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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

इस पृथिवी पर सुकेत नामक एक यक्ष ने पूर्व में ब्रह्मा की तपस्या की थी और
अत्यधिक भक्ति से उनको तृप्त किया और उनसे एक पुत्र माँगा । (तब ब्रह्मा ने कहा)
'मैं तुम्हें पुत्र नही दूंगा । एक हजार हाथियो का बल रखनेवाली एक पुत्री दूंगा ।' उस
वर से उसे एक लडकी प्राप्त हुई । उसने विचार करके अपनी उस लडकी का विवाह
सुद (नामक व्यक्ति) से कर दिया । उसने (सुद ने) उस स्त्री से 'मारीच' तथा 'सुबाहु'
नामक दो भयंकर शक्तिशाली पुत्र उत्पन्न किये । इसके पश्चात् उसकी मृत्यु हो गई । वह
स्त्री अपने पुत्रो के साथ वडे गर्व से अगस्त्य के आश्रम में जाकर वार-वार उनवो तग
करने लगी । अगस्त्य ने इन पापियो को देखकर क्रोध से उन्हें राक्षस वन जाने का शाप
दिया । उस दिन से राक्षस-रूप धारण कर निर्दयी हो वह मनुष्यो का आहार करती हुई
यही रहती है और पृथ्‍वी को दुख देती है । तुम्हारे अतिरिक्त कोई इसे मार नही सकता ।
सिवा तुम्हारे हाथ के किसी से यह नही मरेगी । यह मत कहो कि यह स्त्री है, इसलिए
इसे मारना नही चाहिए । यदि गो-ब्राह्मणो का हित हो, तो यही कारण स्त्रियो को मारने
के लिए राजाओ को पर्याप्त है । प्राचीन काल में सारे ससार का नाश करने के लिए
उद्यत, मतिमान् विरोचन की दुष्टा पुत्री को क्या इन्द्र ने क्रोध से नही मारा था ? क्या
वह कार्य (ससार में) स्तुत्य नही हुआ है ? पहले दृढ़ व्रतवाली भृगु-पत्नी के ससार में
अशान्ति फैलाने का उपक्रम करने पर क्या विष्णु ने (स्वयं) उस स्त्री का वध नही किया था ?
इसलिए हे पुण्य-चरित्र, लोकहित के लिए स्त्रियो का वध करना भी पुण्य ही है ।"

२१. ताड़का का वध

विश्वामित्र के ऐसे अनुपम वाक्यो तथा अपने पिता के आदेश का विचार करके
राघव ने , उस ब्रह्मर्षि के वचन की अवहेलना नही करते हुए कहा कि मैं ताडका को
दण्ड दूंगा । उन्होने (अपने) धनुष की टकार से सारे आकाश को गुंजा दिया । (उसे सुनकर)
ताडका क्रोध से उबल उठी । कर्ण-कठोर धनुष की टकार सुनकर उसका चचल लाल नेत्रो
वाला मुख विकृत हो उठा । वह अपने दोनो हाथो को ऊपर उठाये हुए इस प्रकार आने लगी,
जैसे पखोवाला पहाड वडे वेग से आ रहा हो । प्रकट अट्टहास से उसके वडे-वडे
दष्ट्रो की काति चारो ओर बिखर रही थी । (चलते समय) वह अपने पदाघात से अपनी
अमित शक्ति का परिचय पृथ्‍वी को दे रही थी । सारा आकाश एकदम हिल-सा गया ।
इस प्रकार आनेवाली ताडका को देखकर दाशरथि राम ने सभ्रम-चित्त से अपने भाई से
कहा—'देखा तुमने इसका ढग, इसका रूप और इसकी भयंकर दृष्टि । इसको देखने पर
किसे भय नही होगा ? मैं अवश्य इसका वध करूँगा ।"
इस प्रकार (श्रीराम) कह ही रहे थे कि (अपने) गर्जन से समस्त आकाश को
कँपाती हुई, अपनी पद-धूलि से समस्त (ससार) को ढकती हुई वह भयंकर राक्षसी वडी-
वडी शिलाओ की वर्षा करने लगी । इससे क्रुद्ध हो राघव ने अपने अनुपम अस्त्रो से
उन शिलाओ को काट डाला और उस (राक्षसी) के दोनो हाथ भी काट डाले । तब
लक्ष्मण ने उसकी नाक और कान इस प्रकार काट डाले, मानो वे यह बतलाना चाहते हों
कि आगे में उस असुर-राज की वहन की भी यही दशा कर दूंगा ।

२४ रंगनाथ रामायण
बड़े आश्चर्य की बात है कि तब वह कामरूपिणी, माया का रूप धारण करके,
कई अस्त्रों की वर्षा करने लगी । तब विश्वामित्र ने कहा—'हे अनघ, संध्या हो रही है
और संध्या के समय राक्षसों को जीतना कठिन है । अब तुम उसपर दया करना छोड़ दो
और लोक-हितार्थ इसे तुरंत मार डालो ।'
तब गाधेय का आदेश मानकर (राघव ने) शब्द-वेधी बाणों से उस मायाविनी की
मायाओं को दूरकर, भयंकर गर्जन करती हुई बिजली के समान आनेवाली राक्षसी को
(उन्होंने) देखा । तब उन्होंने एक महान् अस्त्र उसके कुचाग्र पर ऐसा चलाया कि रक्त
की कई धाराएँ वह निकलीं, मानो रामचंद्र असुरों को दण्ड देने का उपक्रम करते समय
शरों को (रक्त का) उपहार दे रहे हों ।
तब वह (राक्षसी) पृथ्वी पर इस तरह गिरी, मानो प्रलय-मारुत से संध्या का
आकाश टूटकर पृथ्वी पर गिर गया हो । समस्त प्राणी आनंदित हुए । देवता तथा मुनि
हर्षित हुए । कौशिक ने राम को गले से लगाकर आशीर्वाद दिये ।
तब देवता तथा गंधर्वों के नाथ देवेन्द्र वहाँ आया और श्रीराम के दर्शन करके,
उनकी पूजा तथा प्रार्थना की । फिर देव-भक्त गाधेय को देखकर इन्द्र ने कहा—"हमारी
रक्षा करने के लिए इस पृथ्वी पर अवतार लिये हुए इस महापुरुष को आप भृशाश्व की
संतान-रूपी सभी अस्त्र-शस्त्र प्रदान करें ।” इस प्रकार कहकर इन्द्र देव-लोक को लौट गये ।
इतने में सूर्यास्त हो गया । वे लोग वहीं ठहर गये ।
२२. विश्वामित्र का श्रीराम को भृशाश्व-संतान-रूपी शस्त्र देना
दूसरे दिन विश्वामित्र ने राम को बड़े प्रेम से अपने पास बुलाकर कहा—
'हे राम ! तुम्हारा रण-कौशल देखकर हम बहुत प्रसन्न हुए । अब हम तुम्हें ऐसे शस्त्रास्त्र
देंगे, जो अमर, उरग, असुर तथा यक्षों के साथ युद्धों में श्रेष्ठ सिद्ध होंगे ।”
यों कहकर तन और मन से शुद्ध हो, मुनीश्वर ने राम को पूर्वाभिमुख बिठाया,
ध्यान किया और क्रमशः दण्ड-चक्र, धर्म-चक्र, काल-चक्र, विष्णु-चक्र, इन्द्र का वज्र और
खड्ग, वरुण-पाश, धर्म-पाश, काल-पाश, परमशिव का भयंकर शूल, शक्तियुग्म (विष्णु-
शक्ति तथा रुद्र-शक्ति), भयंकर उष्ण तथा अनुष्ण अशनियाँ (शुष्काशनि तथा आर्द्राशनि),
कङ्काल (जिन्हें राक्षस धारण करते हैं), भयंकर करवाल, मूसल, कंकण और क्रौंचबाण
आदि शस्त्र (श्रीराम को) दिये । इसके पश्चात् (उन्होने) बड़ी प्रसन्नता तथा प्रेम से
आग्नेयास्त्र, ब्रह्मास्त्र, तेजःप्रभास्त्र, ऐन्द्रास्त्र, ब्रह्मशिर, प्रस्थापन, नारायण, पैनाक, शिशिर,
दारुण, शौर्य तथा मुदामन् प्रशमन, विलापन, विशठ प्रभाववाला विद्याधर, वायव्य,
सौम्य, संवर्त्त आदि नामक अस्त्र तथा मायाधर, मानव, मदन, मौमन, रुद्र, संतापन, मौसल,
दर्पग, हयधिर आदि अस्त्र, मायाओं का प्रयोग कर विजय दिलानेवाले गंधर्व तथा सम्मोहनास्त्र,
अत्यंत निष्ठा-समन्वित तथा शोणितारव्य अद्वितीय आग्नेयास्त्र, गरुडास्त्र, कौवेरास्त्र,
नर्गमहास्त्र, नागास्त्र, अवार्थ वैष्णवास्त्र, सतत नृत्य वैद्यावरास्त्र, रौद्रास्त्र, राक्षसास्त्र, कल्याण-
प्रद पाशुपतास्त्र, कर्त्तरीचक्र, मेधास्त्र जैसे अगणित अस्त्रसमूह, अखिल दारुण मोदकी,
शिखरी नामक गदाएँ, वामन, पैशाच तथा वायव्य शस्त्र, सोम, सौम्य, संवर्द्धन, साम, मदन,

