रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें=बालकांड ३५
की ओर प्रस्थान किया । वहाँ खोजने पर भी अश्व नही मिला । पर वहाँ उन्होने अजन-
पर्वत के समान, मदजल से युक्त 'अंजन' नामक हाथी को देखकर उसकी वंदना की ।
वे वहाँ से वायव्य दिशा में निकल पडे, पर बहुत समय तक खोजने पर भी
अश्व-का-पता नही लगा सके । वहाँ 'नमुचि' नामक राक्षस का सहार करनेवाले हाथी के
समान दाँत रखते हुए भी 'पुष्पदन्त' नाम से अभिहित गज को देखकर बडी भक्ति से
उसको प्रणाम किया और वहाँ से कुबेर की दिशा (उत्तर) में खोजने निकले । वहाँ भी
उन्हें अश्व नही दीख पडा । वहाँ उन्होने समस्त गज-लोक के चक्रवर्ती के समान विराज-
मान 'सार्वभौम' नामक गजेन्द्र को देखा और बडी भक्ति से उसको प्रणाम किया । वहाँ से
ऐशानी दिशा में चले । उस समय उन्होने निकट ही नेत्र बंद किये हुए एकांत तपोनिष्ठा
में लीन हवनाग्नि के समान ( पवित्र ) अनघात्मा महामुनि कपिल को और उनके पास
ही अश्व को (बँधा हुआ) देखा । सगर-पुत्र उन्हें कष्ट देने लगे । जब मुनि ने
क्रोध में आकर उनकी ओर दृष्टि डाली, तब वे साठ हजार सगर-पुत्र वही भस्मीभूत
हो गये ।
“अश्व के लाने में विलंब होते देखकर 'सगर' बहुत दुखी हुए और उन्होने अपने
पोते अंशुमान् को भेजा । अंशुमान् भी उसी मार्ग से गया और पूर्व दिशा में रहनेवाले
'विरूपाक्ष' नामक हाथी को देखकर उसकी परिक्रमा की और उससे विनयपूर्वक पूछा—
'हे गजराज, क्या आप बता करते है कि मेरे चाचा किस दिशा में गये है, कहाँ है और
अश्व का चोर कहाँ छिपा है ?'
तब उस गजराज ने अंशुमान् को बडे स्नेह के साथ देखते हुए कहा—'हे राज-
कुमार, तुम किसी स्थान में अवश्य अश्व को देख सकोगे ।' वहाँ से चलकर प्रत्येक दिग्गज
से इसी प्रकार प्रश्न करते हुए और इसी प्रकार का उत्तर प्राप्त करते हुए अंत में उसने
कपिल मुनि के निकट यज्ञाश्व को देखा । वहाँ सगर-पुत्रो के शरीरो की भस्म-राशियो को
देखकर वह शोक-सन्तप्त हो गया । उसने अपने पितरो की तिलोदक-क्रिया करने के विचार
से जल की खोज की, पर वहाँ जल कही भी नही मिला ।
२७ गंगावतरण की कथा
“उस राजकुमार पर दया करके उस समय वहाँ गरुड आये और राजकुमार से कहने
लगे—'हे पुत्र, कपिल को क्रोधित करके उनकी क्रोधाग्नि से सभी सगर-पुत्र भस्म हो गये है ।
इस तरह शोक-सन्तप्त क्यो होते हो ? यह शोक करने का समय नही है । एक बात सुनो ।
सरसिजासन ( ब्रह्मा ) के लिए वंद्य, अरविंद-चरणवाले, अरविंददल-नेत्रवाले, आदि-
पुरुष (विष्णु) ने दानव-राजा बलि को बाँधते समय, त्रिविक्रम का रूप धारण करके,
अपनी अगणित शक्ति से दो पादो में ही समस्त पृथ्वी को समेट लिया था और जलजात,
जलचर, तथा शंख-चक्र के लिए परिचित तीसरा चरण ब्रह्मलोक तक फैलाया था । तब
ब्रह्मा शीघ्र वहाँ आये और बडी भक्ति के साथ अपने कमंडल के जल से उनके चरण-
कमल धोये । वह जल स्वर्गलोक में मंदाकिनी के नाम से बह रहा है । तुम बडी भक्ति
के साथ ब्रह्मा की कृपा पाने के लिए तपस्या करो और स्वर्गलोक की उस गंगा को इस