रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
“तब गगा उनके जटा-जूट के दक्षिण भाग मे बाहर निकली । उस मदाकिनी की
धारा में मुकुलित कमल ऐसी शोभा दे रहे थे, मानो वह (मदाकिनी) पाताल की ओर
देखकर अपनी दिव्य-दृष्टि से वहाँ के कपिल मुनि को पहचानकर, उनकी महिमा पर
आश्चर्य करती हुई हाथ जोड़े उनसे प्रार्थना करती हो कि (हे मुनि) आपको जिन भयंकर
व्यक्तियो ने दुःख दिया था, उन्हें सुगति प्रदान करने के लिए मैं आ रही हूँ, आप क्रोध
न करें । उस धारा में भँवर ऐसे पड़ रहे थे, मानो उस मुनि के क्रोध की कल्पना करके
मदाकिनी भय से व्याकुल हो रही हो । धारा के बीच कमल-पुष्पो के भीग जाने मे उनमें
बैठे न रह सकने के कारण भ्रमर आकाश में व्याप्त हो, इस प्रकार गुजार कर रहे थे,
मानो सगर-पुत्रो के पाप, वेग से आनेवाली मदाकिनी की धारा को देखकर इधर-उधर
भागते हुए शिवजी से विनती कर रहे हो कि (हे शिवजी) गगा हम पर आक्रमण करने
के लिए आ रही है, हम अब भागकर कहाँ जायें ? हंस आकाश-पथ में ऐसे मँडरा रहे थे,
मानो शिव के जटा-जूट से पृथ्वी पर उतरनेवाली गगा को धूप से बचाना चाहते हों।
उस नदी की सुन्दर तथा उत्तुंग लहरें ऐसी शोभा दे रही थी, मानो वे सगर-पुत्रो
के पाप-समूह को मिटानेवाले उस (नदी के) हाथ हो । धारा इतने अधिक फेन मे
व्याप्त थी, मानो भगीरथ की अनुपम कीर्त्ति समस्त संसार में व्याप्त होने के लिए एकत्र
हो रही हो । उस नदी का अतुल घोष क्रमशः बढ़ता हुआ सारे ब्रह्माण्ड तथा आकाश में
व्याप्त हो गया । इस प्रकार वह शिव के जटा-जूट मे विंदु-सरोवर में यह कहती हुई
उतरी कि मैं इस संसार के पापियो को पुण्य प्रदान करने के लिए आ रही हूँ । ब्रह्मा
आदि देवता उसकी स्तुति करने लगे । सुर तथा खेचर बडे उत्साह से यह दृश्य देखने लगे ।
गरुड तथा गंधर्व उसकी प्रशंसा करने लगे ।
“मदाकिनी की धारा की सात शाखाएँ हुईं । पावनी, ह्लादिनी, और नलिनी नामक तीन
शाखाएँ पूरव की ओर गईं । सीता, सुचक्षु तथा सिंधु नामक तीन शाखाएँ पश्चिम की
की ओर गईं । एक शाखा राजा भगीरथ के पीछे भूलोक की ओर चली । वह श्रेष्ठ
तथा विशाल जल-धारा आकाश-मार्ग में शरत्काल के वादल के समान शोभित हो रही थी ।
वह जल-धारा, पृथ्वी की तरफ इस प्रकार उतर रही थी, मानो स्वर्गकामी भूलोक-
निवासियो के लिए सीढ़ी लगी हो । उसकी तरगो की ध्वनि पृथ्वी तथा आकाश को गुंजा
देती थी । उस धारा में ऐसे भँवर पड़ रहे थे, मानो वह यह बताना चाहती हो कि मैं
(पृथ्वी) के समस्त पापो को उसी तरह नचा दूँगी (ध्वंस कर दूँगी) ।
“पृथ्वी पर उसके उतरते समय जल की बूँदें आकाश की तरफ ऐसे उछल रही थी,
मानो वे नक्षत्रो से मित्रता करना चाहती हो । उसका स्वच्छ फेन-समूह ऐसा सुशोभित
हो रहा था, मानो वह नदी (बडे हर्ष से) हँसती हुई यह कह रही हो कि में धर्मात्माओ
की पवित्र कीर्त्तियो के लिए योग्य स्थान हूँ । उस धारा में क्रीडा करनेवाली
मछलियाँ ऐसी दीख रही थी, मानो नदी कह रही हो कि मैं अपने असंख्य नेत्रो से पृथ्वी
की श्रेष्ठता देखूँगी । इस प्रकार भिन्न-भिन्न जलचरो से युक्त हो, वह नदी पृथ्वी पर
उतर आई ।
३८ रंगनाथ रामायण
“तब सौ-सौ सूर्यों की कान्ति के समान प्रकाशित होनेवाले, बहु-रत्न-खचित आभूषणो
की कान्ति-से सारे आकाश को दीप्तिमान् करने हुए, गज तथा विमानो-में आरूढ होकर
अमर, गवर्व तथा सिद्ध वडे कौतुक से इस दृश्य को देखने आये । उस प्रवाह-की-चंचल
गति को देखकर महानागो ने भी उनके सामने घुटने टेके ।-देवताओ ने-जप आदि-करके
उस नदी में स्नान किया और बहुत ही प्रसन्न हुए । अप्सराओ ने नृत्य किया, देवो तथा
मुनियो ने बडे हर्ष से उस नदी की पूजा-पुष्पो से की । उस पुण्य-नदी की धारा में
अमित पापी तथा शाप-पीडित जन स्नान करके स्वर्ग जाने लगे । देवता, अप्सराएँ, गवर्व,
दनुज, पन्नग, यक्ष, किन्नर आदि बडे उत्साह से भगीरथ के रथ के पीछे-पीछे चले ।
“तब वह गंगा बडे-बडे पर्वतो को भेदती हुई भगीरथ के पीछे-पीछे जाने लगी ।
उसी मार्ग में जह्नु नामक ऋषि की यज्ञ-भूमि थी । गगा ने अपने अतुल प्रवाह से उस
आश्रम-भूमि को घेर लिया । यज्ञोपकरण सभी गगा के प्रवाह में बह गये । यज्ञ में विघ्न
पडा हुआ देख, जह्नु क्रुद्ध हुए और उद्धत गति से आनेवाली उस गगा का सारा जल
पी गये । तब देवता तथा मुनियो ने भगीरथ से कहा—‘हे राजन्, यह मुनि क्रोध-में
आकर गगा को पी गये है । आप उनसे अपना क्रोध त्यागने तथा गगा को 'मुक्त करने
की प्रार्थना कीजिए । मुनि प्रसन्न होकर आपकी प्रार्थना स्वीकार करेंगे ।' तब भगीरथ
बडी भक्ति तथा विनय के साथ हाथ जोडकर उस मुनि से प्रार्थना करने लगे ।
“हे मुनिचन्द्र, हे विमलात्मा, मे इस श्रेष्ठ गगा को घोर तपस्या के उपरान्त पृथ्वी
पर ला सका हूँ । किंतु, यहाँ आने के बाद मै उसे खो बैठा । हे धन्यचरित, हे सयंमीन्द्र,
आप कृपाकर उसे मुक्त कर दें ।' (राजा की बात सुनकर मुनिवर के मन में दया उत्पन्न
हुई) वे बोले-‘हे भगीरथ, गगानदी को इस प्रकार पृथ्वी पर ले आने में आपकी तपस्या,
आपके महत्त्व तथा आपकी कीर्ति का वर्णन मै कैसे करूँ ? अब मे गंगा को मुक्त कर दूंगा ।
इस ससार में आपके यश की व्याप्ति होगी ।'
“इस प्रकार कहकर, गगा को मुंह से छोडकर उसे जूठान-करने की 'इच्छा से
उन्होंने अपने कान के मार्ग से उसे बाहर छोड दिया । पूर्व की तरह गगा प्रवाहित
होने लगी । तभी उसका नाम जाह्नवी पड़ गया ।
“जिस प्रकार पूर्वकृत पुण्य जीवन के विघ्नो को दूर करता हुआ आता है, उसी
प्रकार जाह्नवी राजा के पीछे चली और समुद्र में प्रवेश करके रसातल में पहुँच गई ।
वहाँ सगर-पुत्रो की भस्म-राशियो को अपने पुण्य-सलिल से सींचा । तब कमलासन (ब्रह्मा) ने
बडे हर्ष से भगीरथ से कहा—‘हे राजन्, जबतक समुद्र में जल रहेगा तबतक ये
सगर-पुत्र दिव्य चदन, वस्त्रामूषणो से अलकृत 'हो स्वर्ग-लोक में दिव्य भोगो का अनुभव
करेंगे । हे अनघ, आज से यह नदी भागीरथी, त्रिपथगा तथा जाह्नवी के नामो से-समस्त
लोको में विख्यात होगी । तुम्हारे पूर्वज सगर, अंशुमान् तथा दिलीप ने जो-सकल्प किया था,
वे उसे सिद्ध नही कर सके । तुम बडे प्रयत्न के उपरान्त गगा को 'इस पृथ्वी पर ले
आये हो, (अतएव) तुम गगाजल के निर्मल तथा कमनीय पद को प्राप्त करके चिर कीर्ति-
वान् होकर निवास करो । काकुत्स्य-वश की प्रतिष्ठा तथा गौरव के आधार-स्वरूप पुत्रो
बालकाण्ड ३९
को प्राप्त करो । तुम सुन्दर धर्मों के आधार हो गये । अब तुम इस पुण्य-सलिल में विधिवत्
पुण्य-स्नान करके उसका फल प्राप्त करो ।' यों कहकर कमलसम्भव (ब्रह्मा) अपने
लोक को चले गये ।
"उसके पश्चात् भगीरथ ने गंगा में स्नान करके बड़ी निष्ठा के साथ साठ हजार
सगर-पुत्रों की तिलोदक-क्रिया की । उस पुण्य-क्रिया के फलस्वरूप सगर-पुत्रों ने अमरत्व
प्राप्त किया और भगीरथ को आशीर्वाद देकर स्वर्गलोक सिधारे । पुण्यवान् भगीरथ अयोध्या
लौटकर सुख से राज्य करने लगे ।
