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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 508 में से

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पृष्ठ 69

बालकाण्ड ३९
को प्राप्त करो । तुम सुन्दर धर्मों के आधार हो गये । अब तुम इस पुण्य-सलिल में विधिवत्
पुण्य-स्नान करके उसका फल प्राप्त करो ।' यों कहकर कमलसम्भव (ब्रह्मा) अपने
लोक को चले गये ।
"उसके पश्चात् भगीरथ ने गंगा में स्नान करके बड़ी निष्ठा के साथ साठ हजार
सगर-पुत्रों की तिलोदक-क्रिया की । उस पुण्य-क्रिया के फलस्वरूप सगर-पुत्रों ने अमरत्व
प्राप्त किया और भगीरथ को आशीर्वाद देकर स्वर्गलोक सिधारे । पुण्यवान् भगीरथ अयोध्या
लौटकर सुख से राज्य करने लगे ।
"पापों का नाश करनेवाला यह उपाख्यान जो कोई भक्ति से पढ़ेगा या सुनेगा, वह अनन्त
पुण्य प्राप्त करता हुआ धन-धान्य तथा यश से समृद्ध हो चिरजीवी होगा । उसपर सभी देवता
प्रसन्न होंगे, उसके सभी कार्य सिद्ध होंगे, उसे स्वर्ग की प्राप्ति होगी तथा उसके पितरों को
सद्गति मिलेगी ।”
इस प्रकार राघव ने गंगावतरण की कथा कौशिक से सुनकर उनकी प्रशंसा
करते हुए कहा—'हे मुनीन्द्र में आपसे पृथ्वी पर गंगावतरण की कथा बड़े आश्चर्य के साथ
सुन प्रसन्न हुआ ।'
(उन्होंने) वह रात्रि वहीं बिताई और प्रातःकाल ही उस प्रसिद्ध नदी में स्नान
करके संध्या आदि कार्यों से निवृत्त होकर जाह्नवी नदी को पार किया । नदी के उत्तर
तट पर निवास करनेवाले मुनियों की बड़ी भक्ति के साथ पूजा की और उस स्थान को
छोड़कर आगे चले ।
थोड़ी दूर जाने पर उन्हें 'विशाला' नामक सुन्दर नगर दिखाई पड़ा । तब राम ने
गाधेय को संबोधित करके पूछा—'हे मुनि, इस नगर का नाम क्या है ? किस वंश का
राजा यहाँ राज्य करता है ? आप कृपाकर बतलाइए ।'
२८. अमृत-मंथन की कथा
तब कौशिक ने राघव से कहा—"मैंने बहुत पहले यह कथा इन्द्र से सुनी थी ।
प्राचीन काल में दिति के अत्यन्त बलवान् तथा पराक्रमी पुत्र तथा अदिति के बड़े धर्मात्मा
पुत्र उत्पन्न हुए । उन्होंने सोचा कि क्षीरसागर को पहले रस तथा ओषधियों से भरकर
उसका मथन करें और उस जलराशि से उत्पन्न होनेवाली श्रेष्ठ तथा कान्तियुक्त वस्तुओं को
बड़ी प्रसन्नता से ग्रहण करें । (इस प्रकार सोचकर) वे मंदर-पर्वत को मथनी और
वासुकी को रस्सी बनाकर मथन करने लगे । उस समय समुद्र में से समस्त लोकों को,
मन्मथ-समुद्र में डुबोने की क्षमता रखनेवाला सौन्दर्य, क्वणित होनेवाली करधनी से युक्त
गुरु नितम्ब, क्षीण कटि, सुन्दर कुच, कोमल भ्रू-लता-रूपी कोदण्डवाले कामदेव के बाणों के
समान (तीक्ष्ण) कटाक्ष, भव्य भुज-लता-विक्षेप, अमर नव-यौवन तथा कमनीयता से
सुशोभित साठ हजार अप्सराएँ तथा उन सुन्दरियों के योग्य हाव-भावों से युक्त परिचारिकाएं
उत्पन्न हुईं । उन अप्सरा-युवतियों को देवता तथा दैत्यों ने क्रमश ले लिया । उसके
पश्चात् भी समुद्र-मंथन चलता रहा । तब वरुण की पुत्री वारुणी का जन्म हुआ । दिति के
पुत्रों ने उसका वरण करना स्वीकार नहीं किया । इसलिए वे असुर कहलाये । अदिति