रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 88, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंबड़े कौतूहल के साथ कुशध्वज वहाँ आया और शतानन्द तथा महाराज जनक को
बड़ी श्रद्धा से प्रणाम किया और महाराज की आज्ञा पाकर उचित आसन पर बैठा । तब
जनक ने सुदामन नामक अपने मंत्री से कहा—'तुम शीघ्र जाकर महाराज दशरथ को
उनके सचिव, पुत्र, वसिष्ठ आदि मुनियो के साथ सादर लिवा लाओ ।' उसने दशरथ के सम्मुख
पहुँचकर निवेदन किया—'महाराज, राजा जनक ने मुझे आपकी सेवा में भेजा है । आप
कृपाकर अपने पुरोहित, पुत्र तथा अमात्यो के साथ विवाह-मंडप में पधारें ।' राजा दशरथ
सपरिवार वहाँ पहुँचे और (उचित आसन पर) आसीन होने के पश्चात् जनक से बोले—
'महाराज, हम इक्ष्वाकुओ के लिए मुनि वसिष्ठ गुरु तथा देवता हैं । वे सर्वज्ञ तथा
जितेन्द्रिय हैं । वे ही हमारे पुरोहित रहकर सस्कार करायेंगे ।'
३४ दशरथ का वंश-क्रम
तब मुनि वसिष्ठ दशरथ के वंश का वर्णन करते हुए कहने लगे—'हे राजन्, निर्गुण
ब्रह्म ने सगुण रूप धारण करके, अपनी लीला प्रसारित करने के निमित्त, अपने नाभि-कमल में
ब्रह्मा को उत्पन्न किया । इस प्रकार हरि के पुत्र ब्रह्मा उत्पन्न हुए । ब्रह्मा के पुत्र मरीचि हुए ।
मरीचि के पुत्र कश्यप हुए और उनसे सूर्य उत्पन्न हुआ । सूर्य का पुत्र था वैवस्वत मनु ।
उसका पुत्र इक्ष्वाकु नामक राजा बहुत विख्यात हुआ । इक्ष्वाकु का पुत्र कुक्षि हुआ,
और कुक्षि का पुत्र विकुक्षि उत्पन्न हुआ । विकुक्षि के पुत्र वाण के सनरप्य नामक पुत्र हुआ ।
उसके पृथु नामक पुत्र हुआ, जिसका पुत्र त्रिशंकु हुआ, जो बड़ा ही चतुर राजा था ।
उसके पुत्र हरिश्चन्द्र के रोहिताश्व नामक पुत्र हुआ, जिसका पुत्र दुदुमार हुआ । दुदुमार का
पुत्र युवनाश्व था, उसकी दो रूपवती रानियाँ थीं । किन्तु उसके संतान नहीं थी । इसलिए
राजा ने संतान की प्राप्ति की इच्छा से बहुत-से श्रेष्ठ मुनियो को बुला भेजा और उन
महान् आत्माओ की अर्घ्य-पाद्य आदि से पूजा की और उनसे निवेदन किया—'हे महात्माओ,
आप कृपा करके मुझे संतान-प्राप्ति का वर दीजिए ।' तब बड़ी प्रसन्नता से मुनि बोले—
'हे राजन्, तुम भक्ति-युक्त हो ऐन्द्र-यज्ञ करो, तो तुम्हें संतान-प्राप्ति होगी ।'
“राजा ने यज्ञ के लिए आवश्यक उपकरणो को तुरंत एकत्र कराया । संयमी
मुनियो ने बड़े हर्ष के साथ राजा के संतान-प्राप्ति हेतु ऐन्द्र नामक यज्ञ प्रारंभ किया ।
यज्ञ पूरा हुआ और मुनियो ने अभिमंत्रित जल मे पूर्ण कुंभो को यज्ञ-शाला में एक ओर रखा ।
उसी दिन रात्रि के समय राजा ने प्यास से पीड़ित होकर, भूल से यज्ञ-शाला में रखे हुए
कलशो में से लेकर अभिमंत्रित जल पी लिया ।
“(दूसरे दिन) जल-रहित कलशो को देखकर मुनि कहने लगे—‘कलशो का जल
किसने पी लिया ? जल कहाँ गया ?’ जब उन्होंने ध्यान लगाकर देखा, तब उन्हें ज्ञात हुआ
कि राजा ने ही जल पीया है । इस विचित्र दैव-माया को देखकर सभी मुनि आश्चर्य-
चकित हो गये । राजा ने गर्भ धारण किया और एक बालक को जन्म देकर मर गया । ऋषि अत्यन्त
दुःखी हुए और मंत्र शक्ति के प्रभाव से युवनाश्व को फिर सजीव बनाया । युवनाश्व जीवित हो उठा ।
“चक्रवर्त्ती के शुभ लक्षणो मे युक्त उस बालक को देखकर ऋषियो ने विचार किया
कि वह सप्तद्वीपो पर राज्य करेगा । इससे वे बहुत प्रसन्न हुए । युवनाश्व ने बड़े प्रेम से