"पापों का नाश करनेवाला यह उपाख्यान जो कोई भक्ति से पढ़ेगा या सुनेगा, वह अनन्त
पुण्य प्राप्त करता हुआ धन-धान्य तथा यश से समृद्ध हो चिरजीवी होगा । उसपर सभी देवता
प्रसन्न होंगे, उसके सभी कार्य सिद्ध होंगे, उसे स्वर्ग की प्राप्ति होगी तथा उसके पितरों को
सद्गति मिलेगी ।”
इस प्रकार राघव ने गंगावतरण की कथा कौशिक से सुनकर उनकी प्रशंसा
करते हुए कहा—'हे मुनीन्द्र में आपसे पृथ्वी पर गंगावतरण की कथा बड़े आश्चर्य के साथ
सुन प्रसन्न हुआ ।'
(उन्होंने) वह रात्रि वहीं बिताई और प्रातःकाल ही उस प्रसिद्ध नदी में स्नान
करके संध्या आदि कार्यों से निवृत्त होकर जाह्नवी नदी को पार किया । नदी के उत्तर
तट पर निवास करनेवाले मुनियों की बड़ी भक्ति के साथ पूजा की और उस स्थान को
छोड़कर आगे चले ।
थोड़ी दूर जाने पर उन्हें 'विशाला' नामक सुन्दर नगर दिखाई पड़ा । तब राम ने
गाधेय को संबोधित करके पूछा—'हे मुनि, इस नगर का नाम क्या है ? किस वंश का
राजा यहाँ राज्य करता है ? आप कृपाकर बतलाइए ।'
२८. अमृत-मंथन की कथा
तब कौशिक ने राघव से कहा—"मैंने बहुत पहले यह कथा इन्द्र से सुनी थी ।
प्राचीन काल में दिति के अत्यन्त बलवान् तथा पराक्रमी पुत्र तथा अदिति के बड़े धर्मात्मा
पुत्र उत्पन्न हुए । उन्होंने सोचा कि क्षीरसागर को पहले रस तथा ओषधियों से भरकर
उसका मथन करें और उस जलराशि से उत्पन्न होनेवाली श्रेष्ठ तथा कान्तियुक्त वस्तुओं को
बड़ी प्रसन्नता से ग्रहण करें । (इस प्रकार सोचकर) वे मंदर-पर्वत को मथनी और
वासुकी को रस्सी बनाकर मथन करने लगे । उस समय समुद्र में से समस्त लोकों को,
मन्मथ-समुद्र में डुबोने की क्षमता रखनेवाला सौन्दर्य, क्वणित होनेवाली करधनी से युक्त
गुरु नितम्ब, क्षीण कटि, सुन्दर कुच, कोमल भ्रू-लता-रूपी कोदण्डवाले कामदेव के बाणों के
समान (तीक्ष्ण) कटाक्ष, भव्य भुज-लता-विक्षेप, अमर नव-यौवन तथा कमनीयता से
सुशोभित साठ हजार अप्सराएँ तथा उन सुन्दरियों के योग्य हाव-भावों से युक्त परिचारिकाएं
उत्पन्न हुईं । उन अप्सरा-युवतियों को देवता तथा दैत्यों ने क्रमश ले लिया । उसके
पश्चात् भी समुद्र-मंथन चलता रहा । तब वरुण की पुत्री वारुणी का जन्म हुआ । दिति के
पुत्रों ने उसका वरण करना स्वीकार नहीं किया । इसलिए वे असुर कहलाये । अदिति
४० रंगनाथ रामायण
के पुत्रों ने उसे स्वीकार कर लिया । इसलिए, वे सुर के नाम से विख्यात हुए । इसके
पश्चात् उच्चै श्रवा नामक अश्व, श्वेत गज (ऐरावत) तथा कौस्तुभ-मणि का जन्म हुआ ।
कौस्तुभ-मणि के बाद अमृत उत्पन्न हुआ । अमृत के बाद सुधा-कमण्डल को लिये धन्वन्तरि
का जन्म हुआ । फिर विष उत्पन्न हुआ । जब वह (विष) अत्यन्त भयंकर अग्नि के
समान व्याप्त होने लगा, तब शिव ने उसका पान किया । इसके उपरान्त अमृत के लिए
सुर और असुर परस्पर युद्ध करने लगे । उस समय उन सुरासुरों को देखकर सुरों पर
कृपा करते हुए, विष्णु एक सुन्दरी का रूप धारण कर आये और अमृत का वितरण करने
लगे । उस समय राहु तथा केतु नामक राक्षस (विष्णु के मन की बात जानकर) सुरों
की पंक्ति में आकर बैठ गये और अमृत के लिए हाथ फैलाया । उनके शरीर की कान्ति
देखे बिना ही उस सुन्दरी ने अमृत दे दिया । रवि तथा शशि ने बड़ी घबराहट के साथ
इसे देखा और सुन्दरी को आँख के संकेत से यह बताया । तब विष्णु ने क्रुद्ध होकर अपना
चक्र उन (राक्षसों) पर चलाकर उनके सिर काट डाले । उन्होंने उन राक्षसों के सिरों को
ग्रहों के रूप में आकाश में प्रतिष्ठित किया । अमृत-पान करने से वे मृत्यु को प्राप्त हुए
बिना रहने लगे । उसी दिन से वे (राक्षस) पुण्य के दिनों में सूर्य और चन्द्र को
पीड़ा पहुँचाने आ रहे हैं ।
"सुन्दरी ने असुरों की आँख बचाकर सुरों को ही अमृत दिया और युद्ध में उनकी
विजय भी प्रदान की । इन्द्र ने सभी दैत्यों का नाश किया और तीनों लोकों का अधिपति
बनकर राज्य करने लगा ।
"अपने सभी पुत्रों की मृत्यु से दुःखी होकर दिति ने बड़ी दीनता से अपने पति कश्यप
से कहा—'हे महात्मा, आप मुझे एक ऐसा पुत्र प्रदान कीजिए, जो इन्द्र को भी मारने
की शक्ति तथा पराक्रम रखता हो ।' उसकी प्रार्थना स्वीकार करके कश्यप ने कहा—'हे
भद्रे, यदि तुम एक हजार साल तक शुद्धात्मा तथा पवित्र रह सकोगी, तो तुम्हें तीनों लोकों को
जीतनेवाला तथा इन्द्र का अन्त करनेवाला पुत्र मुझसे प्राप्त होगा ।' यों कहकर उन्होंने
अपने कर-कमल से दिति के शरीर का मृदु गति से परिमार्जन कर दिया । इसके पश्चात्
वे तप करने चले गये ।
"उनके चले जाने के बाद दिति 'कुशप्लव' (नामक स्थान में) उग्र तपस्या करने
चली गई । यह वृत्तान्त जानकर इन्द्र माता दिति के पास शिष्य के रूप में पहुँच गया
और बड़ी भक्ति के साथ उनकी पूजा-अर्चना करने के लिए आवश्यक कुश, समिधा,
फल, कन्द-मूल, जल आदि वस्तुएँ जुटाते हुए सतत उनकी सेवा-परिचर्या करता रहा । दिति
जब जो वस्तु चाहती, वह उसके संकेत-मात्र से ही वह वस्तु वहाँ प्रस्तुत कर देता था । इस
प्रकार नौ सौ निन्यानवे वर्ष बीत गये ।
"एक दिन दिति अपने मन की बात छिपा नहीं सकी । उन्होंने इन्द्र से कहा—
'हे इन्द्र, मैंने तुम्हारे पिता से एक पुत्र की प्रार्थना की थी । एक हजार वर्ष के उपरान्त
मुझे एक पुत्र होगा, ऐसा वर उन्होंने मुझे प्रदान किया है । आज से दस वर्ष के पश्चात्
तुम्हारे भाई का जन्म होगा । तुम और वह दोनों तीनों लोकों का राज्य करोगे और
यशस्वी बनोगे ।'
बालकाण्ड | ४१
उस दिन मध्याह्न के समय दिति थकावट के कारण अपने केश बिखेरकर (खाट
पर) पायताने की तरफ सिर रखकर सो गईं । उन्हें इस प्रकार देखकर इन्द्र बहुत प्रसन्न
हुआ और सोचा कि यही मेरे लिए अच्छा अवसर है । उसने अपनी योग-शक्ति से दिति के
गर्भ में प्रवेश किया और अपने वज्रायुध से अपने शत्रु-शिशु के खण्ड-खण्ड करने लगा ।
शिशु का रुदन सुनकर दिति जाग पडी । तब इन्द्र धीरे-धीरे कहने लगा—'मा रुद मा
रुद (मत रोओ, मत रोओ) । दिति चिल्लाने लगी—'शिशु का वध मत करो।' दिति का
क्रन्दन सुनकर इन्द्र गर्भ से बाहर आ गया और हाथ जोडकर बडी भक्ति के साथ
दिति से कहा--'माता, आप मुक्तकेशी होकर पायताने की ओर सिर किये सो रही थी ।
इससे आपकी पवित्रता में भग पड गया । इसलिए मैंने अपने कार्य की सिद्धि के लिए
आपके गर्भ में प्रवेश करने का साहस किया और मेरा नाश करने के लिए उत्पन्न होने-
वाले गर्भस्थ शिशु के सात खण्ड कर दिये । नन्हा शिशु मेरा शत्रु था, इसलिए मैने उसका
वध किया । हे माता, धर्म का विचार करके आप (मुझे) क्षमा कीजिए ।' इस प्रकार
इन्द्र दुख प्रकट करने लगा ।
“इन्द्र को दुःखी देखकर दिति ने कहा—'हे स्वर्ग के स्वामी, इसमें तुम्हारा कोई
दोष नही है । सारा दोष मेरा ही है । ये सातो खण्ड मरुत नाम से तेजस्वी बनकर
उत्पन्न होगे । तुम उन्हें इच्छानुसार सारे ससार में विचरण करने देना । तुम मेरे इन
सातो पुत्रो को सप्त मारुतो के गण-नायक बनाना । यही तुमसे मेरी विनती है ।'
