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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 508 में से

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पृष्ठ 73

बालकांड ४३
“इसके पश्चात् गौतम ने अहल्या को देखकर कहा—‘हे नारी, तुम पाषाण होकर
इस भूमि पर पड जाओ और प्रचण्ड धूप में लोटती रहो ।' तब अहल्या ने उनसे पूछा—
'हे देव, आपके शाप का अंत कैसे होगा ?' तब गौतम ने कहा—‘वैकुण्ठवासी, अवाप्त-
कामी, लोक-रक्षक और पुराण-पुरुष (विष्णु) राम के रूप में जन्म लेंगे । कौशिक के
यज्ञ की रक्षा करने के बाद वे सूर्यवंशतिलक इसी मार्ग से आयेंगे । यदि उनके चरणों का
स्पर्श तुमसे होगा तो तुम शाप-मुक्त हो जाओगी ।' यों कहकर वे शीताद्रि के लिए
चल पडे । वही मुनि-पत्नी यहाँ पाषाण के रूप में पडी हुई है ।
“जब सुरराज (इन्द्र) ने अपनी दुर्गति का समाचार देवताओं से कहा, तब उन्होंने
मेष (भेड) का अंडकोश लाकर इन्द्र के शरीर में जोड दिया । इसी कारण से पुण्यवान्
लोग यज्ञ के समय मेषों का वध करते हैं ।
“इस प्रकार मुनि के शाप से पीडित अहल्या इसी तपोवन में पडी हुई है । हे
राम, हे पुण्यधाम, तुम उस अहल्या का दुख-मोचन करो ।”
यों कहकर विश्वामित्र (राम-लक्ष्मण के साथ) गौतम के आश्रम में आये । श्रीराम
का चरण छूते ही, बादलों के हटने पर प्रकाशित होनेवाले चन्द्र के समान, धुआँ से मुक्त
होने पर हवन-कुंड की अग्नि-ज्वाला के समान, कलंक-रहित कमलिनी के समान, मलिनता
से रहित स्वर्ण के समान, राम के चरण-कमलों के रज का स्पर्श होते ही पाप-मुक्त होकर
उस स्त्री (अहल्या) ने शिला का रूप तजकर निज रूप प्राप्त कर लिया । वह पहले ही
अपने पति से राम की महत्ता के विषय में सुन चुकी थी, इसलिए उस गजगामिनी ने
उस महापुरुष का आतिथ्य किया और कहा—‘आपके शुभागमन से मैं कृतार्थ हो गई ।
आपके चरण-कमलों ने मेरा उद्धार कर दिया । हे त्रिलोकीनाथ ! हे रघुनाथ ! आपका
चरणोदक ही आकाश-गंगा के रूप में धरती के समस्त पापों को दूर करने (पृथ्वी पर)
आया है । आपने अपने एक चरण से पृथ्वी को और दूसरे चरण से आकाश को नाप-
कर बलि को दबाया था, सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त होकर वेदों के शिरोभाग में विचरण
करनेवाले आपके चरण यदि मुझे शाप-मुक्त कर दें, तो इसमें आश्चर्य ही क्या है ?’
इस प्रकार अहल्या ने राम की स्तुति की । इतने में गौतम मुनि भी वहाँ आ पहुँचे ।
उन्होंने रघु रामचन्द्र की पूजा की और पूर्व-जन्म की सुकृति-रूपी अहल्या को स्वीकार करके
पूर्ववत् उसी आश्रम में रहने लगे । तब कुंभ-वृष्टि (घोर वृष्टि) हुई और देव लोग
दुंदुभियाँ बजाने लगे ।
३०. मिथिला में आगमन
वे पुण्यचरित वहाँ से चलकर जनक की राजधानी मिथिला नगर में पहुँचे, जो
गगनचुंबी प्राकारों, सौध-समूहों, रत्न-खचित गृहों, रमणीय राजमार्गों, दुर्गों, मनोहर उद्यानों,
सुन्दर वनस्पतियों तथा समस्त शुभों से परिपूर्ण था ।
जनक की यज्ञ-भूमि में कलिंग, नैपाल, कर्णाटक, लाट, मालव, सौवीर, मगध,
पांचाल, कुरु, पाण्ड्य, वर्वल, कुंतल, अवंती, मरु, तरुष्क, आभीर आदि देशों के राजा
विराजमान थे । वह यज्ञ-भूमि, यज्ञोपकरणों तथा उसके अनुरूप पशुओं, यूपकाष्ठ, दधि-क्षीर से