रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 76, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें"तब महाबली विश्वामित्र क्रोध में आकर बोले—'मैं आपसे यह गाय देने की प्रार्थना
क्यों करूँ ?' यह कहकर उन्होंने अपने हजारों सेवकों की सहायता से बलात् उस गाय को
पकड़कर ले जाने का प्रयत्न किया । तब उस गाय ने उनके पीछे न जाकर मुनिपुंगव को
देखकर कहा—'हे अनघ, वसिष्ठ, हे सयमीन्द्र ! कौशिक (अपने बल के) मद में मुझे
बलात् ले जाने का यत्न कर रहा है । हाय ! आप दुर्वार होते हुए भी उसे रोकते क्यों
नहीं ? निर्विरोध मुझे उसके हाथों में सौंपना, क्या आपको उचित जँचता है ? हे
अनघात्मा ! मैंने आपके प्रति कोई अपराध नहीं किया है, फिर भी मेरी उपेक्षा करना
क्या आपके लिए उचित है ?'
"धेनु की बातें सुनकर वसिष्ठ दयार्द्रचित्त होकर कहने लगे—'मैं तुम्हें क्यों छोड़ने
लगा ? राजा अपने भुज-बल से बलात् तुम्हें ले जा रहे हैं । यदि क्षत्रिय उद्दण्ड हो
जायें, तो ब्राह्मण उनका निवारण किस प्रकार कर सकते हैं ? यह गाधि-पुत्र इस पृथ्वी के
अधीश्वर हैं । इनके पास अक्षौहिणी सेना है । मैं इन्हें कैसे जीत सकूँगा ?'
"तब धेनु ने मुनि से कहा—'हे मुनिनाथ ! संसार में ब्राह्मण-तेज, क्षत्रिय के तेज
से अधिक बलवान् होता है, इसलिए मैं यह बात जानती हूँ कि कौशिक किसी भी दशा में
आपसे अधिक श्रेष्ठ नहीं हो सकता । आप मुझे आज्ञा दीजिए, मैं इसकी सारी सेना को
एक ओर से नष्ट कर दूँगी ।' तब वसिष्ठ ने गाय से कहा—'अच्छा, तो तुम सेना
उत्पन्न करके (राजा की सेना का) नाश करो ।'
"वसिष्ठ की आज्ञा मिलते ही धेनु ने हुंकार भरी । उसके हुंकार भरते ही उसके
कान, पूँछ, दाँत, रोम, खुर, जाँघ, आँख, घुटने, श्वास, गलकंबल, और रोम-कूपों
से भयंकर आकारवाले असंख्य किरात, पल्लव, काम्भोज तथा यवन वीर उत्पन्न हुए। वे
प्रचण्ड विक्रमी, अद्भुत आकार तथा विचित्र आयुध धारण किये हुए थे । उनके नेत्र और
हुंकार अनोखे ढंग के थे । योद्धाओं का वह समूह हाथी तथा अश्वों पर (आरूढ होकर)
विश्वामित्र की सेना का संहार करने लगा यह देखकर विश्वामित्र के पुत्र विविध आयुधों
से सुसज्जित होकर वसिष्ठ का वध करने आये । किन्तु धेनु के हुंकार-मात्र से भस्म
हो गये ।
"अतुल पराक्रमी वीरों से पूर्ण अपनी सेना को मृत्यु का ग्रास बनते देखकर तथा
अपने सौ वीर पुत्रों की मृत्यु का विचार करके विश्वामित्र दुःख तथा शोक से संतप्त हो उठे ।
वे अपने एक पुत्र को अपना राज्य सौंपकर तप करने के लिए हिमालय में चले गये ।
वहाँ उन्होंने जल में खड़े रहकर त्रिपुरांतक ( शिव ) के प्रति घोर तपस्या की ।
शिवजी प्रत्यक्ष हुए और विश्वामित्र ने उनसे विविध दिव्यास्त्र प्राप्त किये ।
"इसके पश्चात् विश्वामित्र बड़ी शीघ्रता से वसिष्ठाश्रम के पास आये और (उस
आश्रम पर) आग्नेय बाण चलाने लगे । उनके बाणों के तेज से वसिष्ठ के आश्रम में
अग्नि की ज्वालाएँ फैल गईं । यह देखकर वसिष्ठ, काल-दण्ड लिये हुए यमराज के समान
क्रोधोन्मत्त हो अपने हाथ में अधारी लिये हुए बाहर आये और बोले—'हे पापी, हे विश्वा-
मित्र, क्या इस प्रकार कहीं पुण्य-भूमि तपोवन को जलाया जाता है ? तुम्हारी शक्ति कितनी है,
और मेरी शक्ति कितनी ? (क्या इसका भी तुम्हें ज्ञान है ?)'