“इन्द्र उनकी प्रार्थना स्वीकार करके इन्द्रलोक को चला गया । वे सातो शिशु क्रमश
इन्द्र की मित्रता प्राप्त करके मरुद्गण तथा देवता बन गये । इसी पुण्य-प्रदेश में देवेन्द्र ने
दिति की परिचर्या की थी । वही पर इक्ष्वाकु नामक राजा ने अपनी रानी अलंबुषा से
'विशाल' नामक पुत्र उत्पन्न किया था । उस विशाल ने यहाँ 'विशाला' नामक नगर का
निर्माण किया । उस विशाल के हेमचन्द्र नामक पुत्र हुआ । उसने सुचन्द्र को, सुचन्द्र ने
धूम्राश्व को, धूम्राश्व ने सृजय को, सृजय ने कुशाश्व को, उसने सोमदत्त को, सोमदत्त ने
ककुत्स्थ को और ककुत्स्थ ने सुमति को जन्म दिया । वह सुमति अभी इस नगर में रहते
हुए अत्यन्त धर्म-बुद्ध होकर राज्य कर रहा है । हे अनघ, धर्म तथा वैभवसपन्न ये राजा
ससार में 'वैशालिक' के नाम से विख्यात है । हम यहाँ आज की रात्रि बितायें और
प्रात काल होते ही राजा को देखने चलेंगे ।”
वहाँ का राजा सुमति विश्वामित्र के आगमन का समाचार जानकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ ।
वह अपने पुरोहित तथा वधु-जनो के साथ नगर के बाहर आया और विधिवत् सयमीन्द्र
विश्वामित्र की पूजा करके उनसे हाथ जोड़कर बडी श्रद्धा से कहा—'हे मुनीन्द्र, में आज
इस पृथ्वी पर धन्य हुआ । मेरा जन्म सार्थक हुआ ।'
परस्पर कुशल-प्रश्नो के पश्चात् सुमति ने विश्वामित्र को सबोधित करके कहा—
'हे मुनिनाथ, आपके साथ रहनेवाले असमान रूपवान्, विशालबाहु, दिव्य-पराक्रमी, गज की
गतिवाले, सिंह-सम शक्तिशाली, ललित तथा प्रफुल्ल अरविंद-सम नेत्रवाले, धनुष तथा करवाण-
धारी, आकाश जैसे रवि-शशि के सचार से अलकृत होता है, वैसे ही आपके पदन्यास को
६
४२ रंगनाथ रामायण
अलंकृत करनेवाले, दर्शकों को दोनों ही सब प्रकार से समान दीखनेवाले ये कुमार कौन हैं ?
किसके पुत्र हैं ? कृपया बताइए ।'
तब विश्वामित्र ने उसे देखकर कहा—"हे राजकुल-चन्द्र, हे सद्गुण-सागर, मैं इनका
वृत्तान्त तुम्हें सुनाता हूँ, तुम सुनो । सरयू नदी के किनारे कोशल-देश में अयोध्या नामक
नगर है । उस नगर में अत्यन्त प्रीति से प्रजा का पालन करनेवाले राजा दशरथ राज्य
करते हैं । यह उनका श्रेष्ठ पुत्र राम है । यह उनका अनुज लक्ष्मण है । मेरी प्रार्थना
पर राजा ने यज्ञ-रक्षणार्थ इन दोनों को मेरे साथ भेजा है । मेरे साथ आकर (इन दोनों ने)
मेरे यज्ञ की रक्षा की, युद्ध में बड़े पराक्रम के साथ सुबाहु का वध किया और
मारीच को परास्त किया। उनके पश्चात् मिथिला जाने के उद्देश्य से गंगा पार करके यहाँ आये हैं ।
ये राजचन्द्र सूर्य-वंश-तिलक हैं । उनके सामर्थ्य की कथा आश्चर्य में डालनेवाली है ।"
विश्वामित्र के वचन सुनकर राजा सुमति आश्चर्य-चकित हुआ । उसने उन राज-
कुमारों का आदर-सत्कार किया । उन्होंने प्रेम से राजा का आतिथ्य ग्रहण किया । सबने
रात्रि वहीं बिताई और प्रभात होने पर राजा ने उनको वहाँ से विदा किया ।
२९. गौतम के आश्रम का वृत्तान्त
(वहाँ से चलकर) मार्ग में चलने-चलते राघव ने गौतम के आश्रम को देखकर
गाधि-पुत्र को संबोधित करके कहा—"हे मुनीश्वर, ललित पल्लवों से युक्त, आम्र, कटहल,
नारंगी, जंबीर, नारिकेल, देवदारु, बिजोरी, नींबू, बेल, सुपारी, केला, अशोक, लाख, दाड़िम,
तेंदू, सेमल, चन्दन, कर्पूर, मीठे आम, भिलावाँ, गुग्गुल, आदि पेड़ों म सुशोभित, सिंदुवार, पुन्नाग,
मौलसिरी, चमेली, कुन्द, कर्चूर आदि पुष्पों की सुगन्धि मे परिपूर्ण, सर्वत्र व्याप्त लौंग तथा
एला की लताओं से युक्त, सरोवरों मे सुशोभित, रम्य पक्षियों के कल-कूजन से मुखरित
यह आश्रम-भूमि आज निर्जन क्योँ है ? इसके पहले कौन मुनि यहाँ तपस्या करते थे ?
कृपया बतलाइए ।"
तब मुनि ने कहा—"किसी समय गौतम मुनि अहल्या के साथ इस आश्रम में
अत्यन्त निष्ठा मे घोर तपस्या करते थे । यह देख इन्द्र ने उनकी तपस्या में बाधा डालनी
चाही । एक दिन उसने मुर्ग के रूप में पर्णशाला के पास पहुँचकर वाँग दी । मुनि (प्रात-
काल हो गया समझकर) अनुष्ठान करने के लिए (नदी-तट पर) चले गये । तब इन्द्र
गौतम का रूप धारण करके आया और अहल्या को देखकर कहा—'अभी रात्रि बहुत
बाकी है। हे सुन्दरी, यह तुम्हारा ऋतु-काल है । इस समय रति-क्रीड़ा करने की इच्छा
से ही मैं आया हूँ।' इस पर (सारी बातें जानकर) अहल्या ने कहा—'मैं जानती हूँ कि
तुम इन्द्र हो, अन्दर चले आओ ।' यों कहती हुई वह इन्द्र को पर्णशाला में ले गई
और उनके साथ रति-क्रीड़ा की । जब इन्द्र झिझक तथा भय से वहाँ से जाने लगा, तभी
गौतम मुनि वहाँ पहुँच गये । (इन्द्र को देख) उन्होंने शाप दिया—'रे पापी, क्या यह
तुम्हारे लिए उचित है कि तुम मेरा रूप धारण कर मेरी पत्नी से मिलो । इस पाप-कर्म
के लिए तुम अण्डकोश-रहित हो जाओ ।' गौतम का शाप अप्रतिहत होकर उसे लगा और
तुरंत उसके अण्डकोश भूमि पर गिर गये ।
बालकांड ४३
“इसके पश्चात् गौतम ने अहल्या को देखकर कहा—‘हे नारी, तुम पाषाण होकर
इस भूमि पर पड जाओ और प्रचण्ड धूप में लोटती रहो ।' तब अहल्या ने उनसे पूछा—
'हे देव, आपके शाप का अंत कैसे होगा ?' तब गौतम ने कहा—‘वैकुण्ठवासी, अवाप्त-
कामी, लोक-रक्षक और पुराण-पुरुष (विष्णु) राम के रूप में जन्म लेंगे । कौशिक के
यज्ञ की रक्षा करने के बाद वे सूर्यवंशतिलक इसी मार्ग से आयेंगे । यदि उनके चरणों का
स्पर्श तुमसे होगा तो तुम शाप-मुक्त हो जाओगी ।' यों कहकर वे शीताद्रि के लिए
चल पडे । वही मुनि-पत्नी यहाँ पाषाण के रूप में पडी हुई है ।
“जब सुरराज (इन्द्र) ने अपनी दुर्गति का समाचार देवताओं से कहा, तब उन्होंने
मेष (भेड) का अंडकोश लाकर इन्द्र के शरीर में जोड दिया । इसी कारण से पुण्यवान्
लोग यज्ञ के समय मेषों का वध करते हैं ।
“इस प्रकार मुनि के शाप से पीडित अहल्या इसी तपोवन में पडी हुई है । हे
राम, हे पुण्यधाम, तुम उस अहल्या का दुख-मोचन करो ।”
यों कहकर विश्वामित्र (राम-लक्ष्मण के साथ) गौतम के आश्रम में आये । श्रीराम
का चरण छूते ही, बादलों के हटने पर प्रकाशित होनेवाले चन्द्र के समान, धुआँ से मुक्त
होने पर हवन-कुंड की अग्नि-ज्वाला के समान, कलंक-रहित कमलिनी के समान, मलिनता
से रहित स्वर्ण के समान, राम के चरण-कमलों के रज का स्पर्श होते ही पाप-मुक्त होकर
उस स्त्री (अहल्या) ने शिला का रूप तजकर निज रूप प्राप्त कर लिया । वह पहले ही
अपने पति से राम की महत्ता के विषय में सुन चुकी थी, इसलिए उस गजगामिनी ने
उस महापुरुष का आतिथ्य किया और कहा—‘आपके शुभागमन से मैं कृतार्थ हो गई ।
आपके चरण-कमलों ने मेरा उद्धार कर दिया । हे त्रिलोकीनाथ ! हे रघुनाथ ! आपका
चरणोदक ही आकाश-गंगा के रूप में धरती के समस्त पापों को दूर करने (पृथ्वी पर)
आया है । आपने अपने एक चरण से पृथ्वी को और दूसरे चरण से आकाश को नाप-
कर बलि को दबाया था, सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त होकर वेदों के शिरोभाग में विचरण
करनेवाले आपके चरण यदि मुझे शाप-मुक्त कर दें, तो इसमें आश्चर्य ही क्या है ?’
