रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 91, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशरथ ने इन बातो को सुनकर वडे उत्साह से वसिष्ठ तथा गाधि-पुत्र को देखकर
कहा—'आप जनक महाराज से कहिए कि वे उर्मिला का विवाह सौमित्र से तथा राजा
कुशध्वज की कन्याओ का विवाह उत्तम गुण-सपन्न भरत तथा शत्रुघ्न के साथ कर दें ।'
तब उन्होने राजा जनक को सारी बातें कह सुनाई और उनकी सम्मति प्राप्त करके वडे
हर्ष से राजा दशरथ को जनक की स्वीकृति कह सुनाई ।
दूसरे दिन विवाह के लिए अनुकूल शुभ लग्न था । अत जनक ने उत्तर फाल्गुनी
नक्षत्र में विवाह का शुभ-मुहूर्त्त ठहराया और नगर तथा अत पुर को सजाने के लिए परि-
चारको को भेजा । उन्होने चदन-कस्तूरी-मिश्रित जल से (नगर के) मार्गों पर छिडकाव
करके उन्हें सुगधमय बनाया । चीनाशुको (रेशमी वस्त्र) के वितान सजाये, मणि-तोरण-
ध्वजाओ से सारा नगर अलकृत किया, फलो के भार से अवनत कदली के पेडों तथा सुपारी
के पत्तो से प्रत्येक घर तथा कक्षो के द्वारो को सजाया और विशाल चबूतरो को जवादि
से लीपकर उनपर चौक पूरे । मणिकचन-कलशो से युक्त सौधो के गोपुरो का समूह
अगणित सूर्यो का भ्रम उत्पन्न कर रहा था । सारा नगर मणि-दीपो, वारभी (धूप) के
धुएँ तथा पुष्प-कलापो का भार वहन कर रहा था । इस प्रकार नगर को अलंकृत करने
के पश्चात् उन्होने अत पुर को बडी निपुणता से सजाया । फिर उन्होने शिल्पकारो द्वारा
विवाह-वेदी का निर्माण कराने का आदेश दिया । शिल्पकारो ने मरकत की भूमि पर सोने
के स्तम्भ स्थापित किये, उनपर नीलमणि के कार्निस लगाये और उनपर माणिक्य की धरन
(शहतीर) बैठाई । सुदर ढंग से नक्काशी करके बनाये गोमेदक के छज्जे बनाये और
ऊपर वज्र (हीरे) का गारा किया । (उस मडप के) चार विशाल किवाड बनाये गये, जो
मणि तथा स्वर्ण के बने थे । (मण्डप में) सोने के सुन्दर चित्र बनाये गये । नीलमणि
के हाथी तथा स्फटिक के सिंहो से सुसज्जित सोपान रचे गये । उशीर (खस) का विशाल शामियाना
बनाया गया, जिसके मध्य में फूलो की लडियाँ लटकाई गईं । विवाह के लिए
मरकत की वेदी बनाई गई। उसे कस्तूरी से लीपकर उसपर मोतियो के चौक पूरे गये ।
इस प्रकार सुसज्जित वह विवाह-मण्डप दर्शको को नेत्रोत्सव प्रदान कर रहा था ।
तब वसिष्ठ, विश्वामित्र तथा अन्य पुण्यात्माओ को देखकर जनक ने कहा—'आप
लोग ही मिथिला तथा अयोध्या के कर्त्ता (विधाता) हैं । अब आगे जो कार्य करना
उचित हो, उन्हें कराइए ।'
निरतर बजनेवाले मगल-वाद्यों के कलनाद तथा सुमगली स्त्रियो के मधुर गीतो
के बीच महाराजा दशरथ तथा उनके चारो पुत्र मणिपीठो पर बैठे । उन्हें तैल तथा उवटन
लगाकर उनका मगल-स्नान कराया गया । उसके उपरात माथे पर तिलक देकर उन्हें
चीनांशुक (रेशमी वस्त्र) तथा आभूषणो से अलकृत किया गया । (उन्हें देखकर) दशरथ
तथा उनकी पत्नियां आनन्द से फूली नही समाती थी । इसके पश्चात् उन्होंने पवित्र मन से
अपने पुत्रो के शुभ अभ्युदय के निमित्त गो-दान देने का निश्चय किया । प्रत्येक पुत्र के
हितार्थ उन्होने वेद-विधि के अनुसार सोलह हजार गायें श्रेष्ठ ब्राह्मणो को दान दी । वे
गायें धौत-खुर, कनक-श्रृंग, ताम्र-पुच्छ से अलकृत थी और सुन्दर दीखती थी । उनके साथ