रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 61, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंअगाधं श्रेष्ठ नदी दिखाई पड रही है, वहाँ तक हम कैसे पहुँचेंगे ?' तब मुनि बोले--
'हे नरनाथ, शोण नदी को पार करके तीन योजन आगे जाने पर हम उस महानदी के
पास पहुँच सकते हैं । तब तक हमें मार्ग में जल और फल आदि बहुत मिल जायेंगे ।'
यो कहकर वे (शोण) नदी पार करके चलने लगे । (निदान) वे उस गगा नदी
के तट पर पहुँचे, जो सारस-समूह, पुण्य-सलिल, विकसित-कमल, फेन तथा सुदर मछलियो
से युक्त हो नित्य गभीर गति से बहती थी । वे वहाँ घन-लता-कुञ्जो से युक्त एक समतल
स्थान पर ठहर गये । वहाँ राजकुमार मध्याह्न की (सध्या आदि) पूजाओ से निवृत्त हुए,
बडे आनन्द से उचित आहार ग्रहण किया और मुनियो की सगति में बैठकर वार्तालाप
करने लगे ।
(उस समय) राजहंसो द्वारा (कमल-पुष्पो को) हिलाये जाने से गिरे हुए कमल-
रज से पूर्ण तथा राजीव-राजित तरगो से युक्त गगा नदी को देखकर क्षत्रिय-तिलक रामचन्द्र ने
कौशिक से पूछा--'हे महात्मा, गगा नदी इस पृथ्वी पर कैसे आई, यहाँ से वह स्वर्ग-
लोक में कैसे पहुँची ? पाताल को वह कैसे प्राप्त हुई ? कैसे वह समुद्र में जा मिली ?
उस महानदी का जन्म कैसे हुआ ? कृपया बताइए ।'
तब उस पुण्यधनी विश्वामित्र ने राम से कहा--"हिमवान् (हिमालय) के कमनीय
दीप्तिवाली दो पुत्रियाँ हैं । देवता लोग हिमालय से प्रार्थना करके उन दोनो में से बडी
पुत्री पुण्यशीला गगा को यज्ञ के लिये स्वर्गलोक में ले गये । दूसरी कन्या परम सुदरी
पार्वती को भाल-लोचन (शिव) की घोर तपोनिष्ठा से सतुष्ट हो, उन्हें पत्नी के रूप में दिया ।
गगा सुरुचिर गति से स्वर्ग में गई और वहाँ सुरनदी के नाम से विख्यात हुई ।'
इतना कहने के बाद मुनिवर ने राजकुमार को देखकर कहा--"और एक वृत्तात है,
सुनो । पार्वती से विवाह करने के पश्चात् चन्द्र-शेखर (शिव) बडी अनुरक्ति के साथ
एक सौ दिव्य वर्षों तक रति-क्रीडा में निमग्न रहे । तब ब्रह्मा से लेकर समस्त देवता अपने-आप
सोचने लगे कि इन दोनो (शिव-पार्वती) का विषम तेज कौन धारण कर सकेगा ? इनके
द्वारा उत्पन्न पुत्र की विषम शक्ति के सामने कौन टिक सकेगा ? इसलिए वे सब महादेव
के पास जाकर बडी भक्ति से विनम्र हो कहने लगे--"हे देवाधिदेव, हे महेश, हे सर्वेश,
आपकी महिमा सभी देवता जानते है । हे सर्वज्ञ, आप हम पर प्रसन्न होइए । आपके
महान् तेज को धारण करने की क्षमता किस में हैं ? इसलिए आप यह क्रीडा छोड दें ।
आप कृपा करके तपोवृत्ति ग्रहण कर ब्रह्मचर्य का पालन कीजिए ।' इस पर गौरीश ने
उनकी बात स्वीकार कर ली और कहा--' (किन्तु) अब तो तेज अपने स्थान (रेत स्थान)
से विचलित हो चुका है । अब आपमें से कौन इस तेज को धारण करेगा ?' तब उनकी
बात मानकर हर ने अपने (तेज का) विमोचन धरती पर कर दिया । तब देवताओ ने
अग्निदेव को देखकर कहा--'हे पावक, तुम पवन के साथ, धरती पर पडे हुए तेज में
प्रवेश करो ।' अग्नि तथा वायु उस तेज को धारण करने में असमर्थ रहे । तब गगा नदी ने
उस तेज को बडी श्रद्धा के साथ धारण किया । लेकिन अपने प्रभु का तेज धारण
किये रहना उसके लिए भी असभव हो गया । वह भय से काँप उठी और उसकी लहरें