इस प्रकार अहल्या ने राम की स्तुति की । इतने में गौतम मुनि भी वहाँ आ पहुँचे ।
उन्होंने रघु रामचन्द्र की पूजा की और पूर्व-जन्म की सुकृति-रूपी अहल्या को स्वीकार करके
पूर्ववत् उसी आश्रम में रहने लगे । तब कुंभ-वृष्टि (घोर वृष्टि) हुई और देव लोग
दुंदुभियाँ बजाने लगे ।
३०. मिथिला में आगमन
वे पुण्यचरित वहाँ से चलकर जनक की राजधानी मिथिला नगर में पहुँचे, जो
गगनचुंबी प्राकारों, सौध-समूहों, रत्न-खचित गृहों, रमणीय राजमार्गों, दुर्गों, मनोहर उद्यानों,
सुन्दर वनस्पतियों तथा समस्त शुभों से परिपूर्ण था ।
जनक की यज्ञ-भूमि में कलिंग, नैपाल, कर्णाटक, लाट, मालव, सौवीर, मगध,
पांचाल, कुरु, पाण्ड्य, वर्वल, कुंतल, अवंती, मरु, तरुष्क, आभीर आदि देशों के राजा
विराजमान थे । वह यज्ञ-भूमि, यज्ञोपकरणों तथा उसके अनुरूप पशुओं, यूपकाष्ठ, दधि-क्षीर से
४४ रंगनाथ रामायण
भरे पूर्ण कुभो, समिधाओ से भरे सुदर स्थलो, पक्तियो में सजे हुए दर्भासनो, उचित
आसनो पर विराजमान तपोनिधि मुनियो, अत्यन्त रमणीय रत्न-पल्लव तोरणो, सामादि वेदो
के घोषो, सतत यज्ञ के दर्शनार्थ आनेवाले तपस्वियो, आकाश तक व्याप्त होनेवाला हवन
का धुआँ, देवताओ का आह्वान करनेवाली ध्वनियो, पूजाओ को ग्रहण करनेवाले पुण्य
सयमी (मुनियो) तथा पूजाओ को प्राप्त करने में न थकनेवाले ब्राह्मणो से परिपूर्ण था ।
(गावि-पुत्र को आया जानकर) जनक महाराज बडे उत्साह से उनके सम्मुख गये,
मुनिनाथ को दंडवत्-प्रणाम किया और उन्हें ले जाकर उनकी उचित पूजा की और कुशल-
प्रश्न पूछे । उसके पश्चात् वे उस मुनीन्द्र की प्रशसा करते हुए कहने लगे—आपके आगमन
मे मै परम पवित्र हुआ । मेरा यज्ञ समृद्ध हुआ ।' इस प्रकार कहने के उपरान्त उस
मुनीन्द्र के पीछे सुशोभित विशाल वक्षवाले, काकपक्षधारी, महाधनुर्धर, कोमल शरीरवाले,
सुभग, यशस्वी, भूमि पर अवतार लिये हुए देवताओ के समान दीखनेवाले दयालु, सतत
प्रसन्नवदनवाले, भुवन-पावन चरित्रवाले, सूर्य तथा चन्द्र की-सी कान्ति से विलसित, आजानु-
बाहु, अश्विनीकुमारो के समान दीखनेवाले, अतुल पराक्रमी और कमल-लोचनवाले, राम
तथा लक्ष्मण को देखकर जनक ने विश्वामित्र से पूछा—'हे महात्मा, ये, धनुर्वाणधारी
तथा चतुर बालक किनके पुत्र है ? ये नव-पल्लव के सदृश अरुण तथा कोमल चरण-कमल
यहाँ तक कैसे पैदल आये ?'
तब विश्वामित्र ने कहा—'हे राजन् ये अनघ महाराज दशरथ के पुत्र हैं । इन्होंने
अपनी अमित शक्ति से मेरे यज्ञ की रक्षा की । कृपा करके अहल्या का उद्धार किया
और आपके घर में रखे हुए शिव-धनु को देखने यहाँ आये है ।' मुनीश्वर की इन बातो
से प्रसन्न होकर जनक ने उन (राजकुमारो) का स्वागत-सत्कार किया ।
फिर गौतम मुनि के शिष्य शतानन्द ने कौशिक को संबोधित करके कहा—“हे
महात्मा राघव को अपने साथ ले आकर आपने हम पर बडी कृपा की है। इस विश्वप्रभु
को यहाँ तक ले आने का कार्य किसके लिए संभव था ? राघव के चरण-रज ने मेरी
माता अहल्या के पापो का शमन कर दिया । गौतम मुनि के शाप से मुक्ति प्राप्त कर
मेरी माता फिर मुनि से मिल गई है । रामचंद्र के चरण की महिमा का वर्णन मैं किन
शब्दों में करूँ ?”
३१. विश्वामित्र की शक्ति का परिचय
इसके पश्चात् शतानंद ने राम की ओर देख कर कहा—“हे रामचंद्र, सुनते हैं कि
यह पुण्यात्मा कौशिक, इस पृथ्वी पर, आपके अभिभावक हैं । अब आपको किस बात की
कमी है ? विश्वामित्र की असमान क्षमता का वर्णन करना कठिन है । फिर भी आप
सुनें । हे दशरथात्मज, कुश नामक मुनि ब्रह्मा के पुत्र थे, कुश ने कुशनाभ को जन्म दिया ।
गावि उस कुशनाभ के पुत्र थे । ऐसे पवित्र गावि के ये (विश्वामित्र) पुत्र हैं । ये धर्म-
निरत होकर, अमित पराक्रम के साथ पृथ्वी का शासन करते थे । एक दिन विनोदार्थ
मृगया खेलने के लिए अपनी विशाल सेना के साथ निकले । बहुत समय तक वन में मृगया
खेलने के पश्चात् बहुत ही थके-माँदे होकर वे वसिष्ठ के आश्रम में पहुँचे । वसिष्ठ का
बालकांड ४५
आश्रम नाना प्रकार की सुगन्धित पुष्प-मंजरियों से तथा विविध प्रकार के फलों से लदे
वृक्षों से भरा था । पक्षियों का कलरव तथा वेद-घोषों से सारा आश्रम गूंज रहा था ।
उसमें कई सरोवर तथा यज्ञ की वेदियाँ थीं । भिन्न-भिन्न जाति के मृग अपने स्वभाव-सुलभ
वैर को भूलकर वहाँ विचरण कर रहे थे । उनका आश्रम वायु, जल तथा (वृक्षों से
गिरे) पाण्डु-पत्रों पर जीवन व्यतीत करते हुए तप करनेवाले मुनियों, योगियों, पुंगवों, पन्नगों,
खेचरों, सिद्धों, सुपर्वों तथा किन्नरों से युक्त होकर ब्रह्मलोक के समान सुशोभित था ।
विश्वामित्र ने बड़ी प्रसन्नता तथा भक्ति से वसिष्ठ को प्रणाम किया । उन्होंने आशीर्वाद दिये
और उचित आसन पर बिठाकर उनका सत्कार किया और सुस्वादु फल, मूल आदि
प्रस्तुत किये ।
"विश्वामित्र ने उन सबको ग्रहण करते हुए हाथ जोड़कर बड़ी भक्ति के साथ
पूछा—'हे अनघात्मा ! लोकहितार्थ चलनेवाले आपके तप तथा हवन आदि अच्छी तरह
हो रहे हैं न ? आप, आपके शिष्य और आश्रम के सभी व्यक्ति प्रसन्न तो हैं ?'
"तब वसिष्ठ ने कहा—'हम सब प्रसन्न हैं । आप नीति-युक्त हो राज्य कर
रहे हैं न ? स्नेह के साथ अपने भृत्यों का पालन करते हैं न ? राज्य के सभी अंगों का
( उचित रीति से ) पर्यवेक्षण कर रहे हैं न ? आक्रमण करनेवाले शत्रुओं को आप
पराजित कर तो रहे हैं न ? आप स्वयं सकुशल तो हैं ? आपके पुत्र और पत्नियां
कुशल से हैं न ?'