बालकाण्ड २५

संतापन, तामस, जैसे दारुण अस्त्र, ककोल, करवाल, मूसल आदि धारण-योग्य अस्त्र राम
को दिये । उन्हें लेते हुए राम ने उस महात्मा को देखकर कहा "हे मुनिनाथ, आपकी
कृपा से अभी अस्त्र प्राप्त करके मैं कृतार्थ हुआ । अब आप मुझे उपसंहार के अस्त्र प्रदान
कीजिए ।"
इस पर प्रसन्न हो उस मुनि ने उन्हें सत्यवत, रभस, पराङ्मुख, सत्य-कीर्त्ति, दशाक्ष,
अवाङ्मुख, प्रतिहारतर, मारण, शुचि, शतवक्त्र, दैत्य, धृष्ट, लक्ष्य, कृशन, करवीरक, दश-
शीर्ष, शतोदर, ज्योतिष, विमल, मकर, विरुचि, निष्कुलि, प्रमथन, सुनाम, सर्वनाम, दुदुनाभ,
पद्मनाभ, तृणनाभ, नैराश्य, का रूप, योगधर, सैमन, निद्रा, सधान, मोहन, विषमाक्ष, महानाभ,
बाहुविभूति, जृम्भक, धन, धान्य, वृत्तवत, रुचिर, सार्चिमाली, धृतिमाली नामक कामरूपवाले
महान् अस्त्रो का उपदेश राजकुमार को दिया । इनके अतिरिक्त भी (मुनि ने) उस रघु-
वश प्रभु को अनेक शस्त्रास्त्र-समूह दिये, उनकी शक्ति बताई, उनसे सबध रखनेवाले मत्र
बताये, उनके प्रयोग की तथा उपसहार की विधि बताई । शस्त्रास्त्र-सबंधी सभी
मर्म बताये ।
तब राम के आगे वे सभी ( शस्त्रास्त्र ) तरह-तरह के रूप धारण करके
प्रकट हुए । उनमें कुछ अग्नि-सदृश थे, कुछ भयकर थे, कुछ धूमिल कांति के थे, कुछ
अनुपम दीप्तिमान् थे, कुछ दिव्य शरीरवाले थे, कुछ चंद्र-प्रभा-विलसित थे, कुछ भानु-
दीप्ति-विलसित थे, कुछ अधकार-विलसित थे, कुछ भयकर अट्टहास कर रहे थे और
कुछ पवित्र रूप धारण किये हुए थे । उन सब ने मुकुलित करो से (राम के आगे) खडे
होकर कहा—'हे राजन्, हम कौन-सा कार्य करें, हमें क्या आदेश देते हैं ? हमें कहाँ
भेजेंगे ?' तब राम ने कहा—'मेरे स्मरण करने पर तुम चले आना, अभी तुम जा
सकते हो ।' यह सुनकर सभी शस्त्रो ने उस वसुवेश की प्रदक्षिणा की और नमस्कार
करके चले गये ।
तब राघव ने मुनिनाथ के सामने हाथ जोडकर विनय, भक्ति तथा विश्वास प्रकट
करते हुए कहा—'हे अनघ, आपकी कृपा से में कृतार्थ हुआ ।'
उसके पश्चात् वे विश्वामित्र के पीछे-पीछे चलने लगे । चलते-चलते उन्हें वामनाश्रम
का सुदर प्रदेश दिखाई पडा । उसे देखकर काकुत्स्थवंशी राम ने कहा—"हे सयमीद्र, इस
पर्वत के निकट, नाना मृगो की ध्वनियो, सुदर पक्षियो तथा मृगो से भरा यह दर्शनीय तथा
सुदर वन किसका आश्रम है ? यहाँ सब मृग बडे सुख से रह रहे हैं । हे सर्वज्ञ, आपकी
यज्ञ-भूमि यहाँ से कितनी दूर है ? चचल तथा उद्धत राक्षस आपके यज्ञ को अपवित्र करने
के लिए कहाँ से आते हैं ? में अपने तेज बाणो से उन समस्त राक्षसो को मार डालूँगा
और यज्ञ की रक्षा करूँगा ।"
तब कौशिक ने जगदभिराम राम के कपोल स्नेह से छूकर बडे प्रेम से कहा—
'हे अनघ, क्या कोई ऐसा विषय है, जिसे तुम नही जानते ? यदि मुझसे ही सुनने की
इच्छा है, तो सुनो ।'
४

२६ रंगनाथ रामायण
२३. कौशिक का श्रीराम को सिद्धाश्रम का वृत्तांत सुनाना ।
"प्राचीन काल में विष्णुदेव बड़े आनंद से तपस्या करने के लिए यहाँ अनेक युगों
तक रहे । इसलिए हे अनघ, इसे वामनाश्रम कहते हैं । उसके पहले यह सिद्धाश्रम नाम से
विख्यात था । हे जननाथ, विरोचन का पुत्र बलि अपने विशाल राज्य-वैभव के कारण
घमंड से प्रबल होकर देव तथा सुरों को यातनाएँ देने लगा । तब मुनि तथा देवता इस
आश्रम में आये और कमलनाभ को प्रणाम करके कहा—'हे शरणागत-प्रिय, हे लोकेश,
हे कमलगर्भ, हमारी रक्षा कीजिए । हमें शरण दीजिए । हमें त्रास देनेवाला बलि यज्ञ कर
रहा है । उस राक्षस-यज्ञ-भूमि में जो कोई भी जो कुछ माँगता है, वह दे रहा है । उस
यज्ञ की समाप्ति के पहले ही आप हमारा हित सिद्ध कीजिए ।'
"उसी समय उज्ज्वल व्रत-निष्ठ कश्यप ने अदिति के साथ एक सहस्र वर्ष का तप
पूरा किया । उसके उपरांत संतुष्ट हो विष्णु ने उन्हें दर्शन दिये । तब (उस दंपति ने)
प्रार्थना की—'हे रवि-शशि-लोचन, आप अपने शरीर में हमें समस्त लोकों के दर्शन
कराइए । हे आद्यन्त-रहित और वेद-वेद्य, हम आपकी शरण में आये हैं ।'
"विष्णु ने कृपा-दृष्टि से कश्यप को देखकर कहा—'आप अपने इच्छानुसार कोई
वर माँग लीजिए, मैं दे दूँगा ।' कश्यप ने बड़ी प्रसन्नता तथा भक्ति से हाथ जोड़कर
कहा—'हे भगवन्, आप अत्यंत तेज-समन्वित होकर मेरे तथा अदिति के पुत्र होकर जन्म
लीजिए तथा सुरों की रक्षा कीजिए । यही मेरी तथा देवताओं की इच्छा है । हम सब
की इच्छा आप पूर्ण कीजिए ।"
"कश्यप के इस प्रकार कहने पर विष्णु ने अपने अनुपम तेज से युक्त हो अदिति
के गर्भ में जन्म लिया । उन्होंने वामन का रूप धारण कर उस दानव (बलि) से तीन
पग धरती माँगी । फिर, दो पगों से पृथ्वी तथा आकाश को नाप लिया और उस धन्यात्मा
(बलि) को बाँधकर इन्द्र को तीनों लोक देते हुए कहा—'तुम इन पर शासन करो !'
इसलिए यह स्थान वामनाश्रम कहलाता है । यही हमारा आश्रम है । इस पुण्यभूमि के
निवासी तपोसिद्ध हैं, अतः यह सिद्धाश्रम भी कहलाता है । तुम्हीं वामन होकर त्रिविक्रम
का अवतार लेनेवाले विष्णु हो । उन दिनों में भी यह तुम्हारा ही वन था । हे राम,
आज भी उसी रीति से यह तुम्हारा ही वन है ।" इस प्रकार, कहते हुए कौशिक अपने
आश्रम में गये और (वहाँ जाकर) राम-लक्ष्मण का सत्कार किया ।
२४. विश्वामित्र का यज्ञ
वहाँ के मुनियों ने बड़े प्रेम के साथ राम की पूजा की । तब राघव ने विश्वामित्र
के देखकर बड़े हर्ष से कहा—'हे मुनीश्वर, आप निश्चित होकर आज ही यज्ञ-दीक्षा
ले लीजिए । यज्ञ के शत्रुओं का संहार मैं अवश्य करूँगा ।'
तब विश्वामित्र अत्यंत हर्षित हुए और मुनियों को बुलाकर स्वयं यज्ञ-दीक्षा ली ।
मुनियों ने यज्ञ की वेदियाँ तैयार कर दीं और यज्ञ के आवश्यक अंगों से यज्ञ-वेदी संपन्न
हो गई । घी की आहुतियाँ पड़ने लगीं और अग्नि की ज्वालाएँ आकाश तक फैलने लगीं ।
हवन की अग्नि के प्रज्ज्वलित होने के साथ-ही-साथ साम आदि वेदों के आनन्द-घोष, निरंतर

( सुनाई पडनेवाली ) देवताओ का आह्वान करनेवाली ध्वनियां तथा होताओ के पुण्य-
मंत्रो के शब्दो से दिशाएँ अत्यधिक गूंजने लगीं । एक ओर बडे आश्चर्य के साथ यज्ञ के
कार्य हो रहे थे, दूसरी ओर रामचन्द्र धनुष धारण कर, भाई सौमित्र के साथ, बडी सतर्कता से,
राक्षसो के आने का मार्ग पहले ही जानकर उस मुनि विश्वामित्र की रक्षा इस प्रकार
करने लगे, जैसे समस्त विश्व को अंधकार से आवृत होने से बचाने के लिए चंद्र और सूर्य
अपनी शाश्वत प्रभा फैलाते हैं । बडी भक्ति के साथ पाँच दिनो तक वे (उस यज्ञ की)
रक्षा इस प्रकार करते रहे, जैसे पलकें पुतलियो की रक्षा करती हैं । छठे दिन मारीच तथा
सुबाहु अपना समस्त बल इकट्ठा करके, उद्धत गति से आकाश में ऐसे व्याप्त हो गये,
मानो (उन सबके शरीर) काले मेघो की राशि हो और उनके श्रेष्ठ खड्गो की कांति
बिजली हो । वहाँ खडे होकर वे गर्जन करते हुए घमंड से फूलकर यज्ञ-भूमि में लगातार
रक्त-मांस की वर्षा करने लगे । तब होताओ में कोलाहल होने लगा । उपस्थित
सदस्यो में कल-कल ध्वनि प्रारंभ हो गई । परिचारको के दीन वार्त्तालाप सुनाई
पडने लगे ।
यह सुनकर रामचन्द्र ने क्रोध के आवेश में लक्ष्मण से कहा—“हे लक्ष्मण, अब तुम
मेरी शक्ति देखो । उनके धनुष की टंकार विजय-लक्ष्मी के धनुष की टंकार के समान थी ।
उन्होने खडे होकर अपनी दृष्टि आकाश पर केंद्रित की और अत्यंत वेग के साथ वायव्य
बाण चलाया । वह बाण मारीच को द्रुतगति से शत योजन तक उठा ले गया और उस
क्रूर राक्षस को समुद्र में फेंक दिया । वज्र के प्रहार से समुद्र में गिरे हुए मैनाक की तरह
वह असुर समुद्र में गिरा, फिर किसी तरह तट तक पहुँचा । उसने उस सूर्यवंशी (राम)
के उज्ज्वल पराक्रम की प्रशंसा जहाँ-तहाँ की, (अपने) राक्षस-दल को छोड दिया, अपना
शौर्य त्याग दिया, आसुरी वृत्ति को दबा दिया और आसुचन्द्राश्रम-भूमि में सतत तपस्या
में लीन रहने लगा ।
उसके पश्चात् रघुराम ने सुबाहु के हृदय पर अग्नि-बाण चलाकर उसका संहार
कर डाला । एक मानव-शर से अन्य राक्षस-सेना का वध कर दिया । (यह देखकर) देवता
बडे हर्ष से पुष्प-वृष्टि करने लगे । मुनियो ने (राम की) स्तुति की । जिस प्रकार वृत्रासुर का
वध करने पर देवता लोग इन्द्र की प्रशंसा करने के हेतु उनके चारो ओर एकत्र हुए थे,
वैसे ही (आज) राम अपने भुज-बल के प्रताप से यज्ञ के शत्रुओ को दंड देने के कारण
(मुनिजनो के बीच) शोभायमान हो रहे थे ।
विश्वामित्र बडी निष्ठा के साथ यज्ञ की सभी क्रियाओ को समाप्त करके आये
और राम को बडे हर्ष से गले लगाकर उनकी प्रशंसा की और आशीर्वाद देकर बोले—
‘रघुराम, तुम्हारी कृपा से मैं बिना किसी कठिनाई के यज्ञ संपूर्ण करके कृतार्थ हुआ ।’
इस प्रकार, उस पुण्यात्मा विश्वामित्र मुनि का अनुराग प्राप्त करके राम ने वही
रात्रि बिताई और बडे सवेरे, प्रात काल की सभी विधियो से निवृत्त होकर, सब मुनियो
को प्रणाम करके, गाधि-पुत्र से कहा—“हे तपोनिष्ठ, अब हमारे लिए क्या आज्ञा है ?
हम आपके दास हैं और आपकी कृपा के पात्र हैं ।”

