवावस्था को
प्राप्त होते ही राजा ने उनका विवाह सौभरि नामक मुनि के साथ कर दिया । उन कन्याओ का
अग्रज हरि-भक्ति में जीवन व्यतीत करते हुए स्वर्ग सिधारा । उसके भाई सुसंधि ने पुण्य-
कार्य करते हुए (चिर काल तक) राज्य का पालन किया । उस सुसंधि के ध्रुवसंधि नामक
पुत्र उत्पन्न हुआ । उसके पुत्र प्रसेनजित् के भरत नामक पुत्र हुआ और भरत के असित
नामक पुत्र हुआ ।
“असित के राज्य-काल में अत्यत पराक्रमी हैहय-वश में भयंकर आकारवाला ताल-
जघ नामक वीर उत्पन्न हुआ । उसने असित के साथ घोर युद्ध किया और युद्ध में पराजित
करके उसका वध कर डाला । राजा की दोनो रानियो ने अत्यन्त दुःखी होकर
राज-काज का सारा भार मन्त्रियो को सौंप दिया और शान्ति से जीवन विताने लगी । उन दोनो
रानियो में कालिंदी नामक रानी गर्भवती थी । सौतिया डाह के कारण दूसरी रानी से
यह सहा नही गया और उसने उस गर्भ को हानि पहुँचाने के उद्देश्य से विष का प्रयोग किया ।
विष-प्रयोग से गर्भ-पात तो नही हुआ, किन्तु उसके प्रभाव से वह कड़ी वेदना का
अनुभव करने लगी । तब कालिंदी हिमालय में च्यवन ऋषि के यहाँ गई और वडी
भक्ति से उन्हें प्रणाम करके अपना सारा वृत्तान्त कह सुनाया । मुनि ने उसके दुःख की कथा
सुनकर कहा-'बेटी, तुम मेरी पुत्री के समान हो, डरने की कोई बात नही है ।' उन्होने
उसे स्नेह से उठाया और अपनी दिव्य-दृष्टि से सारी स्थिति को समझकर कहा-‘हे
कालिंदी, तुम्हारे अत्यत धार्मिक, अतुल तेजस्वी, महान् चेता, कीर्त्तिवान्, वंशोद्धारक, रूपवान्
तथा शत्रुदमन पुत्र उत्पन्न होगा ।' इस प्रकार मुनि का आशीर्वाद प्राप्त करने के पश्चात्
वह रमणी मुनि को प्रणाम करके अपने घर लौटकर प्रसन्न-चित्त रहने लगी ।
“निदान शुभ मुहूर्त्त में उस शुभागी के एक पुत्र उत्पन्न हुआ। कालिंदी अत्यन्त हर्षित हुई। वह
अपने शत्रुओ का दमन करके वडे आनन्द से राज करने लगा । उसका नाम सगर था। उसका पुत्र
असमंजस था। असमंजस का पुत्र अंशुमान था, जिसका पुत्र राजा दिलीप था। दिलीप के पुत्र पुण्यात्मा
भगीरथ थे, जिन्हें ककुत्स्थ नामक पुत्र हुआ। उसके पुत्र रघु महाराज के पुरुषादक नामक पुत्र हुआ ।
उसके उज्ज्वल कीर्त्तिमान् नामक पुत्र हुआ । उसके पुत्र शश्वण था, जिसके पुत्र सुदर्शन के अग्निवर्ण नामक
पुत्र हुआ, जिसका पुत्र ऋतुपर्ण था। ऋतुपर्ण का पुत्र मरु था और उसका पुत्र शीघ्रग था। शीघ्रग के