रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ रंगनाथ रामायण
बड़े आश्चर्य की बात है कि तब वह कामरूपिणी, माया का रूप धारण करके,
कई अस्त्रों की वर्षा करने लगी । तब विश्वामित्र ने कहा—'हे अनघ, संध्या हो रही है
और संध्या के समय राक्षसों को जीतना कठिन है । अब तुम उसपर दया करना छोड़ दो
और लोक-हितार्थ इसे तुरंत मार डालो ।'
तब गाधेय का आदेश मानकर (राघव ने) शब्द-वेधी बाणों से उस मायाविनी की
मायाओं को दूरकर, भयंकर गर्जन करती हुई बिजली के समान आनेवाली राक्षसी को
(उन्होंने) देखा । तब उन्होंने एक महान् अस्त्र उसके कुचाग्र पर ऐसा चलाया कि रक्त
की कई धाराएँ वह निकलीं, मानो रामचंद्र असुरों को दण्ड देने का उपक्रम करते समय
शरों को (रक्त का) उपहार दे रहे हों ।
तब वह (राक्षसी) पृथ्वी पर इस तरह गिरी, मानो प्रलय-मारुत से संध्या का
आकाश टूटकर पृथ्वी पर गिर गया हो । समस्त प्राणी आनंदित हुए । देवता तथा मुनि
हर्षित हुए । कौशिक ने राम को गले से लगाकर आशीर्वाद दिये ।
तब देवता तथा गंधर्वों के नाथ देवेन्द्र वहाँ आया और श्रीराम के दर्शन करके,
उनकी पूजा तथा प्रार्थना की । फिर देव-भक्त गाधेय को देखकर इन्द्र ने कहा—"हमारी
रक्षा करने के लिए इस पृथ्वी पर अवतार लिये हुए इस महापुरुष को आप भृशाश्व की
संतान-रूपी सभी अस्त्र-शस्त्र प्रदान करें ।” इस प्रकार कहकर इन्द्र देव-लोक को लौट गये ।
इतने में सूर्यास्त हो गया । वे लोग वहीं ठहर गये ।
२२. विश्वामित्र का श्रीराम को भृशाश्व-संतान-रूपी शस्त्र देना
दूसरे दिन विश्वामित्र ने राम को बड़े प्रेम से अपने पास बुलाकर कहा—
'हे राम ! तुम्हारा रण-कौशल देखकर हम बहुत प्रसन्न हुए । अब हम तुम्हें ऐसे शस्त्रास्त्र
देंगे, जो अमर, उरग, असुर तथा यक्षों के साथ युद्धों में श्रेष्ठ सिद्ध होंगे ।”
यों कहकर तन और मन से शुद्ध हो, मुनीश्वर ने राम को पूर्वाभिमुख बिठाया,
ध्यान किया और क्रमशः दण्ड-चक्र, धर्म-चक्र, काल-चक्र, विष्णु-चक्र, इन्द्र का वज्र और
खड्ग, वरुण-पाश, धर्म-पाश, काल-पाश, परमशिव का भयंकर शूल, शक्तियुग्म (विष्णु-
शक्ति तथा रुद्र-शक्ति), भयंकर उष्ण तथा अनुष्ण अशनियाँ (शुष्काशनि तथा आर्द्राशनि),
कङ्काल (जिन्हें राक्षस धारण करते हैं), भयंकर करवाल, मूसल, कंकण और क्रौंचबाण
आदि शस्त्र (श्रीराम को) दिये । इसके पश्चात् (उन्होने) बड़ी प्रसन्नता तथा प्रेम से
आग्नेयास्त्र, ब्रह्मास्त्र, तेजःप्रभास्त्र, ऐन्द्रास्त्र, ब्रह्मशिर, प्रस्थापन, नारायण, पैनाक, शिशिर,
दारुण, शौर्य तथा मुदामन् प्रशमन, विलापन, विशठ प्रभाववाला विद्याधर, वायव्य,
सौम्य, संवर्त्त आदि नामक अस्त्र तथा मायाधर, मानव, मदन, मौमन, रुद्र, संतापन, मौसल,
दर्पग, हयधिर आदि अस्त्र, मायाओं का प्रयोग कर विजय दिलानेवाले गंधर्व तथा सम्मोहनास्त्र,
अत्यंत निष्ठा-समन्वित तथा शोणितारव्य अद्वितीय आग्नेयास्त्र, गरुडास्त्र, कौवेरास्त्र,
नर्गमहास्त्र, नागास्त्र, अवार्थ वैष्णवास्त्र, सतत नृत्य वैद्यावरास्त्र, रौद्रास्त्र, राक्षसास्त्र, कल्याण-
प्रद पाशुपतास्त्र, कर्त्तरीचक्र, मेधास्त्र जैसे अगणित अस्त्रसमूह, अखिल दारुण मोदकी,
शिखरी नामक गदाएँ, वामन, पैशाच तथा वायव्य शस्त्र, सोम, सौम्य, संवर्द्धन, साम, मदन,