२८ रंगनाथ रामायण
तब वहाँ के सभी मुनि गाधि-पुत्र को आगे करके इस प्रकार कहने लगे—"हे रवि-
कुल श्रेष्ठ, महाराज जनक बड़े सुंदर ढंग से यज्ञ कर रहे हैं । हम वहाँ चलें । उनके पास
परमशिव का दिव्य धनुष है । गंधर्व तथा राक्षस आदि कई वीर उसे उठाने में असमर्थ
हो चुके हैं । ऐसे धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढानेवाले श्रेष्ठ वीर के साथ ही अपनी
पुत्री का विवाह करने की प्रतिज्ञा राजा जनक कर चुके हैं । इसलिए उस श्रेष्ठ धनुष
को तथा जनक के यज्ञ को देखने आपको अवश्य जाना चाहिए ।”
इस प्रकार विश्वामित्र तथा अन्य मुनियों ने उन वीर, पुण्यात्मा, दाशरथियों को
मिथिलापुरी चलने की प्रेरणा दी । सब लोग बड़े हर्ष से प्रस्थानकर गंगा के उत्तर तट पर
पहुँचे१ और हिमाचल तथा सिद्धाश्रम को दक्षिण में छोड़कर२ उत्तर की ओर बढ़े ।
उस मार्ग से यात्रा करते हुए वे उस दिन तीसरे पहर तक तीन योजन चले । वहाँ शोण
नदी के किनारे वे ठहरे और वहाँ के पुण्य तीर्थ में स्नान आदि क्रिया से निवृत्त हुए
(उसके पश्चात्) उस रम्य स्थल में मुनियों के साथ बड़े आनंद से रहते हुए राम ने कौशिक
से यो कहा—
२५. कौशांबी का वृत्तांत
(श्रीराम ने कहा)—'हे मुनिनाथ, अत्यधिक प्रजा-समृद्ध यह देश किसका है ?
कृपया बतलाइए ।' तब विश्वामित्र ने कहा—"हे राजन्, सुनो, ब्रह्मा के मानस-पुत्र कुश
नामक एक यशस्वी मुनि पूर्व काल में रहते थे । उन्होंने वैदर्भी नामक स्त्री से रूपवान्
तथा शांत प्रकृतिवाले अमूर्त्तरज, वसु, कुशांब और कुशनाभ नामक चार पुत्र प्राप्त किये ।
चारो पुत्र अत्यंत साहस तथा शूरता के साथ अपने क्षत्रिय-धर्म का पालन करने लगे ।
अपने पुत्रो के चरित्र तथा सद्गुण देखकर कुश ने बडे हर्ष से कहा—'इस पृथ्वी पर तुम
लोगो को प्रजा का पालन करना चाहिए । इससे तुम्हारी कीर्ति व्याप्त होगी ।'
“तब कुशल कुशांब ने बहुत प्रसन्न होकर कौशांबी नाम से एक नगर का निर्माण किया ।
हे दशरथात्मज, कुशनाभ ने महोदय नामक नगर बसाया । शूर अमूर्त्तरज ने धर्मा-
रण्य नामक सुंदर नगर का निर्माण किया और वसु ने गिरिव्रज नामक एक अत्यंत दर्शनीय
नगर बसाया । यह प्रदेश, जहाँ हम है, महाराज वसु के राज्य में है ; इस प्रदेश के
चारो दिशाओ में पाँच पर्वत है । उन पर्वतो के मध्य मागधी नामक एक नदी बहती है। इस
सारे मगध देश पर वसु महाराज अत्यंत धर्म की रीति से प्रजा का पालन करते हैं ।
“कुशनाभ ने घृताची नामक एक अप्सरा से प्रेम करके (विवाह किया)। मन्मथ-शर
जैसे नेत्रवाली सौ रूपवती पुत्रियो को प्राप्त किया । एक दिन कमनीय कांति-युक्त तथा
मनोहर यौवन-सपन्न वे युवतियाँ उद्यान में गईं ।
१ गंगा के दक्षिण तट से चले; क्योकि उत्तर तट पर पहुँचकर चलने से शोण
नदी नहीं मिलेगी । —सम्पादक
२. हिमाचल तो 'जनकपुर' से भी उत्तर है, उसे दक्षिण में छोड़कर 'सिद्धाश्रम'
से चलना असंगत है । वाल्मीकिरामायण में लिखा है कि सिद्धाश्रम हिमालय की ओर
उत्तर दिशा में चलने के उद्देश्य से वे चले।—सम्पादक

बालकांड २६
"वहाँ अपने मजीर, मेखला तथा ककणो को मधुर-मधुर मुखरित करती हुई ताल-
गति के साथ लास्य करने लगी । कुछ युवतियाँ मृदु-मधुर रीति से मृदग आदि वाद्यो को
बजाने लगी, कुछ अपने कर-पल्लवो से वीणाओ को क्वणित करने लगी, कुछ अन्य
युवतियाँ आम्र-मजरी के मधु-पान से मस्त कोकिल-कठ से गान करने लगी । इस प्रकार वे
सभी कन्याएँ उस उद्यान में क्रीडाओ में मग्न हो गईं ।
उन सुदरियो को देखकर काम-पीडा से व्याकुल होकर पवनदेव ने उन मानिनियो से कहा—
'हे मानिनियो, आप किञ्चित् मेरी बात पर ध्यान दें । हे पद्माक्षियो, आप मुझे (अपना
पति) वरण करें और अमरत्व को प्राप्त करें । इस तरह आप अजर-अमर होकर
सतत यौवनावस्था में रहती हुई उन्नत कीर्त्ति प्राप्त करेंगी ।'
"तब उन कन्याओ ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया—'हे अनिल, आप सब के हृदयो
में सचार करनेवाले हैं । आप हमें जानते हैं । हाय ! आप अपनी महत्ता का भी विचार
किये बिना क्या कह रहे हैं ? हम उस कुशनाभ की पुत्रियाँ हैं, जो नीति-नय-सपन्न तथा
धर्मानुरक्त हैं । हमारे पिता के रहते हुए हम अपने-आप किसी का वरण कर लें, तो इससे
हमारे कुल को कलक लगेगा । हमारे पिता हमें (विवाह में) जिन्हें देंगे, वे ही हमारे
पति होगे ।'
"यह सुनकर पवन अपने क्रोध को सँभाल नही सका । उसने उनके अगो में प्रवेश
करके उन्हें कुब्जाओ के रूप में परिवर्त्तित कर दिया । खिन्न होकर वे सभी (कन्याएँ)
अपने पिता के सामने गईं और सिर झुकाये आँखो में आँसू भरे खडी रही । कुशनाभ
अपनी पुत्रियो की दशा देखकर सहम गये और पूछने लगे—'हे पुत्रियो, तुम्हें ऐसा रूप
कैसे प्राप्त हुआ ? किसने ऐसा किया ? तुम बोलती क्यो नही हो ? इसका क्या कारण है ?"
"तब उन धवलाक्षियो ने हाथ जोडकर अपने पिता से कहा—'पिताजी, हमें देखकर
पवन ने निर्लज्जता से कहा कि हे सुदरियो, तुम लोग मुझे वरो । हमने उसका प्रस्ताव
स्वीकार नही करके कहा कि आप यह बात हमारे पिता से जाकर कहिए । इसपर उस
क्रूर ने कामाध होकर हमें कुब्जा बना दिया ।"
"यह सुनकर उन्होंने उन कमलाक्षियो से कहा—'हे कन्याओ ! औचित्य और धर्म
का विचार करके (कुल की मर्यादा का उल्लघन करना) अनुचित समभते हुए तुम लोगो ने
उस मर्यादा का पालन किया । तुम्हारे इस गौरवपूर्ण कार्य से मेरे कुल की प्रतिष्ठा बढ
गई है । देवताओ के सबध में क्रोध करने का साहस तुमने नही किया । इस प्रकार
तुम्हारा सहन कर जाना ही उत्तम है । क्षमा (सहनशीलता) ही सत्य है, शील है, तप है,
धर्म है और कीर्त्ति है । वही समस्त लोको की रक्षा करनेवाली है ।"
"इस प्रकार (सात्वना देकर) राजाने अपनी कन्याओ को विदा किया । (उसके
पश्चात्) उन्होने अपने मत्रियो से परामर्श करके पुण्यात्मा चूली नामक मुनिवर के पुत्र
सद्गुण-सपन्न ब्रह्मदत्त को बुलावा भेजा और निर्मल मति से उस महात्मा की धर्म पत्नियो के रूप
में अपनी कन्याओ को दे दिया । चूली-पुत्र के उन्हें स्वीकार करते ही उन कन्याओ की
विकृति दूर हो गई ।"

'हे अवनीश, उस दिन से वह उत्तम नगर 'कन्याकुब्ज' के नाम से इस पृथ्वी पर
विख्यात हुआ । तब कुशनाभ अपनी पुत्रियों के कमनीय रूप देखकर बहुत प्रसन्न हुए और अपनी
पुत्रियों तथा जामाता को विदा किया । तब कुश ने अपने पुत्र कुशनाभ को संबोधित करके
कहा-'तुम पुत्रकामेष्टि-यज्ञ करो' तो तुम्हें अमित कीर्त्तिमान् तथा पुण्यात्मा गाधि नामक
पुत्र होगा । यो कहकर वे ब्रह्मलोक सिधारे ।"
"कुश के पौत्र रूप में गाधि ने जन्म लिया । हे दशरथात्मज, मैं उसी गाधि का पुत्र हूँ ।
कुश का वंशज होने के कारण मुझे कौशिक भी कहते है । गुणवती तथा धर्म-निष्णाता
मेरी बड़ी बहन सत्यवती, अपने प्राणेश्वर ऋचीक के साथ सशरीर इन्द्रलोक में गई और
इस लोक का कल्याण करने के लिए प्रालेय-पर्वत में स्वयं कौशिकी नाम से नदी के रूप
में बह रही है । सिद्धाश्रम में प्रवेश में करने के कारण सच ही में तप सिद्ध हुआ । प्राचीन
काल से मैं अपना नाम तथा इस देश के निर्माण के संबंध में यह वृत्तांत सुनता आ रहा हूँ ।
अब हे राजन्, अर्द्ध-रात्रि हो गई । तुम बहुत थके हुए हो, अतः विश्राम करो ।"
"सभी वृक्ष स्थिर हो गये है, इस वन-प्रान्त में मृग-समूह का संचार अब नहीं रहा,
विहग अपने घोंसले में पहुँचकर अपनी मीठी बोलियों को भूले हुए पड़े हैं, अब निशाचर,
यक्ष तथा राक्षस अपने इच्छानुसार इस पृथ्वी पर संचरण करेंगे, समस्त दिशाएँ तथा
आकाश कालिख पोते हुए-से अवगम्य दीख रहे हैं, ब्रह्माण्ड-रूपी गृह के लिए नीलांबर
में लगाये हुए मोतियों से युक्त तंबू के समान यह आकाश नक्षत्रों से युक्त होकर शोभा
दे रहा है तथा जन-जन को आनंदित करते हुए नक्षत्र-पति अभी-अभी उदित हो रहा है ।"
उन वचनों से प्रसन्न होकर संयमी मुनियों ने विश्वामित्र से कहा-'हे अनघ, आपका
वंश अमल है । आपके वंशज अतुलनीय माहात्म्यवाले हैं । आप ब्रह्मा के समान हैं । आपका
ब्रह्म-तेज स्तुत्य है ।' तब विश्वामित्र ने उन मुनीश्वरों को धन्यवाद दिये । फिर राजकुमार
तथा मुनिजनों ने उस रात्रि को वहीं शयन किया ।
“प्रात काल होने पर ऋषियों तथा विश्वामित्र ने (राजकुमारों से) कहा-'हे राज-
कुमारो, अब तुम निद्रा तजो ।' वे जग पड़े और प्रातःकाल की क्रियाओ से निवृत्त होकर
कौशिक ने कहा- "यह शोण नदी-रत्न कितना अगाध और सुंदर है ? मछलियों से परि-
पूर्ण, अत्यंत रमणीय सैकत स्थल, मधुर जल तथा परिचित हंस आदि खग-कुल से शोभायमान,
मद-मंद पवन (के कारण ) तरल तरंगों से युक्त यह नदी बड़ी ही रमणीय है ।
हे अनघ, हम कहाँ और किस प्रकार इस नदी को पार करेंगे ?"
तब विश्वामित्र ने कहा-'मुनिलोग प्राय जिस स्थान से होकर इसे पार करते हैं,
उसे जानकर हम भी वहीं से इसे पार करेंगे ।'
इस प्रकार कहते हुए वे सब लोग कुछ दूर आगे चले । (वे ऐसी जगह पहुँचे),
जहाँ कुल हंस, सारस, कारंडव आदि जल-पक्षियों का कलनाद ऐसा मीठा सुनाई पड रहा था,
मानो वे लोगों का स्वागत कर रहे हो । राम ने उस ध्वनि को सुनकर, मध्याह्न
के समय सिद्ध मुनिपुंगवों से सुसेवित, शुद्ध तथा पुण्य जल से पूर्ण, पृथ्वी में श्रेष्ठ नदी के
नाम से विख्यात जाह्नवी को देखा और उसको प्रणाम करके कहा-'हे गाधेय, वह जो

