रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( सुनाई पडनेवाली ) देवताओ का आह्वान करनेवाली ध्वनियां तथा होताओ के पुण्य-
मंत्रो के शब्दो से दिशाएँ अत्यधिक गूंजने लगीं । एक ओर बडे आश्चर्य के साथ यज्ञ के
कार्य हो रहे थे, दूसरी ओर रामचन्द्र धनुष धारण कर, भाई सौमित्र के साथ, बडी सतर्कता से,
राक्षसो के आने का मार्ग पहले ही जानकर उस मुनि विश्वामित्र की रक्षा इस प्रकार
करने लगे, जैसे समस्त विश्व को अंधकार से आवृत होने से बचाने के लिए चंद्र और सूर्य
अपनी शाश्वत प्रभा फैलाते हैं । बडी भक्ति के साथ पाँच दिनो तक वे (उस यज्ञ की)
रक्षा इस प्रकार करते रहे, जैसे पलकें पुतलियो की रक्षा करती हैं । छठे दिन मारीच तथा
सुबाहु अपना समस्त बल इकट्ठा करके, उद्धत गति से आकाश में ऐसे व्याप्त हो गये,
मानो (उन सबके शरीर) काले मेघो की राशि हो और उनके श्रेष्ठ खड्गो की कांति
बिजली हो । वहाँ खडे होकर वे गर्जन करते हुए घमंड से फूलकर यज्ञ-भूमि में लगातार
रक्त-मांस की वर्षा करने लगे । तब होताओ में कोलाहल होने लगा । उपस्थित
सदस्यो में कल-कल ध्वनि प्रारंभ हो गई । परिचारको के दीन वार्त्तालाप सुनाई
पडने लगे ।
यह सुनकर रामचन्द्र ने क्रोध के आवेश में लक्ष्मण से कहा—“हे लक्ष्मण, अब तुम
मेरी शक्ति देखो । उनके धनुष की टंकार विजय-लक्ष्मी के धनुष की टंकार के समान थी ।
उन्होने खडे होकर अपनी दृष्टि आकाश पर केंद्रित की और अत्यंत वेग के साथ वायव्य
बाण चलाया । वह बाण मारीच को द्रुतगति से शत योजन तक उठा ले गया और उस
क्रूर राक्षस को समुद्र में फेंक दिया । वज्र के प्रहार से समुद्र में गिरे हुए मैनाक की तरह
वह असुर समुद्र में गिरा, फिर किसी तरह तट तक पहुँचा । उसने उस सूर्यवंशी (राम)
के उज्ज्वल पराक्रम की प्रशंसा जहाँ-तहाँ की, (अपने) राक्षस-दल को छोड दिया, अपना
शौर्य त्याग दिया, आसुरी वृत्ति को दबा दिया और आसुचन्द्राश्रम-भूमि में सतत तपस्या
में लीन रहने लगा ।
उसके पश्चात् रघुराम ने सुबाहु के हृदय पर अग्नि-बाण चलाकर उसका संहार
कर डाला । एक मानव-शर से अन्य राक्षस-सेना का वध कर दिया । (यह देखकर) देवता
बडे हर्ष से पुष्प-वृष्टि करने लगे । मुनियो ने (राम की) स्तुति की । जिस प्रकार वृत्रासुर का
वध करने पर देवता लोग इन्द्र की प्रशंसा करने के हेतु उनके चारो ओर एकत्र हुए थे,
वैसे ही (आज) राम अपने भुज-बल के प्रताप से यज्ञ के शत्रुओ को दंड देने के कारण
(मुनिजनो के बीच) शोभायमान हो रहे थे ।
विश्वामित्र बडी निष्ठा के साथ यज्ञ की सभी क्रियाओ को समाप्त करके आये
और राम को बडे हर्ष से गले लगाकर उनकी प्रशंसा की और आशीर्वाद देकर बोले—
‘रघुराम, तुम्हारी कृपा से मैं बिना किसी कठिनाई के यज्ञ संपूर्ण करके कृतार्थ हुआ ।’
इस प्रकार, उस पुण्यात्मा विश्वामित्र मुनि का अनुराग प्राप्त करके राम ने वही
रात्रि बिताई और बडे सवेरे, प्रात काल की सभी विधियो से निवृत्त होकर, सब मुनियो
को प्रणाम करके, गाधि-पुत्र से कहा—“हे तपोनिष्ठ, अब हमारे लिए क्या आज्ञा है ?
हम आपके दास हैं और आपकी कृपा के पात्र हैं ।”