रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 68, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें३८ रंगनाथ रामायण
“तब सौ-सौ सूर्यों की कान्ति के समान प्रकाशित होनेवाले, बहु-रत्न-खचित आभूषणो
की कान्ति-से सारे आकाश को दीप्तिमान् करने हुए, गज तथा विमानो-में आरूढ होकर
अमर, गवर्व तथा सिद्ध वडे कौतुक से इस दृश्य को देखने आये । उस प्रवाह-की-चंचल
गति को देखकर महानागो ने भी उनके सामने घुटने टेके ।-देवताओ ने-जप आदि-करके
उस नदी में स्नान किया और बहुत ही प्रसन्न हुए । अप्सराओ ने नृत्य किया, देवो तथा
मुनियो ने बडे हर्ष से उस नदी की पूजा-पुष्पो से की । उस पुण्य-नदी की धारा में
अमित पापी तथा शाप-पीडित जन स्नान करके स्वर्ग जाने लगे । देवता, अप्सराएँ, गवर्व,
दनुज, पन्नग, यक्ष, किन्नर आदि बडे उत्साह से भगीरथ के रथ के पीछे-पीछे चले ।
“तब वह गंगा बडे-बडे पर्वतो को भेदती हुई भगीरथ के पीछे-पीछे जाने लगी ।
उसी मार्ग में जह्नु नामक ऋषि की यज्ञ-भूमि थी । गगा ने अपने अतुल प्रवाह से उस
आश्रम-भूमि को घेर लिया । यज्ञोपकरण सभी गगा के प्रवाह में बह गये । यज्ञ में विघ्न
पडा हुआ देख, जह्नु क्रुद्ध हुए और उद्धत गति से आनेवाली उस गगा का सारा जल
पी गये । तब देवता तथा मुनियो ने भगीरथ से कहा—‘हे राजन्, यह मुनि क्रोध-में
आकर गगा को पी गये है । आप उनसे अपना क्रोध त्यागने तथा गगा को 'मुक्त करने
की प्रार्थना कीजिए । मुनि प्रसन्न होकर आपकी प्रार्थना स्वीकार करेंगे ।' तब भगीरथ
बडी भक्ति तथा विनय के साथ हाथ जोडकर उस मुनि से प्रार्थना करने लगे ।
“हे मुनिचन्द्र, हे विमलात्मा, मे इस श्रेष्ठ गगा को घोर तपस्या के उपरान्त पृथ्वी
पर ला सका हूँ । किंतु, यहाँ आने के बाद मै उसे खो बैठा । हे धन्यचरित, हे सयंमीन्द्र,
आप कृपाकर उसे मुक्त कर दें ।' (राजा की बात सुनकर मुनिवर के मन में दया उत्पन्न
हुई) वे बोले-‘हे भगीरथ, गगानदी को इस प्रकार पृथ्वी पर ले आने में आपकी तपस्या,
आपके महत्त्व तथा आपकी कीर्ति का वर्णन मै कैसे करूँ ? अब मे गंगा को मुक्त कर दूंगा ।
इस ससार में आपके यश की व्याप्ति होगी ।'
“इस प्रकार कहकर, गगा को मुंह से छोडकर उसे जूठान-करने की 'इच्छा से
उन्होंने अपने कान के मार्ग से उसे बाहर छोड दिया । पूर्व की तरह गगा प्रवाहित
होने लगी । तभी उसका नाम जाह्नवी पड़ गया ।
“जिस प्रकार पूर्वकृत पुण्य जीवन के विघ्नो को दूर करता हुआ आता है, उसी
प्रकार जाह्नवी राजा के पीछे चली और समुद्र में प्रवेश करके रसातल में पहुँच गई ।
वहाँ सगर-पुत्रो की भस्म-राशियो को अपने पुण्य-सलिल से सींचा । तब कमलासन (ब्रह्मा) ने
बडे हर्ष से भगीरथ से कहा—‘हे राजन्, जबतक समुद्र में जल रहेगा तबतक ये
सगर-पुत्र दिव्य चदन, वस्त्रामूषणो से अलकृत 'हो स्वर्ग-लोक में दिव्य भोगो का अनुभव
करेंगे । हे अनघ, आज से यह नदी भागीरथी, त्रिपथगा तथा जाह्नवी के नामो से-समस्त
लोको में विख्यात होगी । तुम्हारे पूर्वज सगर, अंशुमान् तथा दिलीप ने जो-सकल्प किया था,
वे उसे सिद्ध नही कर सके । तुम बडे प्रयत्न के उपरान्त गगा को 'इस पृथ्वी पर ले
आये हो, (अतएव) तुम गगाजल के निर्मल तथा कमनीय पद को प्राप्त करके चिर कीर्ति-
वान् होकर निवास करो । काकुत्स्य-वश की प्रतिष्ठा तथा गौरव के आधार-स्वरूप पुत्रो