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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 508 में से

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पृष्ठ 64

३४ रंगनाथ-रामायण
वध करके अश्व को शीघ्र ले आओ।' साठ हजार सगर-पुत्र अपने भुज-बल का प्रदर्शन
करते हुए, निकल पड़े। उन्होंने पहले स्वर्ग, फिर भूलोक में अच्छी तरह उस अश्व को
ढूंढ़ा। जब कहीं भी उसका पता न चला तब वे पृथ्वी को टुकड़े-टुकड़े करने लगे। 'हममें
से प्रत्येक एक योजन पृथ्वी को खोद डालेंगे'—ऐसा निश्चय करके वे प्राच्य दिशा से
प्रारंभ करके, बड़ी-बड़ी कुदालों और शूलों से पृथ्वी को रसातल तक खोदने लगे। इस
प्रक्रिया में सामने आनेवाले पातालवासी तथा अन्य प्राणियों के समूहों का संहार भी वे
करते जाते थे।
"इस प्रकार उन अतुल बलशाली राजकुमारों ने साठ हजार योजन भूमि सहज ही
खोद डाली। इस प्रकार असंख्य प्राणियों से युक्त जंबूद्वीप को सतत खोदते हुए, उपद्रव
करनेवाले सगर-पुत्रों को देखकर अमर गंधर्व तथा सिद्ध घबरा उठे और ब्रह्मा के पास
जाकर भक्ति से प्रणाम करके बोले—'हे जलजसंभव, वन, पर्वत तथा द्वीपों से युक्त इस
पृथ्वी को सगर-पुत्र खोद रहे हैं। जो कोई भी उनकी दृष्टि में पड़ जाता है, उसे 'इसीने
यज्ञ में बाधा डाली है, यही अश्वहर है,' ऐसा कहते हुए व्यर्थ ही उसका वध कर डालते हैं।
इस प्रकार उन्होंने कितने ही शक्ति-संपन्न जलचरों का संहार कर डाला। आप कृपया
इसके निवारण का कोई उपाय कीजिए।
"तब ब्रह्मा ने उनसे कहा—'अव्यय दामोदर (विष्णु) कपिल मुनि के रूप में तप कर
रहे हैं। उन मुनि की क्रोधाग्नि में वे सब भस्म हो जायेंगे।'
"सगर-पुत्रों ने वज्र के समान भयंकर गर्जन करते हुए इस पृथ्वी को चारों ओर से
खोद डाला, किन्तु उन्हें कहीं भी घोड़े का पता न चला। तब वे अपने पिता के पास
लौट आये और बोले—'हे देव, हमने समस्त पृथ्वी छान डाली, किन्तु कहीं भी हमें अश्व
के चोर का पता नहीं चला। अब जैसी आपकी आज्ञा हो।'
"तब राजा ने अत्यन्त क्रोध से अपने पुत्रों से कहा—'तुम लोग समस्त विश्व में
व्याप्त होकर घोड़े की खोज करो। बिना अश्व के तुम लोग यहाँ मत आना।'
"सगर-पुत्रों ने पिता की आज्ञा शिरोधार्य करके बड़ी भयंकर गति से रसातल में
प्रवेश किया। वहाँ वे पूर्व से लेकर दक्षिण की तरफ खोदने लगे। पूर्व दिशा-भर में खोजने
पर उन्हें कहीं भी घोड़ा दिखाई नहीं पड़ा। उन्होंने वहाँ पर एक श्रेष्ठ गजेन्द्र को देखा,
जो चारों ओर से पृथ्वी-तल को इस प्रकार संभाले हुए था, जैसे विष्णु ने अपनी सुन्दर
भुजाओं से पृथ्वी को ऊपर उठाया था। सगर के पुत्रों ने उस गजराज को देखकर उसकी
पूजा की और बिना विलंब किये आग्नेय दिशा में चल पड़े। वहाँ खोजने पर भी उन्हें
उस अश्व का पता नहीं लगा। वहाँ निरंतर बहनेवाले मदजल की सुगंधि से आकृष्ट,
भ्रमरों से युक्त 'पुण्डरीक' नामक गज को देखकर उसकी पूजा तथा स्तुति की और दक्षिण
दिशा में चल पड़े। वहाँ भी उन्हें अश्व का कोई समाचार नहीं मिला। किन्तु वहाँ
उन्होंने 'वामन' नामक श्रेष्ठ गज को देखकर उसकी अर्चना की और नैऋती दिशा में खोज
करने लगे। वहाँ भी अश्व का पता नहीं लगा। वहाँ उन्होंने कुमुद-समान कोमल तथा
कुमुद-पुष्प के वर्णवाले 'कुमुद' नामक कुंजर को देखा। उन्होंने उसको प्रणाम करके पश्चिम