रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 60, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें'हे अवनीश, उस दिन से वह उत्तम नगर 'कन्याकुब्ज' के नाम से इस पृथ्वी पर
विख्यात हुआ । तब कुशनाभ अपनी पुत्रियों के कमनीय रूप देखकर बहुत प्रसन्न हुए और अपनी
पुत्रियों तथा जामाता को विदा किया । तब कुश ने अपने पुत्र कुशनाभ को संबोधित करके
कहा-'तुम पुत्रकामेष्टि-यज्ञ करो' तो तुम्हें अमित कीर्त्तिमान् तथा पुण्यात्मा गाधि नामक
पुत्र होगा । यो कहकर वे ब्रह्मलोक सिधारे ।"
"कुश के पौत्र रूप में गाधि ने जन्म लिया । हे दशरथात्मज, मैं उसी गाधि का पुत्र हूँ ।
कुश का वंशज होने के कारण मुझे कौशिक भी कहते है । गुणवती तथा धर्म-निष्णाता
मेरी बड़ी बहन सत्यवती, अपने प्राणेश्वर ऋचीक के साथ सशरीर इन्द्रलोक में गई और
इस लोक का कल्याण करने के लिए प्रालेय-पर्वत में स्वयं कौशिकी नाम से नदी के रूप
में बह रही है । सिद्धाश्रम में प्रवेश में करने के कारण सच ही में तप सिद्ध हुआ । प्राचीन
काल से मैं अपना नाम तथा इस देश के निर्माण के संबंध में यह वृत्तांत सुनता आ रहा हूँ ।
अब हे राजन्, अर्द्ध-रात्रि हो गई । तुम बहुत थके हुए हो, अतः विश्राम करो ।"
"सभी वृक्ष स्थिर हो गये है, इस वन-प्रान्त में मृग-समूह का संचार अब नहीं रहा,
विहग अपने घोंसले में पहुँचकर अपनी मीठी बोलियों को भूले हुए पड़े हैं, अब निशाचर,
यक्ष तथा राक्षस अपने इच्छानुसार इस पृथ्वी पर संचरण करेंगे, समस्त दिशाएँ तथा
आकाश कालिख पोते हुए-से अवगम्य दीख रहे हैं, ब्रह्माण्ड-रूपी गृह के लिए नीलांबर
में लगाये हुए मोतियों से युक्त तंबू के समान यह आकाश नक्षत्रों से युक्त होकर शोभा
दे रहा है तथा जन-जन को आनंदित करते हुए नक्षत्र-पति अभी-अभी उदित हो रहा है ।"
उन वचनों से प्रसन्न होकर संयमी मुनियों ने विश्वामित्र से कहा-'हे अनघ, आपका
वंश अमल है । आपके वंशज अतुलनीय माहात्म्यवाले हैं । आप ब्रह्मा के समान हैं । आपका
ब्रह्म-तेज स्तुत्य है ।' तब विश्वामित्र ने उन मुनीश्वरों को धन्यवाद दिये । फिर राजकुमार
तथा मुनिजनों ने उस रात्रि को वहीं शयन किया ।
“प्रात काल होने पर ऋषियों तथा विश्वामित्र ने (राजकुमारों से) कहा-'हे राज-
कुमारो, अब तुम निद्रा तजो ।' वे जग पड़े और प्रातःकाल की क्रियाओ से निवृत्त होकर
कौशिक ने कहा- "यह शोण नदी-रत्न कितना अगाध और सुंदर है ? मछलियों से परि-
पूर्ण, अत्यंत रमणीय सैकत स्थल, मधुर जल तथा परिचित हंस आदि खग-कुल से शोभायमान,
मद-मंद पवन (के कारण ) तरल तरंगों से युक्त यह नदी बड़ी ही रमणीय है ।
हे अनघ, हम कहाँ और किस प्रकार इस नदी को पार करेंगे ?"
तब विश्वामित्र ने कहा-'मुनिलोग प्राय जिस स्थान से होकर इसे पार करते हैं,
उसे जानकर हम भी वहीं से इसे पार करेंगे ।'
इस प्रकार कहते हुए वे सब लोग कुछ दूर आगे चले । (वे ऐसी जगह पहुँचे),
जहाँ कुल हंस, सारस, कारंडव आदि जल-पक्षियों का कलनाद ऐसा मीठा सुनाई पड रहा था,
मानो वे लोगों का स्वागत कर रहे हो । राम ने उस ध्वनि को सुनकर, मध्याह्न
के समय सिद्ध मुनिपुंगवों से सुसेवित, शुद्ध तथा पुण्य जल से पूर्ण, पृथ्वी में श्रेष्ठ नदी के
नाम से विख्यात जाह्नवी को देखा और उसको प्रणाम करके कहा-'हे गाधेय, वह जो