अगाधं श्रेष्ठ नदी दिखाई पड रही है, वहाँ तक हम कैसे पहुँचेंगे ?' तब मुनि बोले--
'हे नरनाथ, शोण नदी को पार करके तीन योजन आगे जाने पर हम उस महानदी के
पास पहुँच सकते हैं । तब तक हमें मार्ग में जल और फल आदि बहुत मिल जायेंगे ।'
यो कहकर वे (शोण) नदी पार करके चलने लगे । (निदान) वे उस गगा नदी
के तट पर पहुँचे, जो सारस-समूह, पुण्य-सलिल, विकसित-कमल, फेन तथा सुदर मछलियो
से युक्त हो नित्य गभीर गति से बहती थी । वे वहाँ घन-लता-कुञ्जो से युक्त एक समतल
स्थान पर ठहर गये । वहाँ राजकुमार मध्याह्न की (सध्या आदि) पूजाओ से निवृत्त हुए,
बडे आनन्द से उचित आहार ग्रहण किया और मुनियो की सगति में बैठकर वार्तालाप
करने लगे ।
(उस समय) राजहंसो द्वारा (कमल-पुष्पो को) हिलाये जाने से गिरे हुए कमल-
रज से पूर्ण तथा राजीव-राजित तरगो से युक्त गगा नदी को देखकर क्षत्रिय-तिलक रामचन्द्र ने
कौशिक से पूछा--'हे महात्मा, गगा नदी इस पृथ्वी पर कैसे आई, यहाँ से वह स्वर्ग-
लोक में कैसे पहुँची ? पाताल को वह कैसे प्राप्त हुई ? कैसे वह समुद्र में जा मिली ?
उस महानदी का जन्म कैसे हुआ ? कृपया बताइए ।'
तब उस पुण्यधनी विश्वामित्र ने राम से कहा--"हिमवान् (हिमालय) के कमनीय
दीप्तिवाली दो पुत्रियाँ हैं । देवता लोग हिमालय से प्रार्थना करके उन दोनो में से बडी
पुत्री पुण्यशीला गगा को यज्ञ के लिये स्वर्गलोक में ले गये । दूसरी कन्या परम सुदरी
पार्वती को भाल-लोचन (शिव) की घोर तपोनिष्ठा से सतुष्ट हो, उन्हें पत्नी के रूप में दिया ।
गगा सुरुचिर गति से स्वर्ग में गई और वहाँ सुरनदी के नाम से विख्यात हुई ।'
इतना कहने के बाद मुनिवर ने राजकुमार को देखकर कहा--"और एक वृत्तात है,
सुनो । पार्वती से विवाह करने के पश्चात् चन्द्र-शेखर (शिव) बडी अनुरक्ति के साथ
एक सौ दिव्य वर्षों तक रति-क्रीडा में निमग्न रहे । तब ब्रह्मा से लेकर समस्त देवता अपने-आप
सोचने लगे कि इन दोनो (शिव-पार्वती) का विषम तेज कौन धारण कर सकेगा ? इनके
द्वारा उत्पन्न पुत्र की विषम शक्ति के सामने कौन टिक सकेगा ? इसलिए वे सब महादेव
के पास जाकर बडी भक्ति से विनम्र हो कहने लगे--"हे देवाधिदेव, हे महेश, हे सर्वेश,
आपकी महिमा सभी देवता जानते है । हे सर्वज्ञ, आप हम पर प्रसन्न होइए । आपके
महान् तेज को धारण करने की क्षमता किस में हैं ? इसलिए आप यह क्रीडा छोड दें ।
आप कृपा करके तपोवृत्ति ग्रहण कर ब्रह्मचर्य का पालन कीजिए ।' इस पर गौरीश ने
उनकी बात स्वीकार कर ली और कहा--' (किन्तु) अब तो तेज अपने स्थान (रेत स्थान)
से विचलित हो चुका है । अब आपमें से कौन इस तेज को धारण करेगा ?' तब उनकी
बात मानकर हर ने अपने (तेज का) विमोचन धरती पर कर दिया । तब देवताओ ने
अग्निदेव को देखकर कहा--'हे पावक, तुम पवन के साथ, धरती पर पडे हुए तेज में
प्रवेश करो ।' अग्नि तथा वायु उस तेज को धारण करने में असमर्थ रहे । तब गगा नदी ने
उस तेज को बडी श्रद्धा के साथ धारण किया । लेकिन अपने प्रभु का तेज धारण
किये रहना उसके लिए भी असभव हो गया । वह भय से काँप उठी और उसकी लहरें

३२ रंगनाथ रामायण
भय प्रकट करते हुए उत्तुंग बन गईं। तब उसने क्षुभित चित्त से उस तेज को अपने तट
पर उगनेवाले सरकंडों के वन में प्रतिष्ठित कर दिया। शिव का तेज उस सरकंडे के
वन में प्रतिष्ठित हुआ।
'एक दिन ऋषि-पत्नियां अपने नित्य कृत्यों से निवृत्त होने वहाँ आ पहुँचीं। उन्होंने
स्नान करते समय आपस में विचार किया कि हम ठंड से ठिठुर रही हैं, इसलिए सरकंडों
की उस झाड़ी में त्रेताग्नियों के समान प्रज्वलित होनेवाली उन अग्नियों की हम शरण
लेंगी (उनके पास जाकर अपनी ठंड दूर करेंगी)। इस प्रकार सोचकर वे ऋषि-पत्नियां
उन अग्नियों के पास जा पहुँचीं।
"जो स्त्रियाँ उन अग्नियों के पास गईं और जिन्होंने बड़े उत्साह से उन्हें देखा, वे
सब गर्भवती हो गईं। (इससे) वे अत्यंत भीत हो उठी और पश्चात्ताप करती हुई
घर पहुँचीं। ज्ञानचित्त मुनियों ने अपनी योग-दृष्टि से उस सारे वृत्तान्त को जान लिया
और उन स्त्रियों से कहा- 'यह सब तुम्हारे गर्व तथा सुख की इच्छा का फल है।'
(इसके पश्चात्) वे स्त्रियों पर क्रोधोन्मत्त हो, सारी पृथ्वी को कँपाते हुए-से बोले-'तुम
सब बुद्धिहीन हो, तुम्हें क्षमा नहीं करनी चाहिए। तुम अपने पतियों से पृथक् हो जाओ।'
इस पर वे फिर गंगा नदी के पास गईं और कहने लगी- 'हे माता क्या, यही तुम्हें करना
चाहिए ? क्या (हमारी ऐसी दशा कर देना) तुम्हें शोभा देता है ?'
"इस प्रकार कहती हुईं वे स्त्रियाँ अपने गर्भ पर अपने हाथों से ताड़न करने लगीं।
इस-ताड़न के फल-स्वरूप उनके गर्भ विच्छिन्न हो छह खंडों में पृथ्वी पर गिर गये। वे
(स्त्रियाँ) गिरे हुए उन खंडों को चुनकर उन्हें सरकंडे के वन में रखकर तप करने
चली गईं।
"वह उग्र तेज वहाँ एक जगह एकत्र होकर बढ़ने लगा और वही इस पृथ्वी पर
श्वेताद्रि के नाम से विख्यात हुआ। उस पर्वत पर परम शिव के तेज से कुमार का जन्म
अद्भुत रीति से हुआ। जन्म-स्थान सरकंडों से भरा प्रदेश था, इसलिए वे शरजन्मा
(शरवन्भव) कहलाये। इस पृथ्वी पर जन्म लेने के पश्चात् कृत्तिकाओं ने उन्हें स्तन्य-पान
कराकर पाला-पोसा, इसलिए उनका नाम कार्त्तिकेय पड़ गया। वे माताएँ (कृत्तिकाएँ)
छह थीं। अतएव उन्हें सन्तुष्ट करने के लिए कुमार ने छह मुँह धारण करके स्तन-पान किया,
इसलिए वे षण्मुख (और षाण्मातुर) कहलाये। चन्द्रमौलि के वीर्य-स्कंदन (पतन) से
उनका जन्म हुआ, इसलिए वे स्कंद कहलाये।
"(फिर) यहाँ देवता शिव-पार्वती की स्तुति करने लगे। (पुत्रोत्पत्ति में बाधा डालने
के कारण देवताओं पर) क्रुद्ध होकर लाल-लाल नेत्रों से उन्हें देखती हुई पार्वती ने कहा-
'हे देवताओ, तुम और यह वसुंधरा संतानहीन हो जाओ। आगे से इस पृथ्वी को बहु-
पतित्व प्राप्त होगा।' (यह सुनकर) देवता व्याकुल हुए। इसके पश्चात् शिवजी पार्वती
के साथ तपस्या करने हिमाचल पर चले गये।
"इन्द्र के साथ सभी देवता ब्रह्मा के पास गये और उनसे विनती की- 'हे जलज-
सम्भव, हमें अत्यन्त भुजबली एक सेनापति प्रदान कीजिए।' तब उन्होंने देवताओ को देख-

