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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 508 में से

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पृष्ठ 59

बालकांड २६
"वहाँ अपने मजीर, मेखला तथा ककणो को मधुर-मधुर मुखरित करती हुई ताल-
गति के साथ लास्य करने लगी । कुछ युवतियाँ मृदु-मधुर रीति से मृदग आदि वाद्यो को
बजाने लगी, कुछ अपने कर-पल्लवो से वीणाओ को क्वणित करने लगी, कुछ अन्य
युवतियाँ आम्र-मजरी के मधु-पान से मस्त कोकिल-कठ से गान करने लगी । इस प्रकार वे
सभी कन्याएँ उस उद्यान में क्रीडाओ में मग्न हो गईं ।
उन सुदरियो को देखकर काम-पीडा से व्याकुल होकर पवनदेव ने उन मानिनियो से कहा—
'हे मानिनियो, आप किञ्चित् मेरी बात पर ध्यान दें । हे पद्माक्षियो, आप मुझे (अपना
पति) वरण करें और अमरत्व को प्राप्त करें । इस तरह आप अजर-अमर होकर
सतत यौवनावस्था में रहती हुई उन्नत कीर्त्ति प्राप्त करेंगी ।'
"तब उन कन्याओ ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया—'हे अनिल, आप सब के हृदयो
में सचार करनेवाले हैं । आप हमें जानते हैं । हाय ! आप अपनी महत्ता का भी विचार
किये बिना क्या कह रहे हैं ? हम उस कुशनाभ की पुत्रियाँ हैं, जो नीति-नय-सपन्न तथा
धर्मानुरक्त हैं । हमारे पिता के रहते हुए हम अपने-आप किसी का वरण कर लें, तो इससे
हमारे कुल को कलक लगेगा । हमारे पिता हमें (विवाह में) जिन्हें देंगे, वे ही हमारे
पति होगे ।'
"यह सुनकर पवन अपने क्रोध को सँभाल नही सका । उसने उनके अगो में प्रवेश
करके उन्हें कुब्जाओ के रूप में परिवर्त्तित कर दिया । खिन्न होकर वे सभी (कन्याएँ)
अपने पिता के सामने गईं और सिर झुकाये आँखो में आँसू भरे खडी रही । कुशनाभ
अपनी पुत्रियो की दशा देखकर सहम गये और पूछने लगे—'हे पुत्रियो, तुम्हें ऐसा रूप
कैसे प्राप्त हुआ ? किसने ऐसा किया ? तुम बोलती क्यो नही हो ? इसका क्या कारण है ?"
"तब उन धवलाक्षियो ने हाथ जोडकर अपने पिता से कहा—'पिताजी, हमें देखकर
पवन ने निर्लज्जता से कहा कि हे सुदरियो, तुम लोग मुझे वरो । हमने उसका प्रस्ताव
स्वीकार नही करके कहा कि आप यह बात हमारे पिता से जाकर कहिए । इसपर उस
क्रूर ने कामाध होकर हमें कुब्जा बना दिया ।"
"यह सुनकर उन्होंने उन कमलाक्षियो से कहा—'हे कन्याओ ! औचित्य और धर्म
का विचार करके (कुल की मर्यादा का उल्लघन करना) अनुचित समभते हुए तुम लोगो ने
उस मर्यादा का पालन किया । तुम्हारे इस गौरवपूर्ण कार्य से मेरे कुल की प्रतिष्ठा बढ
गई है । देवताओ के सबध में क्रोध करने का साहस तुमने नही किया । इस प्रकार
तुम्हारा सहन कर जाना ही उत्तम है । क्षमा (सहनशीलता) ही सत्य है, शील है, तप है,
धर्म है और कीर्त्ति है । वही समस्त लोको की रक्षा करनेवाली है ।"
"इस प्रकार (सात्वना देकर) राजाने अपनी कन्याओ को विदा किया । (उसके
पश्चात्) उन्होने अपने मत्रियो से परामर्श करके पुण्यात्मा चूली नामक मुनिवर के पुत्र
सद्गुण-सपन्न ब्रह्मदत्त को बुलावा भेजा और निर्मल मति से उस महात्मा की धर्म पत्नियो के रूप
में अपनी कन्याओ को दे दिया । चूली-पुत्र के उन्हें स्वीकार करते ही उन कन्याओ की
विकृति दूर हो गई ।"