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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 508 में से

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पृष्ठ 63

देखकर कहा—'गौरीश के पुत्र कार्तिकेय तुम्हारी सेना का नायकत्व ग्रहण करेंगे।' देवता
बहुत प्रसन्न हुए और कार्तिकेय उनके सेनाधिपति हुए । इससे इन्द्र को उन्नति तथा सुख
प्राप्त हुए ।”
इस प्रकार मुनि के कहने पर रघुराम अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्हें देखकर कहा—
'हे सयमीश्रेष्ठ, इस महानदी (गंगा) के त्रिपथगा होने का क्या कारण है ?'
२६. गंगा नदी का वृत्तान्त
तब कौशिक श्रीराम से उसकी कथा यो कहने लगे—"पुण्यवान् सगर अयोध्या
के विख्यात सम्राट् थे । पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से उन्होंने (एक बार) हिमाचल में भृगु
की तपस्या की । उनकी तपस्या से संतुष्ट होकर भृगु ने उन्हें देखकर कहा—'हे राजन्,
तुम्हारे बहुत-से कीर्त्तिवान् पुत्र होंगे । तुम्हारी एक स्त्री एक वंशोद्धारक पुत्र का जन्म
देगी और दूसरी स्त्री साठ हजार अतिबलशाली पुत्र उत्पन्न करेगी ।' यह वरदान प्राप्त
करके रानियो ने हाथ जोडकर बडे विनय से मुनि को प्रणाम किया और पूछा—'हे मुनीश्वर,
हम (दोनो) में से किसके एक पुत्र होगा और किसके साठ हजार पुत्र उत्पन्न होगे ?'
तब मुनि बोले—'तुम्हारी इच्छा जैसी हो, वैसे ही पुत्रो का जन्म होगा ।' इससे प्रसन्न
होकर बडी रानी ने राजा से (अपने) नाम को सार्थक करनेवाले एक ही पुत्र पाने की
इच्छा प्रकट की । दूसरी रानी ने साठ हजार पुत्रो को प्राप्त करना चाहा । फिर उन्होने
बडे हर्ष से उस मुनिश्रेष्ठ की परिक्रमा की, उन्हें प्रणाम किया और नगर को लौट आये ।
“कुछ दिनो के पश्चात् बडी रानी केशिनी ने असमजस (अश्वमज) नामक एक पुत्र को
जन्म दिया । (दूसरी रानी) सुकृति ने लौकी के आकार का एक गर्भ-पिड उत्पन्न किया,
जिसमें से बडे आश्चर्य से साठ हजार पुत्र उत्पन्न हुए । तब धाइयो ने उन शिशुओ को
घी के पात्रो में रखकर कुछ दिनो तक उनका पालन-पोषण किया । वे क्रमश रूप तथा
यौवन प्राप्त करने लगे । ज्येष्ठ पुत्र बडे दर्प के साथ अपने छोटे भाइयो को बलात् पकड-
पकडकर सरयू नदी में फेंक देता था और (उन्हें डूबते देख) बहुत हर्षित होता था ।
ऐसे दुष्ट असमजस के अंशुमान् नामक एक तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ । असमंजस को अति-
दुष्ट जानकर राजा ने उसे निर्वासित कर दिया और शाश्वत-धर्म-निष्ठा में तत्पर हो अश्व-
मेध-यज्ञ करने का यत्न करने लगे ।”
मुनि के यो कहने पर श्रीराम ने कौशिक से कहा—'हे मुनिनाथ, मुझे अपने पूर्वजो
के चरित सुनने की बडी इच्छा हो रही है । कृपया विस्तार से कहें ।'
तब विश्वामित्र कहने लगे—"हिमाचल और विंध्याचल के मध्य की भूमि में सगर ने
अपना अश्वमेध-यज्ञ प्रारम्भ किया । यज्ञाश्व की रक्षा करने के लिए अंशुमान् नियुक्त
किया गया । उस समय इन्द्र राक्षस का वेश धरकर अश्व को चुरा ले गया और पाताल-
लोक में प्रवेश करके वहाँ तपस्या में लीन कपिल मुनि के निकट यज्ञाश्व को बाँधकर स्वय
स्वर्गलोक को लौट आया । अश्व का पता न लगने से क्रुद्ध होकर राजा (सगर) ने अपने
पुत्रो को सबोधित करके कहा—"अश्व का कही पता नही है । कोई कुटिलात्मा उसे चुरा
ले गया है । अत तुम लोग तुरत जाओ और जिस किसी के पास वह अश्व हो, उसका
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