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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 508 में से

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पृष्ठ 62

३२ रंगनाथ रामायण
भय प्रकट करते हुए उत्तुंग बन गईं। तब उसने क्षुभित चित्त से उस तेज को अपने तट
पर उगनेवाले सरकंडों के वन में प्रतिष्ठित कर दिया। शिव का तेज उस सरकंडे के
वन में प्रतिष्ठित हुआ।
'एक दिन ऋषि-पत्नियां अपने नित्य कृत्यों से निवृत्त होने वहाँ आ पहुँचीं। उन्होंने
स्नान करते समय आपस में विचार किया कि हम ठंड से ठिठुर रही हैं, इसलिए सरकंडों
की उस झाड़ी में त्रेताग्नियों के समान प्रज्वलित होनेवाली उन अग्नियों की हम शरण
लेंगी (उनके पास जाकर अपनी ठंड दूर करेंगी)। इस प्रकार सोचकर वे ऋषि-पत्नियां
उन अग्नियों के पास जा पहुँचीं।
"जो स्त्रियाँ उन अग्नियों के पास गईं और जिन्होंने बड़े उत्साह से उन्हें देखा, वे
सब गर्भवती हो गईं। (इससे) वे अत्यंत भीत हो उठी और पश्चात्ताप करती हुई
घर पहुँचीं। ज्ञानचित्त मुनियों ने अपनी योग-दृष्टि से उस सारे वृत्तान्त को जान लिया
और उन स्त्रियों से कहा- 'यह सब तुम्हारे गर्व तथा सुख की इच्छा का फल है।'
(इसके पश्चात्) वे स्त्रियों पर क्रोधोन्मत्त हो, सारी पृथ्वी को कँपाते हुए-से बोले-'तुम
सब बुद्धिहीन हो, तुम्हें क्षमा नहीं करनी चाहिए। तुम अपने पतियों से पृथक् हो जाओ।'
इस पर वे फिर गंगा नदी के पास गईं और कहने लगी- 'हे माता क्या, यही तुम्हें करना
चाहिए ? क्या (हमारी ऐसी दशा कर देना) तुम्हें शोभा देता है ?'
"इस प्रकार कहती हुईं वे स्त्रियाँ अपने गर्भ पर अपने हाथों से ताड़न करने लगीं।
इस-ताड़न के फल-स्वरूप उनके गर्भ विच्छिन्न हो छह खंडों में पृथ्वी पर गिर गये। वे
(स्त्रियाँ) गिरे हुए उन खंडों को चुनकर उन्हें सरकंडे के वन में रखकर तप करने
चली गईं।
"वह उग्र तेज वहाँ एक जगह एकत्र होकर बढ़ने लगा और वही इस पृथ्वी पर
श्वेताद्रि के नाम से विख्यात हुआ। उस पर्वत पर परम शिव के तेज से कुमार का जन्म
अद्भुत रीति से हुआ। जन्म-स्थान सरकंडों से भरा प्रदेश था, इसलिए वे शरजन्मा
(शरवन्भव) कहलाये। इस पृथ्वी पर जन्म लेने के पश्चात् कृत्तिकाओं ने उन्हें स्तन्य-पान
कराकर पाला-पोसा, इसलिए उनका नाम कार्त्तिकेय पड़ गया। वे माताएँ (कृत्तिकाएँ)
छह थीं। अतएव उन्हें सन्तुष्ट करने के लिए कुमार ने छह मुँह धारण करके स्तन-पान किया,
इसलिए वे षण्मुख (और षाण्मातुर) कहलाये। चन्द्रमौलि के वीर्य-स्कंदन (पतन) से
उनका जन्म हुआ, इसलिए वे स्कंद कहलाये।
"(फिर) यहाँ देवता शिव-पार्वती की स्तुति करने लगे। (पुत्रोत्पत्ति में बाधा डालने
के कारण देवताओं पर) क्रुद्ध होकर लाल-लाल नेत्रों से उन्हें देखती हुई पार्वती ने कहा-
'हे देवताओ, तुम और यह वसुंधरा संतानहीन हो जाओ। आगे से इस पृथ्वी को बहु-
पतित्व प्राप्त होगा।' (यह सुनकर) देवता व्याकुल हुए। इसके पश्चात् शिवजी पार्वती
के साथ तपस्या करने हिमाचल पर चले गये।
"इन्द्र के साथ सभी देवता ब्रह्मा के पास गये और उनसे विनती की- 'हे जलज-
सम्भव, हमें अत्यन्त भुजबली एक सेनापति प्रदान कीजिए।' तब उन्होंने देवताओ को देख-