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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 508 में से

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पृष्ठ 84

५४ रंगनाथ रामायण
हो गई । यह देखकर इस पृथ्वी के कई नरेशो ने उस कन्या के साथ विवाह करने की
प्रार्थना की । तब मैंने उन से कहा--'इस चन्द्रमुखी को प्राप्त करने के लिए एक कन्या-
शुल्क नियत है । (वह शुल्क) यह शिव-धनुष है । जो नरेश इस धनुष पर प्रत्यचा चढाकर
अपने भुज-बल का परिचय देगा, उसी को में अपनी पुत्री बडे हर्ष से दूंगा ।' बहुत-से
राजा आये, किन्तु कितने ही राजा उस धनुष को उठाने में भी असमर्थ होने के कारण
लज्जा से अपना सिर भी न उठा सके । इसलिए उन राजाओ ने सोचा--'पुत्री को देने
का वचन देकर, कोदण्ड का दुस्साध्य प्रतिबन्ध लगाकर जनक ने हमें अच्छी तरह भ्रम में
डाल दिया है । हम उन्हें युद्ध में परास्त करके उनसे प्रतिशोध लेंगे ।' इस प्रकार सोचकर
वे अपनी विशाल सेना के साथ एक वर्ष तक हमारे किले पर घेरा डाले रहे । जो अन्न
तथा खाद्य-सामग्री हमने पूर्व से किले में संचित करके रखी थी, सब समाप्त हो गई ।
अतः मैंने मन में विचार करके देवताओं की प्रार्थना की । उनकी कृपा से प्राप्त चतुरंगिनी
सेना के साथ मैंने शत्रु-सेना पर आक्रमण किया । इस सेना का सामना न कर सकने
के कारण कुछ लोग भीत होकर भाग खड़े हुए तथा कुछ मेरे साथ घोर युद्ध करके
हार गये और तितर-बितर हो गये । यदि राम अपनी आश्चर्यजनक शक्ति से उस शिव-
धनुष का संधान कर सकें, तो मे अपनी पुत्री का विवाह उनके साथ कर दूंगा ।"
३३ शिव-धनुर्भंग
इसके पश्चात् जनक ने धनुष की पेटी ले आने के लिए दस हजार बलिष्ठ सेवकों
को भेजा । वह लोहे की पेटी बहुत ही विशाल तथा आठ पहियों से युक्त थी । वे सभी
बलवान् उस पेटी को अपना सारा बल लगाकर इस प्रकार खींचकर लाने लगे, मानो मेरु
पर्वत को ही लिये आ रहे हों । यह देखकर जनक के अन्त पुर के परिचारक तथा परि-
चारिकाएँ, जानकी, उर्मिला तथा जनक की पत्नी के निकट जाकर बोलीं--“देवियो, हमारा
एक निवेदन सुनें । हमारी राज-सभा में गाधि-पुत्र कौशिक के साथ दो आजानुबाहु, देवों
तथा गंधर्वों से भी अधिक तेजस्वी, दो उत्तम नर-रत्नों को आया हुआ देखकर महाराज
जनक ने मुनि से प्रश्न किया कि ये कौन हैं ? तब कौशिक ने अत्यन्त हर्ष से कहा- 'हे
राजन्, ये दशरथ के पुत्र हैं । शिव-धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए यहाँ आये हैं ।
इसलिए आप योग्य व्यक्तियों को भेजकर धनुष को मँगवाइए ।' तब राजा ने अपने मंत्रियों
को बुलाकर धनुष को लाने के लिए भेजा है । हम वह दृश्य गवाक्ष से देख सकती हैं ।
आप भी शीघ्र चलकर देखिए ।"
परिचारिकाएँ जब राम के कुल, रूप, शौर्य तथा गुणों का वर्णन कर रही थीं,
तब सीता को ऐसा भान हो रहा था, मानो उनके कानों में सुधा की वर्षा हो रही हो ।
उन्हें रोमांच हो आया । उन्हें प्रीति तथा भय का अनुभव होने लगा । वे सिर झुकाये
खड़ी रहीं । लज्जा से अभिभूत उस सुन्दरी को चुपचाप खड़ी देखकर सखियाँ उनकी परि-
चर्या करने लगीं । गुलाब-जल में कुंकुम घोलकर एक ने उनके कपोलों पर सुन्दर ढंग से
'मकरिका-पत्र' की रचना की (चित्र बनाये) । दूसरी ने जवादियुक्त चंदन का लेप किया ।
एक दूसरी परिचारिका ने माथे पर कस्तूरी का तिलक लगाया और एक उनके सामने