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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 67

“तब गगा उनके जटा-जूट के दक्षिण भाग मे बाहर निकली । उस मदाकिनी की
धारा में मुकुलित कमल ऐसी शोभा दे रहे थे, मानो वह (मदाकिनी) पाताल की ओर
देखकर अपनी दिव्य-दृष्टि से वहाँ के कपिल मुनि को पहचानकर, उनकी महिमा पर
आश्चर्य करती हुई हाथ जोड़े उनसे प्रार्थना करती हो कि (हे मुनि) आपको जिन भयंकर
व्यक्तियो ने दुःख दिया था, उन्हें सुगति प्रदान करने के लिए मैं आ रही हूँ, आप क्रोध
न करें । उस धारा में भँवर ऐसे पड़ रहे थे, मानो उस मुनि के क्रोध की कल्पना करके
मदाकिनी भय से व्याकुल हो रही हो । धारा के बीच कमल-पुष्पो के भीग जाने मे उनमें
बैठे न रह सकने के कारण भ्रमर आकाश में व्याप्त हो, इस प्रकार गुजार कर रहे थे,
मानो सगर-पुत्रो के पाप, वेग से आनेवाली मदाकिनी की धारा को देखकर इधर-उधर
भागते हुए शिवजी से विनती कर रहे हो कि (हे शिवजी) गगा हम पर आक्रमण करने
के लिए आ रही है, हम अब भागकर कहाँ जायें ? हंस आकाश-पथ में ऐसे मँडरा रहे थे,
मानो शिव के जटा-जूट से पृथ्वी पर उतरनेवाली गगा को धूप से बचाना चाहते हों।
उस नदी की सुन्दर तथा उत्तुंग लहरें ऐसी शोभा दे रही थी, मानो वे सगर-पुत्रो
के पाप-समूह को मिटानेवाले उस (नदी के) हाथ हो । धारा इतने अधिक फेन मे
व्याप्त थी, मानो भगीरथ की अनुपम कीर्त्ति समस्त संसार में व्याप्त होने के लिए एकत्र
हो रही हो । उस नदी का अतुल घोष क्रमशः बढ़ता हुआ सारे ब्रह्माण्ड तथा आकाश में
व्याप्त हो गया । इस प्रकार वह शिव के जटा-जूट मे विंदु-सरोवर में यह कहती हुई
उतरी कि मैं इस संसार के पापियो को पुण्य प्रदान करने के लिए आ रही हूँ । ब्रह्मा
आदि देवता उसकी स्तुति करने लगे । सुर तथा खेचर बडे उत्साह से यह दृश्य देखने लगे ।
गरुड तथा गंधर्व उसकी प्रशंसा करने लगे ।
“मदाकिनी की धारा की सात शाखाएँ हुईं । पावनी, ह्लादिनी, और नलिनी नामक तीन
शाखाएँ पूरव की ओर गईं । सीता, सुचक्षु तथा सिंधु नामक तीन शाखाएँ पश्चिम की
की ओर गईं । एक शाखा राजा भगीरथ के पीछे भूलोक की ओर चली । वह श्रेष्ठ
तथा विशाल जल-धारा आकाश-मार्ग में शरत्काल के वादल के समान शोभित हो रही थी ।
वह जल-धारा, पृथ्वी की तरफ इस प्रकार उतर रही थी, मानो स्वर्गकामी भूलोक-
निवासियो के लिए सीढ़ी लगी हो । उसकी तरगो की ध्वनि पृथ्वी तथा आकाश को गुंजा
देती थी । उस धारा में ऐसे भँवर पड़ रहे थे, मानो वह यह बताना चाहती हो कि मैं
(पृथ्वी) के समस्त पापो को उसी तरह नचा दूँगी (ध्वंस कर दूँगी) ।
“पृथ्वी पर उसके उतरते समय जल की बूँदें आकाश की तरफ ऐसे उछल रही थी,
मानो वे नक्षत्रो से मित्रता करना चाहती हो । उसका स्वच्छ फेन-समूह ऐसा सुशोभित
हो रहा था, मानो वह नदी (बडे हर्ष से) हँसती हुई यह कह रही हो कि में धर्मात्माओ
की पवित्र कीर्त्तियो के लिए योग्य स्थान हूँ । उस धारा में क्रीडा करनेवाली
मछलियाँ ऐसी दीख रही थी, मानो नदी कह रही हो कि मैं अपने असंख्य नेत्रो से पृथ्वी
की श्रेष्ठता देखूँगी । इस प्रकार भिन्न-भिन्न जलचरो से युक्त हो, वह नदी पृथ्वी पर
उतर आई ।