"तब कौशिक ने वसिष्ठ से कहा—'महात्मा, आपकी कृपा से हम सब कुशल-मंगल
से हैं ।' तब वसिष्ठ ने कहा—'राजन् मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप मेरे यहाँ
भोजन करके यहाँ से जायें ।"
"कौशिक ने उनका निमंत्रण स्वीकार किया । वसिष्ठ ने विश्वामित्र तथा उनकी
सेना को भोजन देने के उद्देश्य से अपनी काम-धेनु का स्मरण करके उससे प्रार्थना की कि
राजा तथा उनकी सेना को विविध मिष्टान्न तथा भोजन से तृप्त करना है । इसके लिए
आवश्यक वस्तुओं का तुम प्रबंध करो ।
"तब कामधेनु विभिन्न प्रकार के भात, शाक, मिष्टान्न, अँचार, विविध फल, खीर,
मक्खन, चीनी, ताजा घी, कई प्रकार के मद्य और मांस आदि से युक्त बढ़िया भोजन का
प्रबंध किया । जिसकी जो इच्छा होती, वह उसे बिना माँगे ही मिल जाता था ।
गाधेय तथा उनके सैनिक भर-पेट भोजन करके संतुष्ट हुए ।
"इसके पश्चात् गाधि-पुत्र ने मन में सोचा कि इस कामधेनु को किसी भी तरह
मुनि से ले लेना चाहिए । वे मुनि के पास जाकर बोले—'हे मुनिवर, मैं आपको एक
लाख अश्व, एक लाख हाथी, एक लाख गायें और कई हजार मणियाँ दूँगा । आप
यह गाय मुझे दे दें ।' इस पर मुनि अत्यन्त दुःखी होकर बोले—'हे राजन्, यह गाय मेरा
जीवन है, मेरा प्राण है, मेरी तपस्या का साधन है । हव्य-कव्य तथा अतिथि-सत्कार इसी
गाय के कारण बिना विघ्न के संपन्न होते हैं । अतः इस पुण्य-धेनु को मैं तुम्हें दे नहीं
सकता ।'
"तब महाबली विश्वामित्र क्रोध में आकर बोले—'मैं आपसे यह गाय देने की प्रार्थना
क्यों करूँ ?' यह कहकर उन्होंने अपने हजारों सेवकों की सहायता से बलात् उस गाय को
पकड़कर ले जाने का प्रयत्न किया । तब उस गाय ने उनके पीछे न जाकर मुनिपुंगव को
देखकर कहा—'हे अनघ, वसिष्ठ, हे सयमीन्द्र ! कौशिक (अपने बल के) मद में मुझे
बलात् ले जाने का यत्न कर रहा है । हाय ! आप दुर्वार होते हुए भी उसे रोकते क्यों
नहीं ? निर्विरोध मुझे उसके हाथों में सौंपना, क्या आपको उचित जँचता है ? हे
अनघात्मा ! मैंने आपके प्रति कोई अपराध नहीं किया है, फिर भी मेरी उपेक्षा करना
क्या आपके लिए उचित है ?'
"धेनु की बातें सुनकर वसिष्ठ दयार्द्रचित्त होकर कहने लगे—'मैं तुम्हें क्यों छोड़ने
लगा ? राजा अपने भुज-बल से बलात् तुम्हें ले जा रहे हैं । यदि क्षत्रिय उद्दण्ड हो
जायें, तो ब्राह्मण उनका निवारण किस प्रकार कर सकते हैं ? यह गाधि-पुत्र इस पृथ्वी के
अधीश्वर हैं । इनके पास अक्षौहिणी सेना है । मैं इन्हें कैसे जीत सकूँगा ?'
"तब धेनु ने मुनि से कहा—'हे मुनिनाथ ! संसार में ब्राह्मण-तेज, क्षत्रिय के तेज
से अधिक बलवान् होता है, इसलिए मैं यह बात जानती हूँ कि कौशिक किसी भी दशा में
आपसे अधिक श्रेष्ठ नहीं हो सकता । आप मुझे आज्ञा दीजिए, मैं इसकी सारी सेना को
एक ओर से नष्ट कर दूँगी ।' तब वसिष्ठ ने गाय से कहा—'अच्छा, तो तुम सेना
उत्पन्न करके (राजा की सेना का) नाश करो ।'
"वसिष्ठ की आज्ञा मिलते ही धेनु ने हुंकार भरी । उसके हुंकार भरते ही उसके
कान, पूँछ, दाँत, रोम, खुर, जाँघ, आँख, घुटने, श्वास, गलकंबल, और रोम-कूपों
से भयंकर आकारवाले असंख्य किरात, पल्लव, काम्भोज तथा यवन वीर उत्पन्न हुए। वे
प्रचण्ड विक्रमी, अद्भुत आकार तथा विचित्र आयुध धारण किये हुए थे । उनके नेत्र और
हुंकार अनोखे ढंग के थे । योद्धाओं का वह समूह हाथी तथा अश्वों पर (आरूढ होकर)
विश्वामित्र की सेना का संहार करने लगा यह देखकर विश्वामित्र के पुत्र विविध आयुधों
से सुसज्जित होकर वसिष्ठ का वध करने आये । किन्तु धेनु के हुंकार-मात्र से भस्म
हो गये ।
"अतुल पराक्रमी वीरों से पूर्ण अपनी सेना को मृत्यु का ग्रास बनते देखकर तथा
अपने सौ वीर पुत्रों की मृत्यु का विचार करके विश्वामित्र दुःख तथा शोक से संतप्त हो उठे ।
वे अपने एक पुत्र को अपना राज्य सौंपकर तप करने के लिए हिमालय में चले गये ।
वहाँ उन्होंने जल में खड़े रहकर त्रिपुरांतक ( शिव ) के प्रति घोर तपस्या की ।
शिवजी प्रत्यक्ष हुए और विश्वामित्र ने उनसे विविध दिव्यास्त्र प्राप्त किये ।
"इसके पश्चात् विश्वामित्र बड़ी शीघ्रता से वसिष्ठाश्रम के पास आये और (उस
आश्रम पर) आग्नेय बाण चलाने लगे । उनके बाणों के तेज से वसिष्ठ के आश्रम में
अग्नि की ज्वालाएँ फैल गईं । यह देखकर वसिष्ठ, काल-दण्ड लिये हुए यमराज के समान
क्रोधोन्मत्त हो अपने हाथ में अधारी लिये हुए बाहर आये और बोले—'हे पापी, हे विश्वा-
मित्र, क्या इस प्रकार कहीं पुण्य-भूमि तपोवन को जलाया जाता है ? तुम्हारी शक्ति कितनी है,
और मेरी शक्ति कितनी ? (क्या इसका भी तुम्हें ज्ञान है ?)'
!
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Because 'ग' and 'श' look somewhat similar in some scripts or the typesetter had them confused!
Wait, look at L30: "दक्षिण दिगा में घोर निष्ठा से" -> WOW, that is 100% "दिगा"!
Look at L29: "सगरीर स्वर्ग में" -> WOW, that is 100% "सगरीर"!
Look at L31: "सगरीर स्वर्ग में" -> 100% "सगरीर"!
Look at L34: "इगीलिए तो" -> WOW, look at L34:
"इगीलिए तो" -> YES! It has 'ग' instead of 'स'/'श'!
Look at L35:
"आप मुझपर कृपा करके मुझमे ऐसा यज्ञ कराइए" -> wait, look at L35:
"मुझमे ऐसा यज्ञ क ग ड ए" -> WAIT!
Look at that word in L35:
"क ग ड ए" -> IS IT "कराइए"?
Wait, look at the letters in that word:
- 'क'
- 'ग' with no matra? No, 'ग' + 'ड' with 'ए'?
Wait, could it be "कराइए" or "कराइये"?
Wait, what word should be there?
"मुझसे ऐसा यज्ञ कराइए" -> but here:
४८ रंगनाथ रामायण
“इसपर वसिष्ठ के पुत्र ने कहा—‘राजन्, तुम्हारे-जैसे दुर्मतियो के अतिरिक्त दूसरां
कोई निर्मल चित्तवाला व्यक्ति ऐसे यज्ञ की बात सोच भी सकता है ?' मुनि-पुत्र के यह
कहने पर गजा ने उपेक्षा से कहा—'आपके पिता ने यज्ञ कराना अस्वीकार कर दिया है,
और आप भी अस्वीकार करते हैं । मेरे हित की चिंता न करनेवालो से अब मेरा क्या
सबंध ? मै किसी और से यह यज्ञ कराऊँगा ।'
“तव रुष्ट होकर उस पुण्यात्मा ने कहा—'तुम चाडाल हो जाओ ।' तुरत राजा का
रूप ऐसा विकृत हो गया, मानो उसका दीप्तिमान् तेज वासिष्ठ की क्रोधाग्नि से भस्म हो
गया हो । उसका शरीर काला हो गया । उसके शरीर पर के वस्त्र काले हो गये । उसके
केश विखर गये । उसका रूप इतना मलिन हो गया, मानो उसके स्पर्श-मात्र से दूसरा भी
मलिन हो जायगा । उसके शरीर पर रहनेवाले कान्तिमान् मणिमय स्वर्णाभरण लोहवत
हो गये । उसके रूप, रग, वाणी आदि चाडाल-जाति के अनुरूप हो गये ।
“इस प्रकार राजा को भयकर चाडाल-रूप धारण किये हुए देखकर नागरिक, सेवक,
अमात्य तथा वधु-वर्ग ने उसे त्याग दिया । तब राजा अत्यन्त भयभीत होकर लोगो (के
मार्ग) से वचता हुआ अपने-आपको छिपाता हुआ धीरे-धीरे महातेजस्वी विश्वामित्र
मुनि के पास जा पहुँचा । उसे देखकर गाधि-पुत्र का हृदय दया से उमड आया । वे
बोले—'अयोध्या का शासन करनेवाले, तुम्हें यह चाण्डालत्व कैसे प्राप्त हुआ ?'
