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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 508 में से

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पृष्ठ 53

इस पृथिवी पर सुकेत नामक एक यक्ष ने पूर्व में ब्रह्मा की तपस्या की थी और
अत्यधिक भक्ति से उनको तृप्त किया और उनसे एक पुत्र माँगा । (तब ब्रह्मा ने कहा)
'मैं तुम्हें पुत्र नही दूंगा । एक हजार हाथियो का बल रखनेवाली एक पुत्री दूंगा ।' उस
वर से उसे एक लडकी प्राप्त हुई । उसने विचार करके अपनी उस लडकी का विवाह
सुद (नामक व्यक्ति) से कर दिया । उसने (सुद ने) उस स्त्री से 'मारीच' तथा 'सुबाहु'
नामक दो भयंकर शक्तिशाली पुत्र उत्पन्न किये । इसके पश्चात् उसकी मृत्यु हो गई । वह
स्त्री अपने पुत्रो के साथ वडे गर्व से अगस्त्य के आश्रम में जाकर वार-वार उनवो तग
करने लगी । अगस्त्य ने इन पापियो को देखकर क्रोध से उन्हें राक्षस वन जाने का शाप
दिया । उस दिन से राक्षस-रूप धारण कर निर्दयी हो वह मनुष्यो का आहार करती हुई
यही रहती है और पृथ्‍वी को दुख देती है । तुम्हारे अतिरिक्त कोई इसे मार नही सकता ।
सिवा तुम्हारे हाथ के किसी से यह नही मरेगी । यह मत कहो कि यह स्त्री है, इसलिए
इसे मारना नही चाहिए । यदि गो-ब्राह्मणो का हित हो, तो यही कारण स्त्रियो को मारने
के लिए राजाओ को पर्याप्त है । प्राचीन काल में सारे ससार का नाश करने के लिए
उद्यत, मतिमान् विरोचन की दुष्टा पुत्री को क्या इन्द्र ने क्रोध से नही मारा था ? क्या
वह कार्य (ससार में) स्तुत्य नही हुआ है ? पहले दृढ़ व्रतवाली भृगु-पत्नी के ससार में
अशान्ति फैलाने का उपक्रम करने पर क्या विष्णु ने (स्वयं) उस स्त्री का वध नही किया था ?
इसलिए हे पुण्य-चरित्र, लोकहित के लिए स्त्रियो का वध करना भी पुण्य ही है ।"

२१. ताड़का का वध

विश्वामित्र के ऐसे अनुपम वाक्यो तथा अपने पिता के आदेश का विचार करके
राघव ने , उस ब्रह्मर्षि के वचन की अवहेलना नही करते हुए कहा कि मैं ताडका को
दण्ड दूंगा । उन्होने (अपने) धनुष की टकार से सारे आकाश को गुंजा दिया । (उसे सुनकर)
ताडका क्रोध से उबल उठी । कर्ण-कठोर धनुष की टकार सुनकर उसका चचल लाल नेत्रो
वाला मुख विकृत हो उठा । वह अपने दोनो हाथो को ऊपर उठाये हुए इस प्रकार आने लगी,
जैसे पखोवाला पहाड वडे वेग से आ रहा हो । प्रकट अट्टहास से उसके वडे-वडे
दष्ट्रो की काति चारो ओर बिखर रही थी । (चलते समय) वह अपने पदाघात से अपनी
अमित शक्ति का परिचय पृथ्‍वी को दे रही थी । सारा आकाश एकदम हिल-सा गया ।
इस प्रकार आनेवाली ताडका को देखकर दाशरथि राम ने सभ्रम-चित्त से अपने भाई से
कहा—'देखा तुमने इसका ढग, इसका रूप और इसकी भयंकर दृष्टि । इसको देखने पर
किसे भय नही होगा ? मैं अवश्य इसका वध करूँगा ।"
इस प्रकार (श्रीराम) कह ही रहे थे कि (अपने) गर्जन से समस्त आकाश को
कँपाती हुई, अपनी पद-धूलि से समस्त (ससार) को ढकती हुई वह भयंकर राक्षसी वडी-
वडी शिलाओ की वर्षा करने लगी । इससे क्रुद्ध हो राघव ने अपने अनुपम अस्त्रो से
उन शिलाओ को काट डाला और उस (राक्षसी) के दोनो हाथ भी काट डाले । तब
लक्ष्मण ने उसकी नाक और कान इस प्रकार काट डाले, मानो वे यह बतलाना चाहते हों
कि आगे में उस असुर-राज की वहन की भी यही दशा कर दूंगा ।