देखकर कहा—'गौरीश के पुत्र कार्तिकेय तुम्हारी सेना का नायकत्व ग्रहण करेंगे।' देवता
बहुत प्रसन्न हुए और कार्तिकेय उनके सेनाधिपति हुए । इससे इन्द्र को उन्नति तथा सुख
प्राप्त हुए ।”
इस प्रकार मुनि के कहने पर रघुराम अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्हें देखकर कहा—
'हे सयमीश्रेष्ठ, इस महानदी (गंगा) के त्रिपथगा होने का क्या कारण है ?'
२६. गंगा नदी का वृत्तान्त
तब कौशिक श्रीराम से उसकी कथा यो कहने लगे—"पुण्यवान् सगर अयोध्या
के विख्यात सम्राट् थे । पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से उन्होंने (एक बार) हिमाचल में भृगु
की तपस्या की । उनकी तपस्या से संतुष्ट होकर भृगु ने उन्हें देखकर कहा—'हे राजन्,
तुम्हारे बहुत-से कीर्त्तिवान् पुत्र होंगे । तुम्हारी एक स्त्री एक वंशोद्धारक पुत्र का जन्म
देगी और दूसरी स्त्री साठ हजार अतिबलशाली पुत्र उत्पन्न करेगी ।' यह वरदान प्राप्त
करके रानियो ने हाथ जोडकर बडे विनय से मुनि को प्रणाम किया और पूछा—'हे मुनीश्वर,
हम (दोनो) में से किसके एक पुत्र होगा और किसके साठ हजार पुत्र उत्पन्न होगे ?'
तब मुनि बोले—'तुम्हारी इच्छा जैसी हो, वैसे ही पुत्रो का जन्म होगा ।' इससे प्रसन्न
होकर बडी रानी ने राजा से (अपने) नाम को सार्थक करनेवाले एक ही पुत्र पाने की
इच्छा प्रकट की । दूसरी रानी ने साठ हजार पुत्रो को प्राप्त करना चाहा । फिर उन्होने
बडे हर्ष से उस मुनिश्रेष्ठ की परिक्रमा की, उन्हें प्रणाम किया और नगर को लौट आये ।
“कुछ दिनो के पश्चात् बडी रानी केशिनी ने असमजस (अश्वमज) नामक एक पुत्र को
जन्म दिया । (दूसरी रानी) सुकृति ने लौकी के आकार का एक गर्भ-पिड उत्पन्न किया,
जिसमें से बडे आश्चर्य से साठ हजार पुत्र उत्पन्न हुए । तब धाइयो ने उन शिशुओ को
घी के पात्रो में रखकर कुछ दिनो तक उनका पालन-पोषण किया । वे क्रमश रूप तथा
यौवन प्राप्त करने लगे । ज्येष्ठ पुत्र बडे दर्प के साथ अपने छोटे भाइयो को बलात् पकड-
पकडकर सरयू नदी में फेंक देता था और (उन्हें डूबते देख) बहुत हर्षित होता था ।
ऐसे दुष्ट असमजस के अंशुमान् नामक एक तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ । असमंजस को अति-
दुष्ट जानकर राजा ने उसे निर्वासित कर दिया और शाश्वत-धर्म-निष्ठा में तत्पर हो अश्व-
मेध-यज्ञ करने का यत्न करने लगे ।”
मुनि के यो कहने पर श्रीराम ने कौशिक से कहा—'हे मुनिनाथ, मुझे अपने पूर्वजो
के चरित सुनने की बडी इच्छा हो रही है । कृपया विस्तार से कहें ।'
तब विश्वामित्र कहने लगे—"हिमाचल और विंध्याचल के मध्य की भूमि में सगर ने
अपना अश्वमेध-यज्ञ प्रारम्भ किया । यज्ञाश्व की रक्षा करने के लिए अंशुमान् नियुक्त
किया गया । उस समय इन्द्र राक्षस का वेश धरकर अश्व को चुरा ले गया और पाताल-
लोक में प्रवेश करके वहाँ तपस्या में लीन कपिल मुनि के निकट यज्ञाश्व को बाँधकर स्वय
स्वर्गलोक को लौट आया । अश्व का पता न लगने से क्रुद्ध होकर राजा (सगर) ने अपने
पुत्रो को सबोधित करके कहा—"अश्व का कही पता नही है । कोई कुटिलात्मा उसे चुरा
ले गया है । अत तुम लोग तुरत जाओ और जिस किसी के पास वह अश्व हो, उसका
५

३४ रंगनाथ-रामायण
वध करके अश्व को शीघ्र ले आओ।' साठ हजार सगर-पुत्र अपने भुज-बल का प्रदर्शन
करते हुए, निकल पड़े। उन्होंने पहले स्वर्ग, फिर भूलोक में अच्छी तरह उस अश्व को
ढूंढ़ा। जब कहीं भी उसका पता न चला तब वे पृथ्वी को टुकड़े-टुकड़े करने लगे। 'हममें
से प्रत्येक एक योजन पृथ्वी को खोद डालेंगे'—ऐसा निश्चय करके वे प्राच्य दिशा से
प्रारंभ करके, बड़ी-बड़ी कुदालों और शूलों से पृथ्वी को रसातल तक खोदने लगे। इस
प्रक्रिया में सामने आनेवाले पातालवासी तथा अन्य प्राणियों के समूहों का संहार भी वे
करते जाते थे।
"इस प्रकार उन अतुल बलशाली राजकुमारों ने साठ हजार योजन भूमि सहज ही
खोद डाली। इस प्रकार असंख्य प्राणियों से युक्त जंबूद्वीप को सतत खोदते हुए, उपद्रव
करनेवाले सगर-पुत्रों को देखकर अमर गंधर्व तथा सिद्ध घबरा उठे और ब्रह्मा के पास
जाकर भक्ति से प्रणाम करके बोले—'हे जलजसंभव, वन, पर्वत तथा द्वीपों से युक्त इस
पृथ्वी को सगर-पुत्र खोद रहे हैं। जो कोई भी उनकी दृष्टि में पड़ जाता है, उसे 'इसीने
यज्ञ में बाधा डाली है, यही अश्वहर है,' ऐसा कहते हुए व्यर्थ ही उसका वध कर डालते हैं।
इस प्रकार उन्होंने कितने ही शक्ति-संपन्न जलचरों का संहार कर डाला। आप कृपया
इसके निवारण का कोई उपाय कीजिए।
"तब ब्रह्मा ने उनसे कहा—'अव्यय दामोदर (विष्णु) कपिल मुनि के रूप में तप कर
रहे हैं। उन मुनि की क्रोधाग्नि में वे सब भस्म हो जायेंगे।'
"सगर-पुत्रों ने वज्र के समान भयंकर गर्जन करते हुए इस पृथ्वी को चारों ओर से
खोद डाला, किन्तु उन्हें कहीं भी घोड़े का पता न चला। तब वे अपने पिता के पास
लौट आये और बोले—'हे देव, हमने समस्त पृथ्वी छान डाली, किन्तु कहीं भी हमें अश्व
के चोर का पता नहीं चला। अब जैसी आपकी आज्ञा हो।'
"तब राजा ने अत्यन्त क्रोध से अपने पुत्रों से कहा—'तुम लोग समस्त विश्व में
व्याप्त होकर घोड़े की खोज करो। बिना अश्व के तुम लोग यहाँ मत आना।'
"सगर-पुत्रों ने पिता की आज्ञा शिरोधार्य करके बड़ी भयंकर गति से रसातल में
प्रवेश किया। वहाँ वे पूर्व से लेकर दक्षिण की तरफ खोदने लगे। पूर्व दिशा-भर में खोजने
पर उन्हें कहीं भी घोड़ा दिखाई नहीं पड़ा। उन्होंने वहाँ पर एक श्रेष्ठ गजेन्द्र को देखा,
जो चारों ओर से पृथ्वी-तल को इस प्रकार संभाले हुए था, जैसे विष्णु ने अपनी सुन्दर
भुजाओं से पृथ्वी को ऊपर उठाया था। सगर के पुत्रों ने उस गजराज को देखकर उसकी
पूजा की और बिना विलंब किये आग्नेय दिशा में चल पड़े। वहाँ खोजने पर भी उन्हें
उस अश्व का पता नहीं लगा। वहाँ निरंतर बहनेवाले मदजल की सुगंधि से आकृष्ट,
भ्रमरों से युक्त 'पुण्डरीक' नामक गज को देखकर उसकी पूजा तथा स्तुति की और दक्षिण
दिशा में चल पड़े। वहाँ भी उन्हें अश्व का कोई समाचार नहीं मिला। किन्तु वहाँ
उन्होंने 'वामन' नामक श्रेष्ठ गज को देखकर उसकी अर्चना की और नैऋती दिशा में खोज
करने लगे। वहाँ भी अश्व का पता नहीं लगा। वहाँ उन्होंने कुमुद-समान कोमल तथा
कुमुद-पुष्प के वर्णवाले 'कुमुद' नामक कुंजर को देखा। उन्होंने उसको प्रणाम करके पश्चिम

=बालकांड ३५
की ओर प्रस्थान किया । वहाँ खोजने पर भी अश्व नही मिला । पर वहाँ उन्होने अजन-
पर्वत के समान, मदजल से युक्त 'अंजन' नामक हाथी को देखकर उसकी वंदना की ।
वे वहाँ से वायव्य दिशा में निकल पडे, पर बहुत समय तक खोजने पर भी
अश्व-का-पता नही लगा सके । वहाँ 'नमुचि' नामक राक्षस का सहार करनेवाले हाथी के
समान दाँत रखते हुए भी 'पुष्पदन्त' नाम से अभिहित गज को देखकर बडी भक्ति से
उसको प्रणाम किया और वहाँ से कुबेर की दिशा (उत्तर) में खोजने निकले । वहाँ भी
उन्हें अश्व नही दीख पडा । वहाँ उन्होने समस्त गज-लोक के चक्रवर्ती के समान विराज-
मान 'सार्वभौम' नामक गजेन्द्र को देखा और बडी भक्ति से उसको प्रणाम किया । वहाँ से
ऐशानी दिशा में चले । उस समय उन्होने निकट ही नेत्र बंद किये हुए एकांत तपोनिष्ठा
में लीन हवनाग्नि के समान ( पवित्र ) अनघात्मा महामुनि कपिल को और उनके पास
ही अश्व को (बँधा हुआ) देखा । सगर-पुत्र उन्हें कष्ट देने लगे । जब मुनि ने
क्रोध में आकर उनकी ओर दृष्टि डाली, तब वे साठ हजार सगर-पुत्र वही भस्मीभूत
हो गये ।
“अश्व के लाने में विलंब होते देखकर 'सगर' बहुत दुखी हुए और उन्होने अपने
पोते अंशुमान् को भेजा । अंशुमान् भी उसी मार्ग से गया और पूर्व दिशा में रहनेवाले
'विरूपाक्ष' नामक हाथी को देखकर उसकी परिक्रमा की और उससे विनयपूर्वक पूछा—
'हे गजराज, क्या आप बता करते है कि मेरे चाचा किस दिशा में गये है, कहाँ है और
अश्व का चोर कहाँ छिपा है ?'
तब उस गजराज ने अंशुमान् को बडे स्नेह के साथ देखते हुए कहा—'हे राज-
कुमार, तुम किसी स्थान में अवश्य अश्व को देख सकोगे ।' वहाँ से चलकर प्रत्येक दिग्गज
से इसी प्रकार प्रश्न करते हुए और इसी प्रकार का उत्तर प्राप्त करते हुए अंत में उसने
कपिल मुनि के निकट यज्ञाश्व को देखा । वहाँ सगर-पुत्रो के शरीरो की भस्म-राशियो को
देखकर वह शोक-सन्तप्त हो गया । उसने अपने पितरो की तिलोदक-क्रिया करने के विचार
से जल की खोज की, पर वहाँ जल कही भी नही मिला ।
२७ गंगावतरण की कथा
“उस राजकुमार पर दया करके उस समय वहाँ गरुड आये और राजकुमार से कहने
लगे—'हे पुत्र, कपिल को क्रोधित करके उनकी क्रोधाग्नि से सभी सगर-पुत्र भस्म हो गये है ।
इस तरह शोक-सन्तप्त क्यो होते हो ? यह शोक करने का समय नही है । एक बात सुनो ।
सरसिजासन ( ब्रह्मा ) के लिए वंद्य, अरविंद-चरणवाले, अरविंददल-नेत्रवाले, आदि-
पुरुष (विष्णु) ने दानव-राजा बलि को बाँधते समय, त्रिविक्रम का रूप धारण करके,
अपनी अगणित शक्ति से दो पादो में ही समस्त पृथ्वी को समेट लिया था और जलजात,
जलचर, तथा शंख-चक्र के लिए परिचित तीसरा चरण ब्रह्मलोक तक फैलाया था । तब
ब्रह्मा शीघ्र वहाँ आये और बडी भक्ति के साथ अपने कमंडल के जल से उनके चरण-
कमल धोये । वह जल स्वर्गलोक में मंदाकिनी के नाम से बह रहा है । तुम बडी भक्ति
के साथ ब्रह्मा की कृपा पाने के लिए तपस्या करो और स्वर्गलोक की उस गंगा को इस

