रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 66, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें३६ रंगनाथ रामायण
पृथ्वी पर ले आओ । उस पवित्र जल से इन भस्म-राशियो को सींचने से ही सगर-पुत्रो
को स्वर्गलोक का सुख प्राप्त होगा । इसलिए तुम पहले इस अश्व को लेकर जाओ ।'
"अंशुमान् अश्व को अपने साथ लेकर गया और अपने दादा को सारी कथा कह
सुनाई । मगर अन्यत दुःखी हुए । उन्होने पुण्य-यज्ञ समाप्त किया और उसके पश्चात्
मन्दाकिनी को पृथ्वी पर लाने के उद्देश्य से तीस हजार वर्ष तक सतत तप करते रहे और
(बिना सिद्धि प्राप्त किये ही) स्वर्ग सिधारे । उस राजा का पोता अंशुमान् भी मन्दाकिनी
को पृथ्वी पर लाने का दृढ सकल्प करके लगातार तीस हजार वर्ष तक तपस्या करने
के बाद स्वर्ग-लोक को प्राप्त हुआ । उसका पुत्र राजा दिलीप भी मन्दाकिनी को पृथ्वी
पर लाने के उद्देश्य से तीस हजार साल तक तपस्या करता रहा और अत में वह भी
रोग-पीडित होकर दिवगत हुआ । उसके पुत्र पुण्यवान् भगीरथ ने अपना राज्य अपने मत्रियो के
हाथो में सौंपकर धर्मात्मा तथा सद्गुण-सपन्न पुत्रो की प्राप्ति तथा पृथ्वी के समस्त
पापो को दूर करने की इच्छा से आकाशगगा को पृथ्वी पर ले आने का दृढ सकल्प कर
लिया । उन्होंने अन्यत भक्ति के साथ गोकर्णाश्रम में दस हजार वर्ष तक अनुपम रीति से
तपस्या की । उनकी तपस्या से सतुष्ट होकर ब्रह्मा ने उन्हें दर्शन देकर कहा कि तुम कोई
वर माँगो ।
"तब भगीरथ ने हाथ जोडकर कहा—'हे भ र्ती-वल्लभ, हे लोक-स्रष्टा, हे सूर्यलोक-
रक्षक, हे सत्यसपन्न, हे विधाता हमारे पूर्वज अपनी उद्दण्डता के कारण कपिल की क्रोधाग्नि
में भस्मीभूत होकर सौ सहस्र वर्षों से परलोक-गति से वचित हो भस्म के रूप में पड़े
हुए है । उस भस्म को मदाकिनी के पवित्र जल मे सीचे बिना उन्हें मुक्ति नही मिल सकती ।'
“इस पर ब्रह्मा ने कहा—'परमशिव के अतिरिक्त अन्य कोई उस गगा को धारण
नहीं कर सकेंगे । इसलिए, तुम निष्ठा के साथ शिव की तपस्या करो कि वे गगा को
धारण करें ।' इतना कहकर ब्रह्मा ने भगीरथ को उनकी इच्छा के अनुसार पुत्र-प्राप्ति का
वर दिया और ब्रह्मलोक को चले गये ।
"उसके पश्चात् भगीरथ ने एक अगूठे पर खडे होकर शिवजी के प्रति घोर तपस्या
की । उनकी तपस्या से संतुष्ट होकर शिवजी ने उन्हें दर्शन देकर कहा- "तुम गगा को ले
जाओ, मैं उसे अपने सिर पर धारण करूँगा ।' तब भगीरथ ने गगा की प्रार्थना की ।
गगा गगन-मडल तथा नक्षत्र-मडल को भेदकर समस्त लोको को अपने गुरु गर्जन से
गुंजाती हुई, सारे जगत् को भयभीत करती हुई, यो प्रवाहित होने लगी, मानो वह कुल-
पर्वतो से युक्त पृथ्वी के साथ महादेव को भी पाताल तक बहा ले जाना चाहती हो ।
शिवजी ने उसका गर्व-भग करने के लिए अपने जटा-जूट को ऐसा बढाया कि गगा उसमें
उलझकर बाहर निकलने में असमर्थ हो गई ।
"तब भगीरथ आश्चर्य करने लगे, उतनी विशाल जल-धारा कहाँ छिप गई होगी !
उन्हें भय होने लगा । इसलिए, वे फिर शिवजी के प्रति उग्र तपस्या करने लगे । भगीरथ
के तप से संतुष्ट होकर (शिव ने) अपने जटा-जूट में बँधी हुई गगा से कहा—'अब तुम
भूलोक में चली जाओ ।'