रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 75, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकांड ४५
आश्रम नाना प्रकार की सुगन्धित पुष्प-मंजरियों से तथा विविध प्रकार के फलों से लदे
वृक्षों से भरा था । पक्षियों का कलरव तथा वेद-घोषों से सारा आश्रम गूंज रहा था ।
उसमें कई सरोवर तथा यज्ञ की वेदियाँ थीं । भिन्न-भिन्न जाति के मृग अपने स्वभाव-सुलभ
वैर को भूलकर वहाँ विचरण कर रहे थे । उनका आश्रम वायु, जल तथा (वृक्षों से
गिरे) पाण्डु-पत्रों पर जीवन व्यतीत करते हुए तप करनेवाले मुनियों, योगियों, पुंगवों, पन्नगों,
खेचरों, सिद्धों, सुपर्वों तथा किन्नरों से युक्त होकर ब्रह्मलोक के समान सुशोभित था ।
विश्वामित्र ने बड़ी प्रसन्नता तथा भक्ति से वसिष्ठ को प्रणाम किया । उन्होंने आशीर्वाद दिये
और उचित आसन पर बिठाकर उनका सत्कार किया और सुस्वादु फल, मूल आदि
प्रस्तुत किये ।
"विश्वामित्र ने उन सबको ग्रहण करते हुए हाथ जोड़कर बड़ी भक्ति के साथ
पूछा—'हे अनघात्मा ! लोकहितार्थ चलनेवाले आपके तप तथा हवन आदि अच्छी तरह
हो रहे हैं न ? आप, आपके शिष्य और आश्रम के सभी व्यक्ति प्रसन्न तो हैं ?'
"तब वसिष्ठ ने कहा—'हम सब प्रसन्न हैं । आप नीति-युक्त हो राज्य कर
रहे हैं न ? स्नेह के साथ अपने भृत्यों का पालन करते हैं न ? राज्य के सभी अंगों का
( उचित रीति से ) पर्यवेक्षण कर रहे हैं न ? आक्रमण करनेवाले शत्रुओं को आप
पराजित कर तो रहे हैं न ? आप स्वयं सकुशल तो हैं ? आपके पुत्र और पत्नियां
कुशल से हैं न ?'
"तब कौशिक ने वसिष्ठ से कहा—'महात्मा, आपकी कृपा से हम सब कुशल-मंगल
से हैं ।' तब वसिष्ठ ने कहा—'राजन् मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप मेरे यहाँ
भोजन करके यहाँ से जायें ।"
"कौशिक ने उनका निमंत्रण स्वीकार किया । वसिष्ठ ने विश्वामित्र तथा उनकी
सेना को भोजन देने के उद्देश्य से अपनी काम-धेनु का स्मरण करके उससे प्रार्थना की कि
राजा तथा उनकी सेना को विविध मिष्टान्न तथा भोजन से तृप्त करना है । इसके लिए
आवश्यक वस्तुओं का तुम प्रबंध करो ।
"तब कामधेनु विभिन्न प्रकार के भात, शाक, मिष्टान्न, अँचार, विविध फल, खीर,
मक्खन, चीनी, ताजा घी, कई प्रकार के मद्य और मांस आदि से युक्त बढ़िया भोजन का
प्रबंध किया । जिसकी जो इच्छा होती, वह उसे बिना माँगे ही मिल जाता था ।
गाधेय तथा उनके सैनिक भर-पेट भोजन करके संतुष्ट हुए ।
"इसके पश्चात् गाधि-पुत्र ने मन में सोचा कि इस कामधेनु को किसी भी तरह
मुनि से ले लेना चाहिए । वे मुनि के पास जाकर बोले—'हे मुनिवर, मैं आपको एक
लाख अश्व, एक लाख हाथी, एक लाख गायें और कई हजार मणियाँ दूँगा । आप
यह गाय मुझे दे दें ।' इस पर मुनि अत्यन्त दुःखी होकर बोले—'हे राजन्, यह गाय मेरा
जीवन है, मेरा प्राण है, मेरी तपस्या का साधन है । हव्य-कव्य तथा अतिथि-सत्कार इसी
गाय के कारण बिना विघ्न के संपन्न होते हैं । अतः इस पुण्य-धेनु को मैं तुम्हें दे नहीं
सकता ।'