३६ रंगनाथ रामायण
पृथ्वी पर ले आओ । उस पवित्र जल से इन भस्म-राशियो को सींचने से ही सगर-पुत्रो
को स्वर्गलोक का सुख प्राप्त होगा । इसलिए तुम पहले इस अश्व को लेकर जाओ ।'
"अंशुमान् अश्व को अपने साथ लेकर गया और अपने दादा को सारी कथा कह
सुनाई । मगर अन्यत दुःखी हुए । उन्होने पुण्य-यज्ञ समाप्त किया और उसके पश्चात्
मन्दाकिनी को पृथ्वी पर लाने के उद्देश्य से तीस हजार वर्ष तक सतत तप करते रहे और
(बिना सिद्धि प्राप्त किये ही) स्वर्ग सिधारे । उस राजा का पोता अंशुमान् भी मन्दाकिनी
को पृथ्वी पर लाने का दृढ सकल्प करके लगातार तीस हजार वर्ष तक तपस्या करने
के बाद स्वर्ग-लोक को प्राप्त हुआ । उसका पुत्र राजा दिलीप भी मन्दाकिनी को पृथ्वी
पर लाने के उद्देश्य से तीस हजार साल तक तपस्या करता रहा और अत में वह भी
रोग-पीडित होकर दिवगत हुआ । उसके पुत्र पुण्यवान् भगीरथ ने अपना राज्य अपने मत्रियो के
हाथो में सौंपकर धर्मात्मा तथा सद्गुण-सपन्न पुत्रो की प्राप्ति तथा पृथ्वी के समस्त
पापो को दूर करने की इच्छा से आकाशगगा को पृथ्वी पर ले आने का दृढ सकल्प कर
लिया । उन्होंने अन्यत भक्ति के साथ गोकर्णाश्रम में दस हजार वर्ष तक अनुपम रीति से
तपस्या की । उनकी तपस्या से सतुष्ट होकर ब्रह्मा ने उन्हें दर्शन देकर कहा कि तुम कोई
वर माँगो ।
"तब भगीरथ ने हाथ जोडकर कहा—'हे भ र्ती-वल्लभ, हे लोक-स्रष्टा, हे सूर्यलोक-
रक्षक, हे सत्यसपन्न, हे विधाता हमारे पूर्वज अपनी उद्दण्डता के कारण कपिल की क्रोधाग्नि
में भस्मीभूत होकर सौ सहस्र वर्षों से परलोक-गति से वचित हो भस्म के रूप में पड़े
हुए है । उस भस्म को मदाकिनी के पवित्र जल मे सीचे बिना उन्हें मुक्ति नही मिल सकती ।'
“इस पर ब्रह्मा ने कहा—'परमशिव के अतिरिक्त अन्य कोई उस गगा को धारण
नहीं कर सकेंगे । इसलिए, तुम निष्ठा के साथ शिव की तपस्या करो कि वे गगा को
धारण करें ।' इतना कहकर ब्रह्मा ने भगीरथ को उनकी इच्छा के अनुसार पुत्र-प्राप्ति का
वर दिया और ब्रह्मलोक को चले गये ।
"उसके पश्चात् भगीरथ ने एक अगूठे पर खडे होकर शिवजी के प्रति घोर तपस्या
की । उनकी तपस्या से संतुष्ट होकर शिवजी ने उन्हें दर्शन देकर कहा- "तुम गगा को ले
जाओ, मैं उसे अपने सिर पर धारण करूँगा ।' तब भगीरथ ने गगा की प्रार्थना की ।
गगा गगन-मडल तथा नक्षत्र-मडल को भेदकर समस्त लोको को अपने गुरु गर्जन से
गुंजाती हुई, सारे जगत् को भयभीत करती हुई, यो प्रवाहित होने लगी, मानो वह कुल-
पर्वतो से युक्त पृथ्वी के साथ महादेव को भी पाताल तक बहा ले जाना चाहती हो ।
शिवजी ने उसका गर्व-भग करने के लिए अपने जटा-जूट को ऐसा बढाया कि गगा उसमें
उलझकर बाहर निकलने में असमर्थ हो गई ।
"तब भगीरथ आश्चर्य करने लगे, उतनी विशाल जल-धारा कहाँ छिप गई होगी !
उन्हें भय होने लगा । इसलिए, वे फिर शिवजी के प्रति उग्र तपस्या करने लगे । भगीरथ
के तप से संतुष्ट होकर (शिव ने) अपने जटा-जूट में बँधी हुई गगा से कहा—'अब तुम
भूलोक में चली जाओ ।'

“तब गगा उनके जटा-जूट के दक्षिण भाग मे बाहर निकली । उस मदाकिनी की
धारा में मुकुलित कमल ऐसी शोभा दे रहे थे, मानो वह (मदाकिनी) पाताल की ओर
देखकर अपनी दिव्य-दृष्टि से वहाँ के कपिल मुनि को पहचानकर, उनकी महिमा पर
आश्चर्य करती हुई हाथ जोड़े उनसे प्रार्थना करती हो कि (हे मुनि) आपको जिन भयंकर
व्यक्तियो ने दुःख दिया था, उन्हें सुगति प्रदान करने के लिए मैं आ रही हूँ, आप क्रोध
न करें । उस धारा में भँवर ऐसे पड़ रहे थे, मानो उस मुनि के क्रोध की कल्पना करके
मदाकिनी भय से व्याकुल हो रही हो । धारा के बीच कमल-पुष्पो के भीग जाने मे उनमें
बैठे न रह सकने के कारण भ्रमर आकाश में व्याप्त हो, इस प्रकार गुजार कर रहे थे,
मानो सगर-पुत्रो के पाप, वेग से आनेवाली मदाकिनी की धारा को देखकर इधर-उधर
भागते हुए शिवजी से विनती कर रहे हो कि (हे शिवजी) गगा हम पर आक्रमण करने
के लिए आ रही है, हम अब भागकर कहाँ जायें ? हंस आकाश-पथ में ऐसे मँडरा रहे थे,
मानो शिव के जटा-जूट से पृथ्वी पर उतरनेवाली गगा को धूप से बचाना चाहते हों।
उस नदी की सुन्दर तथा उत्तुंग लहरें ऐसी शोभा दे रही थी, मानो वे सगर-पुत्रो
के पाप-समूह को मिटानेवाले उस (नदी के) हाथ हो । धारा इतने अधिक फेन मे
व्याप्त थी, मानो भगीरथ की अनुपम कीर्त्ति समस्त संसार में व्याप्त होने के लिए एकत्र
हो रही हो । उस नदी का अतुल घोष क्रमशः बढ़ता हुआ सारे ब्रह्माण्ड तथा आकाश में
व्याप्त हो गया । इस प्रकार वह शिव के जटा-जूट मे विंदु-सरोवर में यह कहती हुई
उतरी कि मैं इस संसार के पापियो को पुण्य प्रदान करने के लिए आ रही हूँ । ब्रह्मा
आदि देवता उसकी स्तुति करने लगे । सुर तथा खेचर बडे उत्साह से यह दृश्य देखने लगे ।
गरुड तथा गंधर्व उसकी प्रशंसा करने लगे ।
“मदाकिनी की धारा की सात शाखाएँ हुईं । पावनी, ह्लादिनी, और नलिनी नामक तीन
शाखाएँ पूरव की ओर गईं । सीता, सुचक्षु तथा सिंधु नामक तीन शाखाएँ पश्चिम की
की ओर गईं । एक शाखा राजा भगीरथ के पीछे भूलोक की ओर चली । वह श्रेष्ठ
तथा विशाल जल-धारा आकाश-मार्ग में शरत्काल के वादल के समान शोभित हो रही थी ।
वह जल-धारा, पृथ्वी की तरफ इस प्रकार उतर रही थी, मानो स्वर्गकामी भूलोक-
निवासियो के लिए सीढ़ी लगी हो । उसकी तरगो की ध्वनि पृथ्वी तथा आकाश को गुंजा
देती थी । उस धारा में ऐसे भँवर पड़ रहे थे, मानो वह यह बताना चाहती हो कि मैं
(पृथ्वी) के समस्त पापो को उसी तरह नचा दूँगी (ध्वंस कर दूँगी) ।
“पृथ्वी पर उसके उतरते समय जल की बूँदें आकाश की तरफ ऐसे उछल रही थी,
मानो वे नक्षत्रो से मित्रता करना चाहती हो । उसका स्वच्छ फेन-समूह ऐसा सुशोभित
हो रहा था, मानो वह नदी (बडे हर्ष से) हँसती हुई यह कह रही हो कि में धर्मात्माओ
की पवित्र कीर्त्तियो के लिए योग्य स्थान हूँ । उस धारा में क्रीडा करनेवाली
मछलियाँ ऐसी दीख रही थी, मानो नदी कह रही हो कि मैं अपने असंख्य नेत्रो से पृथ्वी
की श्रेष्ठता देखूँगी । इस प्रकार भिन्न-भिन्न जलचरो से युक्त हो, वह नदी पृथ्वी पर
उतर आई ।

