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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 58, कुल 508 में से

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पृष्ठ 58

२८ रंगनाथ रामायण
तब वहाँ के सभी मुनि गाधि-पुत्र को आगे करके इस प्रकार कहने लगे—"हे रवि-
कुल श्रेष्ठ, महाराज जनक बड़े सुंदर ढंग से यज्ञ कर रहे हैं । हम वहाँ चलें । उनके पास
परमशिव का दिव्य धनुष है । गंधर्व तथा राक्षस आदि कई वीर उसे उठाने में असमर्थ
हो चुके हैं । ऐसे धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढानेवाले श्रेष्ठ वीर के साथ ही अपनी
पुत्री का विवाह करने की प्रतिज्ञा राजा जनक कर चुके हैं । इसलिए उस श्रेष्ठ धनुष
को तथा जनक के यज्ञ को देखने आपको अवश्य जाना चाहिए ।”
इस प्रकार विश्वामित्र तथा अन्य मुनियों ने उन वीर, पुण्यात्मा, दाशरथियों को
मिथिलापुरी चलने की प्रेरणा दी । सब लोग बड़े हर्ष से प्रस्थानकर गंगा के उत्तर तट पर
पहुँचे१ और हिमाचल तथा सिद्धाश्रम को दक्षिण में छोड़कर२ उत्तर की ओर बढ़े ।
उस मार्ग से यात्रा करते हुए वे उस दिन तीसरे पहर तक तीन योजन चले । वहाँ शोण
नदी के किनारे वे ठहरे और वहाँ के पुण्य तीर्थ में स्नान आदि क्रिया से निवृत्त हुए
(उसके पश्चात्) उस रम्य स्थल में मुनियों के साथ बड़े आनंद से रहते हुए राम ने कौशिक
से यो कहा—
२५. कौशांबी का वृत्तांत
(श्रीराम ने कहा)—'हे मुनिनाथ, अत्यधिक प्रजा-समृद्ध यह देश किसका है ?
कृपया बतलाइए ।' तब विश्वामित्र ने कहा—"हे राजन्, सुनो, ब्रह्मा के मानस-पुत्र कुश
नामक एक यशस्वी मुनि पूर्व काल में रहते थे । उन्होंने वैदर्भी नामक स्त्री से रूपवान्
तथा शांत प्रकृतिवाले अमूर्त्तरज, वसु, कुशांब और कुशनाभ नामक चार पुत्र प्राप्त किये ।
चारो पुत्र अत्यंत साहस तथा शूरता के साथ अपने क्षत्रिय-धर्म का पालन करने लगे ।
अपने पुत्रो के चरित्र तथा सद्गुण देखकर कुश ने बडे हर्ष से कहा—'इस पृथ्वी पर तुम
लोगो को प्रजा का पालन करना चाहिए । इससे तुम्हारी कीर्ति व्याप्त होगी ।'
“तब कुशल कुशांब ने बहुत प्रसन्न होकर कौशांबी नाम से एक नगर का निर्माण किया ।
हे दशरथात्मज, कुशनाभ ने महोदय नामक नगर बसाया । शूर अमूर्त्तरज ने धर्मा-
रण्य नामक सुंदर नगर का निर्माण किया और वसु ने गिरिव्रज नामक एक अत्यंत दर्शनीय
नगर बसाया । यह प्रदेश, जहाँ हम है, महाराज वसु के राज्य में है ; इस प्रदेश के
चारो दिशाओ में पाँच पर्वत है । उन पर्वतो के मध्य मागधी नामक एक नदी बहती है। इस
सारे मगध देश पर वसु महाराज अत्यंत धर्म की रीति से प्रजा का पालन करते हैं ।
“कुशनाभ ने घृताची नामक एक अप्सरा से प्रेम करके (विवाह किया)। मन्मथ-शर
जैसे नेत्रवाली सौ रूपवती पुत्रियो को प्राप्त किया । एक दिन कमनीय कांति-युक्त तथा
मनोहर यौवन-सपन्न वे युवतियाँ उद्यान में गईं ।
१ गंगा के दक्षिण तट से चले; क्योकि उत्तर तट पर पहुँचकर चलने से शोण
नदी नहीं मिलेगी । —सम्पादक
२. हिमाचल तो 'जनकपुर' से भी उत्तर है, उसे दक्षिण में छोड़कर 'सिद्धाश्रम'
से चलना असंगत है । वाल्मीकिरामायण में लिखा है कि सिद्धाश्रम हिमालय की ओर
उत्तर दिशा में चलने के उद्देश्य से वे चले।—सम्पादक