रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० रंगनाथ रामायण
के पुत्रों ने उसे स्वीकार कर लिया । इसलिए, वे सुर के नाम से विख्यात हुए । इसके
पश्चात् उच्चै श्रवा नामक अश्व, श्वेत गज (ऐरावत) तथा कौस्तुभ-मणि का जन्म हुआ ।
कौस्तुभ-मणि के बाद अमृत उत्पन्न हुआ । अमृत के बाद सुधा-कमण्डल को लिये धन्वन्तरि
का जन्म हुआ । फिर विष उत्पन्न हुआ । जब वह (विष) अत्यन्त भयंकर अग्नि के
समान व्याप्त होने लगा, तब शिव ने उसका पान किया । इसके उपरान्त अमृत के लिए
सुर और असुर परस्पर युद्ध करने लगे । उस समय उन सुरासुरों को देखकर सुरों पर
कृपा करते हुए, विष्णु एक सुन्दरी का रूप धारण कर आये और अमृत का वितरण करने
लगे । उस समय राहु तथा केतु नामक राक्षस (विष्णु के मन की बात जानकर) सुरों
की पंक्ति में आकर बैठ गये और अमृत के लिए हाथ फैलाया । उनके शरीर की कान्ति
देखे बिना ही उस सुन्दरी ने अमृत दे दिया । रवि तथा शशि ने बड़ी घबराहट के साथ
इसे देखा और सुन्दरी को आँख के संकेत से यह बताया । तब विष्णु ने क्रुद्ध होकर अपना
चक्र उन (राक्षसों) पर चलाकर उनके सिर काट डाले । उन्होंने उन राक्षसों के सिरों को
ग्रहों के रूप में आकाश में प्रतिष्ठित किया । अमृत-पान करने से वे मृत्यु को प्राप्त हुए
बिना रहने लगे । उसी दिन से वे (राक्षस) पुण्य के दिनों में सूर्य और चन्द्र को
पीड़ा पहुँचाने आ रहे हैं ।
"सुन्दरी ने असुरों की आँख बचाकर सुरों को ही अमृत दिया और युद्ध में उनकी
विजय भी प्रदान की । इन्द्र ने सभी दैत्यों का नाश किया और तीनों लोकों का अधिपति
बनकर राज्य करने लगा ।
"अपने सभी पुत्रों की मृत्यु से दुःखी होकर दिति ने बड़ी दीनता से अपने पति कश्यप
से कहा—'हे महात्मा, आप मुझे एक ऐसा पुत्र प्रदान कीजिए, जो इन्द्र को भी मारने
की शक्ति तथा पराक्रम रखता हो ।' उसकी प्रार्थना स्वीकार करके कश्यप ने कहा—'हे
भद्रे, यदि तुम एक हजार साल तक शुद्धात्मा तथा पवित्र रह सकोगी, तो तुम्हें तीनों लोकों को
जीतनेवाला तथा इन्द्र का अन्त करनेवाला पुत्र मुझसे प्राप्त होगा ।' यों कहकर उन्होंने
अपने कर-कमल से दिति के शरीर का मृदु गति से परिमार्जन कर दिया । इसके पश्चात्
वे तप करने चले गये ।
"उनके चले जाने के बाद दिति 'कुशप्लव' (नामक स्थान में) उग्र तपस्या करने
चली गई । यह वृत्तान्त जानकर इन्द्र माता दिति के पास शिष्य के रूप में पहुँच गया
और बड़ी भक्ति के साथ उनकी पूजा-अर्चना करने के लिए आवश्यक कुश, समिधा,
फल, कन्द-मूल, जल आदि वस्तुएँ जुटाते हुए सतत उनकी सेवा-परिचर्या करता रहा । दिति
जब जो वस्तु चाहती, वह उसके संकेत-मात्र से ही वह वस्तु वहाँ प्रस्तुत कर देता था । इस
प्रकार नौ सौ निन्यानवे वर्ष बीत गये ।
"एक दिन दिति अपने मन की बात छिपा नहीं सकी । उन्होंने इन्द्र से कहा—
'हे इन्द्र, मैंने तुम्हारे पिता से एक पुत्र की प्रार्थना की थी । एक हजार वर्ष के उपरान्त
मुझे एक पुत्र होगा, ऐसा वर उन्होंने मुझे प्रदान किया है । आज से दस वर्ष के पश्चात्
तुम्हारे भाई का जन्म होगा । तुम और वह दोनों तीनों लोकों का राज्य करोगे और
यशस्वी बनोगे ।'