३८ रंगनाथ रामायण
“तब सौ-सौ सूर्यों की कान्ति के समान प्रकाशित होनेवाले, बहु-रत्न-खचित आभूषणो
की कान्ति-से सारे आकाश को दीप्तिमान् करने हुए, गज तथा विमानो-में आरूढ होकर
अमर, गवर्व तथा सिद्ध वडे कौतुक से इस दृश्य को देखने आये । उस प्रवाह-की-चंचल
गति को देखकर महानागो ने भी उनके सामने घुटने टेके ।-देवताओ ने-जप आदि-करके
उस नदी में स्नान किया और बहुत ही प्रसन्न हुए । अप्सराओ ने नृत्य किया, देवो तथा
मुनियो ने बडे हर्ष से उस नदी की पूजा-पुष्पो से की । उस पुण्य-नदी की धारा में
अमित पापी तथा शाप-पीडित जन स्नान करके स्वर्ग जाने लगे । देवता, अप्सराएँ, गवर्व,
दनुज, पन्नग, यक्ष, किन्नर आदि बडे उत्साह से भगीरथ के रथ के पीछे-पीछे चले ।
“तब वह गंगा बडे-बडे पर्वतो को भेदती हुई भगीरथ के पीछे-पीछे जाने लगी ।
उसी मार्ग में जह्नु नामक ऋषि की यज्ञ-भूमि थी । गगा ने अपने अतुल प्रवाह से उस
आश्रम-भूमि को घेर लिया । यज्ञोपकरण सभी गगा के प्रवाह में बह गये । यज्ञ में विघ्न
पडा हुआ देख, जह्नु क्रुद्ध हुए और उद्धत गति से आनेवाली उस गगा का सारा जल
पी गये । तब देवता तथा मुनियो ने भगीरथ से कहा—‘हे राजन्, यह मुनि क्रोध-में
आकर गगा को पी गये है । आप उनसे अपना क्रोध त्यागने तथा गगा को 'मुक्त करने
की प्रार्थना कीजिए । मुनि प्रसन्न होकर आपकी प्रार्थना स्वीकार करेंगे ।' तब भगीरथ
बडी भक्ति तथा विनय के साथ हाथ जोडकर उस मुनि से प्रार्थना करने लगे ।
“हे मुनिचन्द्र, हे विमलात्मा, मे इस श्रेष्ठ गगा को घोर तपस्या के उपरान्त पृथ्वी
पर ला सका हूँ । किंतु, यहाँ आने के बाद मै उसे खो बैठा । हे धन्यचरित, हे सयंमीन्द्र,
आप कृपाकर उसे मुक्त कर दें ।' (राजा की बात सुनकर मुनिवर के मन में दया उत्पन्न
हुई) वे बोले-‘हे भगीरथ, गगानदी को इस प्रकार पृथ्वी पर ले आने में आपकी तपस्या,
आपके महत्त्व तथा आपकी कीर्ति का वर्णन मै कैसे करूँ ? अब मे गंगा को मुक्त कर दूंगा ।
इस ससार में आपके यश की व्याप्ति होगी ।'
“इस प्रकार कहकर, गगा को मुंह से छोडकर उसे जूठान-करने की 'इच्छा से
उन्होंने अपने कान के मार्ग से उसे बाहर छोड दिया । पूर्व की तरह गगा प्रवाहित
होने लगी । तभी उसका नाम जाह्नवी पड़ गया ।
“जिस प्रकार पूर्वकृत पुण्य जीवन के विघ्नो को दूर करता हुआ आता है, उसी
प्रकार जाह्नवी राजा के पीछे चली और समुद्र में प्रवेश करके रसातल में पहुँच गई ।
वहाँ सगर-पुत्रो की भस्म-राशियो को अपने पुण्य-सलिल से सींचा । तब कमलासन (ब्रह्मा) ने
बडे हर्ष से भगीरथ से कहा—‘हे राजन्, जबतक समुद्र में जल रहेगा तबतक ये
सगर-पुत्र दिव्य चदन, वस्त्रामूषणो से अलकृत 'हो स्वर्ग-लोक में दिव्य भोगो का अनुभव
करेंगे । हे अनघ, आज से यह नदी भागीरथी, त्रिपथगा तथा जाह्नवी के नामो से-समस्त
लोको में विख्यात होगी । तुम्हारे पूर्वज सगर, अंशुमान् तथा दिलीप ने जो-सकल्प किया था,
वे उसे सिद्ध नही कर सके । तुम बडे प्रयत्न के उपरान्त गगा को 'इस पृथ्वी पर ले
आये हो, (अतएव) तुम गगाजल के निर्मल तथा कमनीय पद को प्राप्त करके चिर कीर्ति-
वान् होकर निवास करो । काकुत्स्य-वश की प्रतिष्ठा तथा गौरव के आधार-स्वरूप पुत्रो

बालकाण्ड ३९
को प्राप्त करो । तुम सुन्दर धर्मों के आधार हो गये । अब तुम इस पुण्य-सलिल में विधिवत्
पुण्य-स्नान करके उसका फल प्राप्त करो ।' यों कहकर कमलसम्भव (ब्रह्मा) अपने
लोक को चले गये ।
"उसके पश्चात् भगीरथ ने गंगा में स्नान करके बड़ी निष्ठा के साथ साठ हजार
सगर-पुत्रों की तिलोदक-क्रिया की । उस पुण्य-क्रिया के फलस्वरूप सगर-पुत्रों ने अमरत्व
प्राप्त किया और भगीरथ को आशीर्वाद देकर स्वर्गलोक सिधारे । पुण्यवान् भगीरथ अयोध्या
लौटकर सुख से राज्य करने लगे ।
"पापों का नाश करनेवाला यह उपाख्यान जो कोई भक्ति से पढ़ेगा या सुनेगा, वह अनन्त
पुण्य प्राप्त करता हुआ धन-धान्य तथा यश से समृद्ध हो चिरजीवी होगा । उसपर सभी देवता
प्रसन्न होंगे, उसके सभी कार्य सिद्ध होंगे, उसे स्वर्ग की प्राप्ति होगी तथा उसके पितरों को
सद्गति मिलेगी ।”
इस प्रकार राघव ने गंगावतरण की कथा कौशिक से सुनकर उनकी प्रशंसा
करते हुए कहा—'हे मुनीन्द्र में आपसे पृथ्वी पर गंगावतरण की कथा बड़े आश्चर्य के साथ
सुन प्रसन्न हुआ ।'
(उन्होंने) वह रात्रि वहीं बिताई और प्रातःकाल ही उस प्रसिद्ध नदी में स्नान
करके संध्या आदि कार्यों से निवृत्त होकर जाह्नवी नदी को पार किया । नदी के उत्तर
तट पर निवास करनेवाले मुनियों की बड़ी भक्ति के साथ पूजा की और उस स्थान को
छोड़कर आगे चले ।
थोड़ी दूर जाने पर उन्हें 'विशाला' नामक सुन्दर नगर दिखाई पड़ा । तब राम ने
गाधेय को संबोधित करके पूछा—'हे मुनि, इस नगर का नाम क्या है ? किस वंश का
राजा यहाँ राज्य करता है ? आप कृपाकर बतलाइए ।'
२८. अमृत-मंथन की कथा
तब कौशिक ने राघव से कहा—"मैंने बहुत पहले यह कथा इन्द्र से सुनी थी ।
प्राचीन काल में दिति के अत्यन्त बलवान् तथा पराक्रमी पुत्र तथा अदिति के बड़े धर्मात्मा
पुत्र उत्पन्न हुए । उन्होंने सोचा कि क्षीरसागर को पहले रस तथा ओषधियों से भरकर
उसका मथन करें और उस जलराशि से उत्पन्न होनेवाली श्रेष्ठ तथा कान्तियुक्त वस्तुओं को
बड़ी प्रसन्नता से ग्रहण करें । (इस प्रकार सोचकर) वे मंदर-पर्वत को मथनी और
वासुकी को रस्सी बनाकर मथन करने लगे । उस समय समुद्र में से समस्त लोकों को,
मन्मथ-समुद्र में डुबोने की क्षमता रखनेवाला सौन्दर्य, क्वणित होनेवाली करधनी से युक्त
गुरु नितम्ब, क्षीण कटि, सुन्दर कुच, कोमल भ्रू-लता-रूपी कोदण्डवाले कामदेव के बाणों के
समान (तीक्ष्ण) कटाक्ष, भव्य भुज-लता-विक्षेप, अमर नव-यौवन तथा कमनीयता से
सुशोभित साठ हजार अप्सराएँ तथा उन सुन्दरियों के योग्य हाव-भावों से युक्त परिचारिकाएं
उत्पन्न हुईं । उन अप्सरा-युवतियों को देवता तथा दैत्यों ने क्रमश ले लिया । उसके
पश्चात् भी समुद्र-मंथन चलता रहा । तब वरुण की पुत्री वारुणी का जन्म हुआ । दिति के
पुत्रों ने उसका वरण करना स्वीकार नहीं किया । इसलिए वे असुर कहलाये । अदिति

४० रंगनाथ रामायण
के पुत्रों ने उसे स्वीकार कर लिया । इसलिए, वे सुर के नाम से विख्यात हुए । इसके
पश्चात् उच्चै श्रवा नामक अश्व, श्वेत गज (ऐरावत) तथा कौस्तुभ-मणि का जन्म हुआ ।
कौस्तुभ-मणि के बाद अमृत उत्पन्न हुआ । अमृत के बाद सुधा-कमण्डल को लिये धन्वन्तरि
का जन्म हुआ । फिर विष उत्पन्न हुआ । जब वह (विष) अत्यन्त भयंकर अग्नि के
समान व्याप्त होने लगा, तब शिव ने उसका पान किया । इसके उपरान्त अमृत के लिए
सुर और असुर परस्पर युद्ध करने लगे । उस समय उन सुरासुरों को देखकर सुरों पर
कृपा करते हुए, विष्णु एक सुन्दरी का रूप धारण कर आये और अमृत का वितरण करने
लगे । उस समय राहु तथा केतु नामक राक्षस (विष्णु के मन की बात जानकर) सुरों
की पंक्ति में आकर बैठ गये और अमृत के लिए हाथ फैलाया । उनके शरीर की कान्ति
देखे बिना ही उस सुन्दरी ने अमृत दे दिया । रवि तथा शशि ने बड़ी घबराहट के साथ
इसे देखा और सुन्दरी को आँख के संकेत से यह बताया । तब विष्णु ने क्रुद्ध होकर अपना
चक्र उन (राक्षसों) पर चलाकर उनके सिर काट डाले । उन्होंने उन राक्षसों के सिरों को
ग्रहों के रूप में आकाश में प्रतिष्ठित किया । अमृत-पान करने से वे मृत्यु को प्राप्त हुए
बिना रहने लगे । उसी दिन से वे (राक्षस) पुण्य के दिनों में सूर्य और चन्द्र को
पीड़ा पहुँचाने आ रहे हैं ।
"सुन्दरी ने असुरों की आँख बचाकर सुरों को ही अमृत दिया और युद्ध में उनकी
विजय भी प्रदान की । इन्द्र ने सभी दैत्यों का नाश किया और तीनों लोकों का अधिपति
बनकर राज्य करने लगा ।
"अपने सभी पुत्रों की मृत्यु से दुःखी होकर दिति ने बड़ी दीनता से अपने पति कश्यप
से कहा—'हे महात्मा, आप मुझे एक ऐसा पुत्र प्रदान कीजिए, जो इन्द्र को भी मारने
की शक्ति तथा पराक्रम रखता हो ।' उसकी प्रार्थना स्वीकार करके कश्यप ने कहा—'हे
भद्रे, यदि तुम एक हजार साल तक शुद्धात्मा तथा पवित्र रह सकोगी, तो तुम्हें तीनों लोकों को
जीतनेवाला तथा इन्द्र का अन्त करनेवाला पुत्र मुझसे प्राप्त होगा ।' यों कहकर उन्होंने
अपने कर-कमल से दिति के शरीर का मृदु गति से परिमार्जन कर दिया । इसके पश्चात्
वे तप करने चले गये ।
"उनके चले जाने के बाद दिति 'कुशप्लव' (नामक स्थान में) उग्र तपस्या करने
चली गई । यह वृत्तान्त जानकर इन्द्र माता दिति के पास शिष्य के रूप में पहुँच गया
और बड़ी भक्ति के साथ उनकी पूजा-अर्चना करने के लिए आवश्यक कुश, समिधा,
फल, कन्द-मूल, जल आदि वस्तुएँ जुटाते हुए सतत उनकी सेवा-परिचर्या करता रहा । दिति
जब जो वस्तु चाहती, वह उसके संकेत-मात्र से ही वह वस्तु वहाँ प्रस्तुत कर देता था । इस
प्रकार नौ सौ निन्यानवे वर्ष बीत गये ।
"एक दिन दिति अपने मन की बात छिपा नहीं सकी । उन्होंने इन्द्र से कहा—
'हे इन्द्र, मैंने तुम्हारे पिता से एक पुत्र की प्रार्थना की थी । एक हजार वर्ष के उपरान्त
मुझे एक पुत्र होगा, ऐसा वर उन्होंने मुझे प्रदान किया है । आज से दस वर्ष के पश्चात्
तुम्हारे भाई का जन्म होगा । तुम और वह दोनों तीनों लोकों का राज्य करोगे और
यशस्वी बनोगे ।'

