रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ रंगनाथ रामायण
वायु-भक्षण करते हुए ग्रीष्म ऋतु में, आश्रम के बाहर, तथा जाड़े में जल-कुण्डों में खड़े
रहकर अत्यंत उग्र तप करने लगे ।
“इस प्रकार एक हजार वर्ष व्यतीत हो गये । एक दिन इन्द्र ने रंभा को देखकर
कहा—'हे सुंदरी, मैं तुमसे एक ऐसा कार्य कहूँगा, जिसमें देवताओं का हित निहित है ।
किसी तरह तुम कौशिक को काम-पीड़ित करके उनके तप में विघ्न डालो ।' तब रंभा ने
कहा—'हे देव, कौशिक क्रोध में मुझे शाप दे देंगे । इसीका मुझे भय होता है ।
ऐसे उग्र तप में लीन उस मुनि के पास पहुँचना क्या मेरे लिए संभव है ? हे शचीनाथ,
मैं आपसे क्षमा चाहती हूँ । मैं ऐसे महामूर्ख की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देख सकती,
आपके चरणों की सौगंध खाकर कहती हूँ । ऐसा मूर्ख कौन होगा, जो जान-बूझकर आग में
कूद पड़े ?'
यह सुनकर इन्द्र ने कहा—'यदि तुम्हें इतना भय है, तो मन्मथ और वसंत भी
तुम्हारे साथ जायेंगे, तुम जाओ ।' इन्द्र की इच्छा की अवहेलना न कर सकने के कारण वह
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