“तब राजा ने हाथ जोडकर कहा—'हे महात्मा, मैंने वसिष्ठ से सशरीर स्वर्ग-
गमन का यज्ञ कराने की प्रार्थना की थी, तो उन्होने अस्वीकार कर दिया। उनके पुत्र ने
कहा कि जब वसिष्ठ की ऐसी सम्मति है, तब यज्ञ हो नही सकता । इसपर मैने दूसरो
से यज्ञ सपन्न करवा लेने का विचार प्रकट किया, तो अत्यन्त क्रुद्ध होकर उन्होने मुझे चाण्डाल
वन जाने का शाप दिया । इसी कारण मुझे यह रूप मिला है । मैने जो यज्ञ करने
का सकल्प किया है, उसे अवश्य पूरा करूँगा । विपत्ति में भी मै असत्य नही बोलता ।
भविष्य में भी किसी भी प्रकार से मैं सत्य का पालन करूँगा । मैने अबतक कितने ही
यज्ञ किये, कितने ही धर्म-सबधी कार्य किये और सुख-समृद्धि प्राप्त की । मैने गुरुओ से
प्रार्थना की, परन्तु उनकी कृपा न रहने से यह धर्म-कार्य पूर्ण नही हो सका । दैव-वल के
अभाव में पुरुषार्थ में भी दोष आ जाता है । हे अनघ, आप मेरे लिए ईश्वर-तुल्य है ।
किसी भी प्रकार आप मेरी रक्षा कीजिए ।'
“तव विश्वामित्र ने उसे देखकर कहा—'हे राजन्, अब तुम दुःख मत करो । तुम्हें
दीन जानकर मैं त्रिकरण शुद्धि (पवित्र मन, वचन एव शरीर) से तुम्हें शरण दे रहा हूँ ।
में मुनियो को बुलाकर तुमसे यज्ञ कराऊँगा और तुम्हें सशरीर स्वर्ग भेजूँगा, जिससे तुम्हारी
प्रतिज्ञा झूठी न हो । मैं तुम्हें पवित्र वनाऊँगा ।' इस प्रकार कहकर उन्होने अपने शिष्यो
से कहा—'तुम लोग तुरत जाओ और त्रिशकु के यज्ञ के लिए ऋत्विजो तथा मुनियो को
लेकर शीघ्र आओ ।'
सभी शिष्य तुरत गये और श्रेष्ठ मुनियो को साथ लिये हुए विश्वामित्र के पास
आकर बोले—'हे अनघात्मा, हम सभी मुनियो को वडी प्रसन्नता से ले आये है । वसिष्ठ के
आश्रम के मुनियो के अतिरिक्त शेष सभी मुनि आ गये है । वसिष्ठ के पुत्रो ने जो
जो अपशब्द कहे, उन्हें सुन लीजिए । उन्होने कहा—'यह कितने आश्चर्य की बात है कि यज्ञ
करानेवाला एक राजा है और यज्ञकर्त्ता एक चाडाल । भला चाडाल के यज्ञ में भाग लेने-
वाले मुनि किस प्रकार वहाँ भोजन करेंगे ? देवता अपने हविर्भाग लेने किस मुंह से
आयेंगे ? विश्वामित्र की शरण प्राप्त करने-मात्र से कही नर स्वर्ग-लोक प्राप्त कर सकेगा ?'
"इन बातो को सुनकर विश्वामित्र क्रोध से जल उठे । बोले—'अत्यत निष्ठा के साथ
तपस्या करनेवाले मुझे, अपशब्द कहनेवाले सभी पापी ससार में सात सौ वर्ष तक राक्षस-
भाव धारण किये हुए, मानव तथा कुत्तो का मास खाते हुए, नीच होकर रहेंगे । दर्प से
मेरी निंदा करनेवाला वह महात्मा पृथ्वी पर निषाद होकर जन्म लेगा ।' इस प्रकार, शाप
देकर सयमी मुनियो को देखकर उन्होने कहा—'हे मुनियो, ये राजा त्रिशंकु उच्चकुलीन,
कीर्त्तिमान्, धर्मज्ञ तथा सत्यनिष्ठ है । इसलिए इनसे आप यज्ञ कराइए, जिससे ये शरीर के
साथ इद्रपुरी को जा सकें ।'
"ऋषि के वचन सुनकर वे सभी मुनि परस्पर यो विचार करने लगे—'यदि हम
गाधि-पुत्र के वचनो को टाल दें, तो वे क्रोध में आकर हमें घोर शाप देंगे । अत उनके
कहे अनुसार हम राजा से यज्ञ करायेंगे ।' यो सोचकर सभी मुनि यज्ञ-कर्म में लग गये ।
विश्वामित्र ऋत्विक् बने और मत्रो के उच्चारण के साथ उन्होने यज्ञ-भाग लेने के लिए
देवताओ का आह्वान किया । देवताओ ने उच्च स्वर में कहा कि हम नही आयेंगे ।
"तब क्रोधाग्नि से भभकते हुए, कुश की पवित्री हाथ में लिये हुए, स्रुवा उठाकर
कौशिक ने कहा—'हे त्रिशंकु यदि मैने बाल्यावस्था से नियमो का पालन करते हुए तप
किया हो, तो तुम सशरीर स्वर्गलोक में पहुँच जाओगे । अब तुम जाओ ।'
"इसपर त्रिशंकु स्वर्ग में पहुँच गया । किन्तु (वहाँ जाने पर) इन्द्र ने कहा—'तुम
चाण्डाल हो, हम तुम्हें यहाँ रहने नही देंगे ।' और उसने त्रिशंकु को स्वर्ग से नीचे ढकेल
दिया ।
"त्रिशंकु सिर के बल नीचे की ओर गिरते हुए चिल्लाने लगा—'हे विश्वामित्र,
मेरी रक्षा कीजिए, मेरी रक्षा कीजिए ।' तब विश्वामित्र का हृदय दया से भर गया ।
उन्होने कहा—'हे राजन्, तुम आकाश में ही ठहर जाओ ।' यो कहकर उन्होने त्रिशंकु
को आकाश में ही ठहरा दिया और बडे क्रोध में आकर इन्द्र से प्रतिरोध लेने के उद्देश्य
से उन्होने दक्षिण दिशा में अपर स्वर्ग का निर्माण किया । उसमें उन्होने (नये) सप्त
ऋषियो तथा नक्षत्रो का सर्जन किया । इतना ही नही, वे उस स्वर्ग में दूसरे देवताओ
तथा अपर इद्र को भी उत्पन्न करने का सकल्प मन-ही-मन करने लगे ।
"यह समाचार मिलते ही सभी मुनि तथा देवता विश्वामित्र के पास आकर बोले—
'हे मुनिनाथ, यह त्रिशंकु गुरु के शाप से पीडित है । यह स्वर्ग में रहने योग्य नही है ।'
इस पर विश्वामित्र ने कहा—'हे देवताओ मैने त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेजने का वचन
दिया है । मेरा वचन व्यर्थ नही होना चाहिए । इसलिए इस राजा को इसी स्वर्ग में रहने दो ।
जवतक यह ससार रहेगा, ये नक्षत्र, देवलोक से भी ऊपर आसमान में तेज से प्रकाश-
७
५० रंगनाथ रामायण
मान रहेंगे । उन नक्षत्रो के बीच त्रिशंकु को इसी दशा में (सिर नीचा किये) देवतायो
के समान रहने दो और पुण्यात्मा तथा यशस्वी बनने दो ।' इस व्यवस्था को स्वीकार कर
मुनि तथा देवता विश्वामित्र की प्रशंसा करते हुए अपने-अपने स्थान को लौट गये ।
"तब विश्वामित्र ने (अपने आश्रम के) मुनियो को देखकर कहा—'यह स्थान अब
तपस्या के लिए उपयुक्त नहीं है । यहाँ अब लोगों की भीड़ एकत्र होने लगी है । अत
हम यहाँ से किसी दूसरे स्थान में चले जायेंगे ।' यो कहकर वे उस स्थान को छोड़कर (पश्चिम
दिशा में) विशाला के निकट पुष्कर-तीर्थ में जा पहुँचे । वहाँ केवल जल और फल का
ही आहार करते हुए बहुत वर्ष तक वे तपस्या करते रहे ।
"उस समय अयोध्या के राजा, मन्मथ के समान रूपवान् अंबरीष ने एक यज्ञ करने
का निश्चय किया । उस यज्ञाश्व को इन्द्र ने चुरा लिया । राजा ने यज्ञाश्व को कई
स्थानो में ढूंढ़ा, किन्तु अश्व के न मिलने से उसके प्रायश्चित्त-स्वरूप विधि पूरी करने के
निमित्त नर-पशु की माँग करते हुए वह कई आश्रमों में गया । निदान भृगुतुंग में अत्यंत
तपोनिष्ठा में संलग्न ऋचि नामक मुनि के पास पहुँचकर राजा ने मुनि को प्रणाम करके
कहा—'हे करुणानिधि, मैंने यज्ञ करने का यत्न किया था, किन्तु यज्ञाश्व कही खो गया है ।
आप कृपया अपने एक पुत्र को यज्ञ-पशु के रूप में मुझे दें । उसके बदले में एक लाख
गायें मै आपको दूंगा ।' तब मुनि ने कहा—'मैं अपने ज्येष्ठ पुत्र से अत्यधिक स्नेह रखता हूं
इसलिए मै उसको नहीं दे सकता ।' तब मुनिपत्नी ने कहा—'मै कनिष्ठ को बहुत
चाहती हूँ । मैं उसे दे नही सकती ।' उन दोनो की बातें सुनकर शुनःशेप ने राजा से
कहा—'ज्येष्ठ पुत्र को मेरे पिता चाहते है और कनिष्ठ पुत्र को मेरी माता चाहती है ।
अत. उनकी बात छोड़ दीजिए, मैं आप के साथ चलूँगा । इसके लिए आप मेरे माता-
पिता को सहस्र गायें दीजिए ।' राजा ने वैसा ही किया और शुनःशेप को रथ पर बिठा-
कर शीघ्र वहाँ से चल दिया ।
"इस प्रकार राजा शुनःशेप को साथ लेकर पुष्कर-प्रदेश में स्थित आश्रम में पहुँचा ।