बालकाण्ड | ४१
उस दिन मध्याह्न के समय दिति थकावट के कारण अपने केश बिखेरकर (खाट
पर) पायताने की तरफ सिर रखकर सो गईं । उन्हें इस प्रकार देखकर इन्द्र बहुत प्रसन्न
हुआ और सोचा कि यही मेरे लिए अच्छा अवसर है । उसने अपनी योग-शक्ति से दिति के
गर्भ में प्रवेश किया और अपने वज्रायुध से अपने शत्रु-शिशु के खण्ड-खण्ड करने लगा ।
शिशु का रुदन सुनकर दिति जाग पडी । तब इन्द्र धीरे-धीरे कहने लगा—'मा रुद मा
रुद (मत रोओ, मत रोओ) । दिति चिल्लाने लगी—'शिशु का वध मत करो।' दिति का
क्रन्दन सुनकर इन्द्र गर्भ से बाहर आ गया और हाथ जोडकर बडी भक्ति के साथ
दिति से कहा--'माता, आप मुक्तकेशी होकर पायताने की ओर सिर किये सो रही थी ।
इससे आपकी पवित्रता में भग पड गया । इसलिए मैंने अपने कार्य की सिद्धि के लिए
आपके गर्भ में प्रवेश करने का साहस किया और मेरा नाश करने के लिए उत्पन्न होने-
वाले गर्भस्थ शिशु के सात खण्ड कर दिये । नन्हा शिशु मेरा शत्रु था, इसलिए मैने उसका
वध किया । हे माता, धर्म का विचार करके आप (मुझे) क्षमा कीजिए ।' इस प्रकार
इन्द्र दुख प्रकट करने लगा ।
“इन्द्र को दुःखी देखकर दिति ने कहा—'हे स्वर्ग के स्वामी, इसमें तुम्हारा कोई
दोष नही है । सारा दोष मेरा ही है । ये सातो खण्ड मरुत नाम से तेजस्वी बनकर
उत्पन्न होगे । तुम उन्हें इच्छानुसार सारे ससार में विचरण करने देना । तुम मेरे इन
सातो पुत्रो को सप्त मारुतो के गण-नायक बनाना । यही तुमसे मेरी विनती है ।'
“इन्द्र उनकी प्रार्थना स्वीकार करके इन्द्रलोक को चला गया । वे सातो शिशु क्रमश
इन्द्र की मित्रता प्राप्त करके मरुद्गण तथा देवता बन गये । इसी पुण्य-प्रदेश में देवेन्द्र ने
दिति की परिचर्या की थी । वही पर इक्ष्वाकु नामक राजा ने अपनी रानी अलंबुषा से
'विशाल' नामक पुत्र उत्पन्न किया था । उस विशाल ने यहाँ 'विशाला' नामक नगर का
निर्माण किया । उस विशाल के हेमचन्द्र नामक पुत्र हुआ । उसने सुचन्द्र को, सुचन्द्र ने
धूम्राश्व को, धूम्राश्व ने सृजय को, सृजय ने कुशाश्व को, उसने सोमदत्त को, सोमदत्त ने
ककुत्स्थ को और ककुत्स्थ ने सुमति को जन्म दिया । वह सुमति अभी इस नगर में रहते
हुए अत्यन्त धर्म-बुद्ध होकर राज्य कर रहा है । हे अनघ, धर्म तथा वैभवसपन्न ये राजा
ससार में 'वैशालिक' के नाम से विख्यात है । हम यहाँ आज की रात्रि बितायें और
प्रात काल होते ही राजा को देखने चलेंगे ।”
वहाँ का राजा सुमति विश्वामित्र के आगमन का समाचार जानकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ ।
वह अपने पुरोहित तथा वधु-जनो के साथ नगर के बाहर आया और विधिवत् सयमीन्द्र
विश्वामित्र की पूजा करके उनसे हाथ जोड़कर बडी श्रद्धा से कहा—'हे मुनीन्द्र, में आज
इस पृथ्वी पर धन्य हुआ । मेरा जन्म सार्थक हुआ ।'
परस्पर कुशल-प्रश्नो के पश्चात् सुमति ने विश्वामित्र को सबोधित करके कहा—
'हे मुनिनाथ, आपके साथ रहनेवाले असमान रूपवान्, विशालबाहु, दिव्य-पराक्रमी, गज की
गतिवाले, सिंह-सम शक्तिशाली, ललित तथा प्रफुल्ल अरविंद-सम नेत्रवाले, धनुष तथा करवाण-
धारी, आकाश जैसे रवि-शशि के सचार से अलकृत होता है, वैसे ही आपके पदन्यास को
६

४२ रंगनाथ रामायण
अलंकृत करनेवाले, दर्शकों को दोनों ही सब प्रकार से समान दीखनेवाले ये कुमार कौन हैं ?
किसके पुत्र हैं ? कृपया बताइए ।'
तब विश्वामित्र ने उसे देखकर कहा—"हे राजकुल-चन्द्र, हे सद्गुण-सागर, मैं इनका
वृत्तान्त तुम्हें सुनाता हूँ, तुम सुनो । सरयू नदी के किनारे कोशल-देश में अयोध्या नामक
नगर है । उस नगर में अत्यन्त प्रीति से प्रजा का पालन करनेवाले राजा दशरथ राज्य
करते हैं । यह उनका श्रेष्ठ पुत्र राम है । यह उनका अनुज लक्ष्मण है । मेरी प्रार्थना
पर राजा ने यज्ञ-रक्षणार्थ इन दोनों को मेरे साथ भेजा है । मेरे साथ आकर (इन दोनों ने)
मेरे यज्ञ की रक्षा की, युद्ध में बड़े पराक्रम के साथ सुबाहु का वध किया और
मारीच को परास्त किया। उनके पश्चात् मिथिला जाने के उद्देश्य से गंगा पार करके यहाँ आये हैं ।
ये राजचन्द्र सूर्य-वंश-तिलक हैं । उनके सामर्थ्य की कथा आश्चर्य में डालनेवाली है ।"
विश्वामित्र के वचन सुनकर राजा सुमति आश्चर्य-चकित हुआ । उसने उन राज-
कुमारों का आदर-सत्कार किया । उन्होंने प्रेम से राजा का आतिथ्य ग्रहण किया । सबने
रात्रि वहीं बिताई और प्रभात होने पर राजा ने उनको वहाँ से विदा किया ।
२९. गौतम के आश्रम का वृत्तान्त
(वहाँ से चलकर) मार्ग में चलने-चलते राघव ने गौतम के आश्रम को देखकर
गाधि-पुत्र को संबोधित करके कहा—"हे मुनीश्वर, ललित पल्लवों से युक्त, आम्र, कटहल,
नारंगी, जंबीर, नारिकेल, देवदारु, बिजोरी, नींबू, बेल, सुपारी, केला, अशोक, लाख, दाड़िम,
तेंदू, सेमल, चन्दन, कर्पूर, मीठे आम, भिलावाँ, गुग्गुल, आदि पेड़ों म सुशोभित, सिंदुवार, पुन्नाग,
मौलसिरी, चमेली, कुन्द, कर्चूर आदि पुष्पों की सुगन्धि मे परिपूर्ण, सर्वत्र व्याप्त लौंग तथा
एला की लताओं से युक्त, सरोवरों मे सुशोभित, रम्य पक्षियों के कल-कूजन से मुखरित
यह आश्रम-भूमि आज निर्जन क्योँ है ? इसके पहले कौन मुनि यहाँ तपस्या करते थे ?
कृपया बतलाइए ।"
तब मुनि ने कहा—"किसी समय गौतम मुनि अहल्या के साथ इस आश्रम में
अत्यन्त निष्ठा मे घोर तपस्या करते थे । यह देख इन्द्र ने उनकी तपस्या में बाधा डालनी
चाही । एक दिन उसने मुर्ग के रूप में पर्णशाला के पास पहुँचकर वाँग दी । मुनि (प्रात-
काल हो गया समझकर) अनुष्ठान करने के लिए (नदी-तट पर) चले गये । तब इन्द्र
गौतम का रूप धारण करके आया और अहल्या को देखकर कहा—'अभी रात्रि बहुत
बाकी है। हे सुन्दरी, यह तुम्हारा ऋतु-काल है । इस समय रति-क्रीड़ा करने की इच्छा
से ही मैं आया हूँ।' इस पर (सारी बातें जानकर) अहल्या ने कहा—'मैं जानती हूँ कि
तुम इन्द्र हो, अन्दर चले आओ ।' यों कहती हुई वह इन्द्र को पर्णशाला में ले गई
और उनके साथ रति-क्रीड़ा की । जब इन्द्र झिझक तथा भय से वहाँ से जाने लगा, तभी
गौतम मुनि वहाँ पहुँच गये । (इन्द्र को देख) उन्होंने शाप दिया—'रे पापी, क्या यह
तुम्हारे लिए उचित है कि तुम मेरा रूप धारण कर मेरी पत्नी से मिलो । इस पाप-कर्म
के लिए तुम अण्डकोश-रहित हो जाओ ।' गौतम का शाप अप्रतिहत होकर उसे लगा और
तुरंत उसके अण्डकोश भूमि पर गिर गये ।