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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 508 में से

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पृष्ठ 72

४२ रंगनाथ रामायण
अलंकृत करनेवाले, दर्शकों को दोनों ही सब प्रकार से समान दीखनेवाले ये कुमार कौन हैं ?
किसके पुत्र हैं ? कृपया बताइए ।'
तब विश्वामित्र ने उसे देखकर कहा—"हे राजकुल-चन्द्र, हे सद्गुण-सागर, मैं इनका
वृत्तान्त तुम्हें सुनाता हूँ, तुम सुनो । सरयू नदी के किनारे कोशल-देश में अयोध्या नामक
नगर है । उस नगर में अत्यन्त प्रीति से प्रजा का पालन करनेवाले राजा दशरथ राज्य
करते हैं । यह उनका श्रेष्ठ पुत्र राम है । यह उनका अनुज लक्ष्मण है । मेरी प्रार्थना
पर राजा ने यज्ञ-रक्षणार्थ इन दोनों को मेरे साथ भेजा है । मेरे साथ आकर (इन दोनों ने)
मेरे यज्ञ की रक्षा की, युद्ध में बड़े पराक्रम के साथ सुबाहु का वध किया और
मारीच को परास्त किया। उनके पश्चात् मिथिला जाने के उद्देश्य से गंगा पार करके यहाँ आये हैं ।
ये राजचन्द्र सूर्य-वंश-तिलक हैं । उनके सामर्थ्य की कथा आश्चर्य में डालनेवाली है ।"
विश्वामित्र के वचन सुनकर राजा सुमति आश्चर्य-चकित हुआ । उसने उन राज-
कुमारों का आदर-सत्कार किया । उन्होंने प्रेम से राजा का आतिथ्य ग्रहण किया । सबने
रात्रि वहीं बिताई और प्रभात होने पर राजा ने उनको वहाँ से विदा किया ।
२९. गौतम के आश्रम का वृत्तान्त
(वहाँ से चलकर) मार्ग में चलने-चलते राघव ने गौतम के आश्रम को देखकर
गाधि-पुत्र को संबोधित करके कहा—"हे मुनीश्वर, ललित पल्लवों से युक्त, आम्र, कटहल,
नारंगी, जंबीर, नारिकेल, देवदारु, बिजोरी, नींबू, बेल, सुपारी, केला, अशोक, लाख, दाड़िम,
तेंदू, सेमल, चन्दन, कर्पूर, मीठे आम, भिलावाँ, गुग्गुल, आदि पेड़ों म सुशोभित, सिंदुवार, पुन्नाग,
मौलसिरी, चमेली, कुन्द, कर्चूर आदि पुष्पों की सुगन्धि मे परिपूर्ण, सर्वत्र व्याप्त लौंग तथा
एला की लताओं से युक्त, सरोवरों मे सुशोभित, रम्य पक्षियों के कल-कूजन से मुखरित
यह आश्रम-भूमि आज निर्जन क्योँ है ? इसके पहले कौन मुनि यहाँ तपस्या करते थे ?
कृपया बतलाइए ।"
तब मुनि ने कहा—"किसी समय गौतम मुनि अहल्या के साथ इस आश्रम में
अत्यन्त निष्ठा मे घोर तपस्या करते थे । यह देख इन्द्र ने उनकी तपस्या में बाधा डालनी
चाही । एक दिन उसने मुर्ग के रूप में पर्णशाला के पास पहुँचकर वाँग दी । मुनि (प्रात-
काल हो गया समझकर) अनुष्ठान करने के लिए (नदी-तट पर) चले गये । तब इन्द्र
गौतम का रूप धारण करके आया और अहल्या को देखकर कहा—'अभी रात्रि बहुत
बाकी है। हे सुन्दरी, यह तुम्हारा ऋतु-काल है । इस समय रति-क्रीड़ा करने की इच्छा
से ही मैं आया हूँ।' इस पर (सारी बातें जानकर) अहल्या ने कहा—'मैं जानती हूँ कि
तुम इन्द्र हो, अन्दर चले आओ ।' यों कहती हुई वह इन्द्र को पर्णशाला में ले गई
और उनके साथ रति-क्रीड़ा की । जब इन्द्र झिझक तथा भय से वहाँ से जाने लगा, तभी
गौतम मुनि वहाँ पहुँच गये । (इन्द्र को देख) उन्होंने शाप दिया—'रे पापी, क्या यह
तुम्हारे लिए उचित है कि तुम मेरा रूप धारण कर मेरी पत्नी से मिलो । इस पाप-कर्म
के लिए तुम अण्डकोश-रहित हो जाओ ।' गौतम का शाप अप्रतिहत होकर उसे लगा और
तुरंत उसके अण्डकोश भूमि पर गिर गये ।