वहाँ अमित तपोनिष्ठा में लीन, अचल रीति से तपस्या करनेवाले अपने मामा विश्वामित्र
को देखकर शुनःशेप ने उनको प्रणाम किया और कहा—'हे अनघ, मेरे माता-पिता ने मुझे
इस राजा को यज्ञ-पशु के रूप में बेच दिया है । आप कृपया इस राजा के यज्ञ को सफल
बनाकर मेरे प्राणो की रक्षा कीजिए । आज आप ही मेरे माता, पिता, गुरु और बंधु हैं ।'
"इस प्रकार अत्यंत दीन होकर जब शुनःशेप ने कहा, तब विश्वामित्र ने अपने पुत्रो
को संबोधित करके कहा—'पुण्यात्मा लोग परलोक में सुगति प्राप्त करने के लिए ही पुत्र
उत्पन्न करते है । इस बालक ने मेरी शरण ली है, इसलिए इसकी प्राण-रक्षा करना ही
अब मेरे लिए स्वर्ग है । यह मेरा भानजा है । तुम लोग इसकी रक्षा करो और तुममें से
कोई इसके लिए अपने प्राण दो ।'
"मुनि-पुत्रों में से कोई भी उनका आदेश पालन करने के लिए संनद्ध नहीं हुआ, तब
अत्यंत क्रुद्ध होकर मुनि ने उन्हें शाप दिया—'तुम एक हजार वर्ष तक कुत्ते का मास
खाते हुए दुःख भोगो ।'
बालकांड ५९
“इसके पश्चात् विश्वामित्र ने उस शुन शेप को बडे प्रेम से अपने पास बुलाकर
कहा--'मै तुम्हें दो मंत्र देता हूँ । तुम सतत उनका जप करते रहो । वे (मंत्र) तुम्हारी
रक्षा करेंगे और अवरीष का यज्ञ भी सफल हो जायगा ।' यो कहते हुए उन्होने उसे दो
मंत्रो का उपदेश किया ।
“दूसरे दिन राजा अपनी यज्ञ-भूमि में पहुँच गया । उसने उस निर्मल आत्मा (शुन -
शेप) की पूजा आदि करके उसे यूपकाष्ठ से बाँध दिया । तब वह मुनि-पुत्र अत्यत शात
तथा निश्चल चित्त से उन मंत्रो का जप करने लगा । तब देवेन्द्र ने वहाँ आकर अवरीष
का यज्ञ सफल बनाया तथा रुचि मुनि के पुत्र को चिरंजीवी बनाकर देवताओ के साथ
(अपने लोक में) चला गया ।
“एक हजार वर्ष तक घोर तप करने के उपरान्त ब्रह्मा ने विश्वामित्र को दर्शन दिये,
और बोले—'तुम्हारी तपस्या सफल हुई । तुम्हें ऋषित्व प्राप्त हो गया ।'
“उनके चले जाने के पश्चात् भी विश्वामित्र अत्यत निष्ठा के साथ तपस्या करने
में ही संलग्न रहे । तब कामरूप धारण करने में चतुर, कामदेव का कमनीय वाण ही
अप्सरा के रूप में प्रकट हुआ हो, ऐसा दिखाई देनेवाला ललित योवन-कला-विलास से युक्त
मेनका (अप्सरा) जलक्रीडा करके वहाँ आई । उसका जूडा शिथिल हो रहा था । मनोहर
नेत्र, स्निग्ध कपोल, मंत्रमुग्ध करनेवाला मुख, माणिक्य के-से ओठ, मधुर-मद मुस्कान, स्वर्ण
कलश के समान कुच, सोलहो कलाओ से परिपूर्ण काति, स्वर्ण-चूर्ण झरनेवाले बाहुमूल,
ललित रोमराजि, सिंह की-सी कटि, पुन्नाग के पुष्प के सदृश नाभि, गुरु नितब, तथा काम-
विकारो को उद्दीपन करनेवाले ऊरुभाग से युक्त वह सुदरी विश्वामित्र के सामने उपस्थित हुई ।
अपने शरीर
५२ रंगनाथ रामायण
वायु-भक्षण करते हुए ग्रीष्म ऋतु में, आश्रम के बाहर, तथा जाड़े में जल-कुण्डों में खड़े
रहकर अत्यंत उग्र तप करने लगे ।
“इस प्रकार एक हजार वर्ष व्यतीत हो गये । एक दिन इन्द्र ने रंभा को देखकर
कहा—'हे सुंदरी, मैं तुमसे एक ऐसा कार्य कहूँगा, जिसमें देवताओं का हित निहित है ।
किसी तरह तुम कौशिक को काम-पीड़ित करके उनके तप में विघ्न डालो ।' तब रंभा ने
कहा—'हे देव, कौशिक क्रोध में मुझे शाप दे देंगे । इसीका मुझे भय होता है ।
ऐसे उग्र तप में लीन उस मुनि के पास पहुँचना क्या मेरे लिए संभव है ? हे शचीनाथ,
मैं आपसे क्षमा चाहती हूँ । मैं ऐसे महामूर्ख की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देख सकती,
आपके चरणों की सौगंध खाकर कहती हूँ । ऐसा मूर्ख कौन होगा, जो जान-बूझकर आग में
कूद पड़े ?'
यह सुनकर इन्द्र ने कहा—'यदि तुम्हें इतना भय है, तो मन्मथ और वसंत भी
तुम्हारे साथ जायेंगे, तुम जाओ ।' इन्द्र की इच्छा की अवहेलना न कर सकने के कारण वह
[L14
बालकांड ५३
कौशिक वडे उत्साह से उग्र तप कर रहे हैं । उनका मनोरथ पूर्ण करके यदि उनकी तपस्या
को बद नहीं करायेंगे, तो उस पुण्यात्मा विश्वामित्र के तप से उत्पन्न अग्नि से सभी लोक
भस्म हो जायेंगे ।'
“उनकी बातें सुनकर ब्रह्मा उनको साथ लिये हुए विश्वामित्र के पास आये और
बोले—'हे कौशिक सुनो । अब इस उग्र तप की आवश्यकता नहीं है । आज से तुम
ब्रह्मर्षि हो गये ।'
“तब कौशिक ने ब्रह्मा आदि देवताओ को देखकर वडी भवित तथा आश्चर्य के साथ
कहा—'यदि मैंने सच ही ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त कर लिया है, तो ब्रह्मा के पुत्र, चिर-
पुण्यात्मा, लोक-पावन वसिष्ठ आकर मुझे ब्रह्मर्षि कहें । तभी मैं विश्वास करूँगा ।'
“तब ब्रह्मा तथा देवताओ की प्रार्थना पर वसिष्ठ वहाँ आये और बोले—'अपने
उग्र तप से तुम ब्रह्मर्षि हो गये, इसमें कोई सदेह नहीं है । तुम प्रसन्न होकर जा सकते हो ।'
तब विश्वामित्र ने वडी भक्ति से वसिष्ठ की पूजा की । सभी देवता विश्वामित्र को आशीर्वाद
देकर देवलोक को चले गये ।
“विश्वामित्र की महिमा इन अद्भुत कार्यों
५४ रंगनाथ रामायण
हो गई । यह देखकर इस पृथ्वी के कई नरेशो ने उस कन्या के साथ विवाह करने की
प्रार्थना की । तब मैंने उन से कहा--'इस चन्द्रमुखी को प्राप्त करने के लिए एक कन्या-
शुल्क नियत है । (वह शुल्क) यह शिव-धनुष है । जो नरेश इस धनुष पर प्रत्यचा चढाकर
अपने भुज-बल का परिचय देगा, उसी को में अपनी पुत्री बडे हर्ष से दूंगा ।' बहुत-से
राजा आये, किन्तु कितने ही राजा उस धनुष को उठाने में भी असमर्थ होने के कारण
लज्जा से अपना सिर भी न उठा सके । इसलिए उन राजाओ ने सोचा--'पुत्री को देने
का वचन देकर, कोदण्ड का दुस्साध्य प्रतिबन्ध लगाकर जनक ने हमें अच्छी तरह भ्रम में
डाल दिया है । हम उन्हें युद्ध में परास्त करके उनसे प्रतिशोध लेंगे ।' इस प्रकार सोचकर
वे अपनी विशाल सेना के साथ एक वर्ष तक हमारे किले पर घेरा डाले रहे । जो अन्न
तथा खाद्य-सामग्री हमने पूर्व से किले में संचित करके रखी थी, सब समाप्त हो गई ।
अतः मैंने मन में विचार करके देवताओं की प्रार्थना की । उनकी कृपा से प्राप्त चतुरंगिनी
सेना के साथ मैंने शत्रु-सेना पर आक्रमण किया । इस सेना का सामना न कर सकने
के कारण कुछ लोग भीत होकर भाग खड़े हुए तथा कुछ मेरे साथ घोर युद्ध करके
हार गये और तितर-बितर हो गये । यदि राम अपनी आश्चर्यजनक शक्ति से उस शिव-
धनुष का संधान कर सकें, तो मे अपनी पुत्री का विवाह उनके साथ कर दूंगा ।"
३३ शिव-धनुर्भंग
इसके पश्चात् जनक ने धनुष की पेटी ले आने के लिए दस हजार बलिष्ठ सेवकों
को भेजा । वह लोहे की पेटी बहुत ही विशाल तथा आठ पहियों से युक्त थी । वे सभी
बलवान् उस पेटी को अपना सारा बल लगाकर इस प्रकार खींचकर लाने लगे, मानो मेरु
पर्वत को ही लिये आ रहे हों । यह देखकर जनक के अन्त पुर के परिचारक तथा परि-
चारिकाएँ, जानकी, उर्मिला तथा जनक की पत्नी के निकट जाकर बोलीं--“देवियो, हमारा
एक निवेदन सुनें । हमारी राज-सभा में गाधि-पुत्र कौशिक के साथ दो आजानुबाहु, देवों
तथा गंधर्वों से भी अधिक तेजस्वी, दो उत्तम नर-रत्नों को आया हुआ देखकर महाराज
जनक ने मुनि से प्रश्न किया कि ये कौन हैं ? तब कौशिक ने अत्यन्त हर्ष से कहा- 'हे
