रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड | ४१
उस दिन मध्याह्न के समय दिति थकावट के कारण अपने केश बिखेरकर (खाट
पर) पायताने की तरफ सिर रखकर सो गईं । उन्हें इस प्रकार देखकर इन्द्र बहुत प्रसन्न
हुआ और सोचा कि यही मेरे लिए अच्छा अवसर है । उसने अपनी योग-शक्ति से दिति के
गर्भ में प्रवेश किया और अपने वज्रायुध से अपने शत्रु-शिशु के खण्ड-खण्ड करने लगा ।
शिशु का रुदन सुनकर दिति जाग पडी । तब इन्द्र धीरे-धीरे कहने लगा—'मा रुद मा
रुद (मत रोओ, मत रोओ) । दिति चिल्लाने लगी—'शिशु का वध मत करो।' दिति का
क्रन्दन सुनकर इन्द्र गर्भ से बाहर आ गया और हाथ जोडकर बडी भक्ति के साथ
दिति से कहा--'माता, आप मुक्तकेशी होकर पायताने की ओर सिर किये सो रही थी ।
इससे आपकी पवित्रता में भग पड गया । इसलिए मैंने अपने कार्य की सिद्धि के लिए
आपके गर्भ में प्रवेश करने का साहस किया और मेरा नाश करने के लिए उत्पन्न होने-
वाले गर्भस्थ शिशु के सात खण्ड कर दिये । नन्हा शिशु मेरा शत्रु था, इसलिए मैने उसका
वध किया । हे माता, धर्म का विचार करके आप (मुझे) क्षमा कीजिए ।' इस प्रकार
इन्द्र दुख प्रकट करने लगा ।
“इन्द्र को दुःखी देखकर दिति ने कहा—'हे स्वर्ग के स्वामी, इसमें तुम्हारा कोई
दोष नही है । सारा दोष मेरा ही है । ये सातो खण्ड मरुत नाम से तेजस्वी बनकर
उत्पन्न होगे । तुम उन्हें इच्छानुसार सारे ससार में विचरण करने देना । तुम मेरे इन
सातो पुत्रो को सप्त मारुतो के गण-नायक बनाना । यही तुमसे मेरी विनती है ।'
“इन्द्र उनकी प्रार्थना स्वीकार करके इन्द्रलोक को चला गया । वे सातो शिशु क्रमश
इन्द्र की मित्रता प्राप्त करके मरुद्गण तथा देवता बन गये । इसी पुण्य-प्रदेश में देवेन्द्र ने
दिति की परिचर्या की थी । वही पर इक्ष्वाकु नामक राजा ने अपनी रानी अलंबुषा से
'विशाल' नामक पुत्र उत्पन्न किया था । उस विशाल ने यहाँ 'विशाला' नामक नगर का
निर्माण किया । उस विशाल के हेमचन्द्र नामक पुत्र हुआ । उसने सुचन्द्र को, सुचन्द्र ने
धूम्राश्व को, धूम्राश्व ने सृजय को, सृजय ने कुशाश्व को, उसने सोमदत्त को, सोमदत्त ने
ककुत्स्थ को और ककुत्स्थ ने सुमति को जन्म दिया । वह सुमति अभी इस नगर में रहते
हुए अत्यन्त धर्म-बुद्ध होकर राज्य कर रहा है । हे अनघ, धर्म तथा वैभवसपन्न ये राजा
ससार में 'वैशालिक' के नाम से विख्यात है । हम यहाँ आज की रात्रि बितायें और
प्रात काल होते ही राजा को देखने चलेंगे ।”
वहाँ का राजा सुमति विश्वामित्र के आगमन का समाचार जानकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ ।
वह अपने पुरोहित तथा वधु-जनो के साथ नगर के बाहर आया और विधिवत् सयमीन्द्र
विश्वामित्र की पूजा करके उनसे हाथ जोड़कर बडी श्रद्धा से कहा—'हे मुनीन्द्र, में आज
इस पृथ्वी पर धन्य हुआ । मेरा जन्म सार्थक हुआ ।'
परस्पर कुशल-प्रश्नो के पश्चात् सुमति ने विश्वामित्र को सबोधित करके कहा—
'हे मुनिनाथ, आपके साथ रहनेवाले असमान रूपवान्, विशालबाहु, दिव्य-पराक्रमी, गज की
गतिवाले, सिंह-सम शक्तिशाली, ललित तथा प्रफुल्ल अरविंद-सम नेत्रवाले, धनुष तथा करवाण-
धारी, आकाश जैसे रवि-शशि के सचार से अलकृत होता है, वैसे ही आपके पदन्यास को
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