राजन्, ये दशरथ के पुत्र हैं । शिव-धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए यहाँ आये हैं ।
इसलिए आप योग्य व्यक्तियों को भेजकर धनुष को मँगवाइए ।' तब राजा ने अपने मंत्रियों
को बुलाकर धनुष को लाने के लिए भेजा है । हम वह दृश्य गवाक्ष से देख सकती हैं ।
आप भी शीघ्र चलकर देखिए ।"
परिचारिकाएँ जब राम के कुल, रूप, शौर्य तथा गुणों का वर्णन कर रही थीं,
तब सीता को ऐसा भान हो रहा था, मानो उनके कानों में सुधा की वर्षा हो रही हो ।
उन्हें रोमांच हो आया । उन्हें प्रीति तथा भय का अनुभव होने लगा । वे सिर झुकाये
खड़ी रहीं । लज्जा से अभिभूत उस सुन्दरी को चुपचाप खड़ी देखकर सखियाँ उनकी परि-
चर्या करने लगीं । गुलाब-जल में कुंकुम घोलकर एक ने उनके कपोलों पर सुन्दर ढंग से
'मकरिका-पत्र' की रचना की (चित्र बनाये) । दूसरी ने जवादियुक्त चंदन का लेप किया ।
एक दूसरी परिचारिका ने माथे पर कस्तूरी का तिलक लगाया और एक उनके सामने
दर्पण लिये खडी रही । एक युवती ने उनके केशो को कघा करके उनका जूड़ा बाँध दिया,
तो अन्य एक ने उसे निराले ढंग से पुष्पो से अलकृत कर दिया । एक रमणी ने उन्हें
सुगधित बीडा दिया । किसी ने उनकी कटि-तट पर किकिणियुक्त करधनी बाँधी, तो किसी
सुन्दरी ने उनके कुचो पर डोलनेवाले मोतियो के हार पहनाये । एक सखी ने चद्र-कान्ति-
सम धवल वस्त्र उन्हें उत्तम ढंग से पहनाये । इस प्रकार सभी सखियाँ सीता को एक स्वर्ण-
पीठ पर बिठाकर उनका अलकरण कर रही थी । अलकरण समाप्त होते ही जनक की
पत्नी उस कल्याणी राजकुमारी को साथ लेकर कनक-सौध के गवाक्ष के निकट आई ।
उन सब रमणियो के मन में 'सूर्यवश में उत्पन्न राघव को कब देखेंगे' ऐसा कुतूहल भरा था ।
उन्होने गवाक्ष से लोकाभिराम दिव्य धाम, अत्यत रूपवान्, विष्णु के समान तेजस्वी,
धनुर्धर, प्रत्यचा के चिह्न से अकित कर-कमलवाले राम को देखा । उनको देखकर सखियाँ
मन-ही-मन सोचने लगी, रूप और रग में ये अद्वितीय है । ये विष्णु के अशज है और
राजपुत्रो के रूप में जन्मे हैं । जानकी रामचन्द्र के लिए योग्य है और उर्मिला सौमित्र
के लिए । इस प्रकार सोचती हुई वे अत्यन्त आसक्ति के साथ सभा की ओर देखती
रही ।
इन्द्र-सभा के समान सुशोभित उस राज-सभा में धनुष की पेटी लाई गई । तब
महाराज जनक ने शुभमूर्ति गाधि-पुत्र को देखकर कहा—'हे मुनि, किन्नर, यक्ष, गधर्व,
देवता, पन्नग, तथा राक्षस आदियो में से कोई इस धनुष की डोरी को न चढा सका ।
फिर नरो की कौन कहे ? यह धनुष आप राम-लक्ष्मण को दिखाइए ।' तब मुनि ने
रामचन्द्र की ओर देखकर कहा—'हे रघुवश के वीर, इस महान् धनुष को उठाकर उसकी
प्रत्यचा चढा दो । आदिवराह का अवतार लेकर समस्त भूतल को सहज ही उठाकर अपनी
शक्ति का परिचय देनेवाले तुम्हारे लिए यह धनुष क्या वस्तु है ?'
इस प्रकार मुनि का आदेश प्राप्त करके राम, लक्ष्मण के साथ उठे । उनके मन में
प्रेम तथा उमग का सघर्ष हो रहा था । उन्होने अपना दुकूल उतार दिया और कमरवन्द
कसकर बाँधा । उस समय उनके मोहक रूप की काति सभी दिशाओ में बिखर रही थी ।
उस कमल-लोचन तथा अद्वितीय साहसी की करधनी की छोटी-छोटी घटिकाओ का सौदर्य
अद्भुत था । उनकी नव-रत्नमालिका वाहुओ तक डोल रही थी । उनके ककण और
अँगूठियो की काति चारो ओर छिटक रही थी । कर्णभूषणो की काति स्निग्ध कपोलो पर
प्रकाशित हो रही थी । उनके केश पीठ पर नृत्य कर रहे थे और कनक वर्णवाला उनका
शरीर चारो ओर अपनी आभा विकीर्ण कर रहा था । करोडो मन्मथो का-सा सौदर्य
लिये हुए वे मनुवश-तिलक गभीर गति से जनक की सभा में सब के सम्मुख आये और
धनुष की पेटी खोली । समस्त धरा को अपने ऊपर धारणकर चिरनिद्रा में सुख से सोने-
वाले शेषनाग के समान, काले वादलो के मध्य अपनी पूरी कान्ति को समेटकर अचल भाव
से रहनेवाले विद्युत्-दड के समान अनुपम सौदर्य से समन्वित धनुष को राम ने पेटी में से उठाया ।
वह अनुपम धनुष अरुण रत्न-प्रभा की-सी दीप्ति विखेरनेवाली अग्नि-ज्वाला के समान
ऐसा खडा था, मानो वह उसे उठाने के लिए वडे गर्व के साथ प्रयत्न करनेवाले राजकुमारो के
५६ रंगनाथ रामायण
बल को आहुति के रूप में निगलने के लिए उद्यत हो । राम जब उस धनुष की डोरी
चढ़ाने का उपक्रम करने लगे, तब विश्वामित्र बोले—‘राम अपनी समस्त शक्ति से सपन्न
होकर शिवजी के धनुष की प्रत्यच्च चढ़ा रहे हैं । हे धरती, तुम दोलायमान मत होओ ।
हे शेषनाग, तुम विचलित मत होओ । हे दिग्गजो, तुम सावधान रहो ।'
इसी समय राघव ने धनुष की डोरी चढ़ाई और अपने भुज-बल का परिचय दिया ।
वे जनक से बोले—‘हे भूपाल, यह धनुष बहुत ही पुराना, कमजोर, और घटिया है ।
यदि वाण का सधान किया जाय, तो यह टिक नही सकेगा । इसी धनुष की आपने इतनी
प्रशसा की थी ?'
इस प्रकार कहते हुए (राम ने) सुर, खेचर, भूसुर, किन्नर, नर तथा नृपतियों के
समक्ष धनुष की ऐसी टंकार की, मानो वह सब दिशाओ में उनकी विजय की घोषणा कर
रही हो । इसके पश्चात् उन्होंने चाप के गुण को (धनुष की प्रत्यचा को) आकर्णात् इस
प्रकार खींचा, मानो सीता के गुण उनके कानो तक पहुँच गये हो । (फिर) उन्होंने
अपनी मुट्ठी की पकड़ इस तरह ढीली कर दी, जैसे राक्षसो की पकड़ (शक्ति) ढीली
पड़ गई हो । तुरंत वह धनुष अरराकर टूट गया । दिशाएँ उस ध्वनि से गूँज उठीं ।
धनुष के टूटते ही सभी राजाओ का अभिमान भी चूर-चूर हो गया, सारी पृथ्वी में दरारें
पड़ गईं, दिग्गज कुचल गये, शेषनाग धँस गया, समस्त भूत भीत हो गये और सभी
लोक थर्रा उठे । उस कठोर ध्वनि को सुनते ही जनक, राम, लक्ष्मण तथा विश्वामित्र को
छोड़कर शेष सभी लोग मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े । जनक महाराज हर्ष तथा
विस्मय के साथ कौशिक को देखकर बोले—‘मैं अपने वचन के अनुसार विना विलव के '
ही अपनी पुत्री का विवाह इस महान् व्यक्ति से कर दूँगा । महाराज दशरथ को विवाह
के लिए सादर निमत्रण भेजूँगा ।'
इस प्रकार कहने के पश्चात् उन्होंने तुरंत अपने प्रिय मंत्रियो को बुलाकर दशरथ
को सारा समाचार सुनाकर उन्हें शीघ्र लिवा लाने के लिए भेजा । वे भी जवनाश्वो (तेज
घोड़ो) पर रवाना हुए और तीन दिन की यात्रा के उपरान्त साकेत (अयोध्या) पहुँच गये ।
वहाँ अपने पुत्रो की कुशल की चिंता में निमग्न राजा (दशरथ) को देखकर जनक के
मंत्री बोले—‘हे राजश्रेष्ठ, आपके पुत्र शौर्यनिधि रामचन्द्र ने कौशिक मुनि के यज्ञ की रक्षा
की और जनक महाराज का यज्ञ देखने (मिथिला) आये । वहाँ मुनि तथा अन्य राजाओ
के समक्ष उन्होंने उस शिव-धनुष का सधान करके उसे सहज ही तोड़ डाला, जिसे उठाना
सुरो तथा असुरो के लिए भी असंभव है । इसपर महाराज जनक ने अपनी पुत्री सीता का
विवाह राम के साथ करने का निश्चय किया है । उस विवाह में आपको सादर आमंत्रित
करने के लिए हमें भेजा है । इसलिए आप शीघ्र पधारें ।'
यह समाचार सुनकर राजा आनन्द-सागर में डूब गये । उन्होंने नगर-भर में विवाह
की सूचना देने के लिए दूत भेजे और महाराज जनक के मंत्रियो को श्रेष्ठ रत्न, आ