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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 508 में से

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पृष्ठ 56

२६ रंगनाथ रामायण
२३. कौशिक का श्रीराम को सिद्धाश्रम का वृत्तांत सुनाना ।
"प्राचीन काल में विष्णुदेव बड़े आनंद से तपस्या करने के लिए यहाँ अनेक युगों
तक रहे । इसलिए हे अनघ, इसे वामनाश्रम कहते हैं । उसके पहले यह सिद्धाश्रम नाम से
विख्यात था । हे जननाथ, विरोचन का पुत्र बलि अपने विशाल राज्य-वैभव के कारण
घमंड से प्रबल होकर देव तथा सुरों को यातनाएँ देने लगा । तब मुनि तथा देवता इस
आश्रम में आये और कमलनाभ को प्रणाम करके कहा—'हे शरणागत-प्रिय, हे लोकेश,
हे कमलगर्भ, हमारी रक्षा कीजिए । हमें शरण दीजिए । हमें त्रास देनेवाला बलि यज्ञ कर
रहा है । उस राक्षस-यज्ञ-भूमि में जो कोई भी जो कुछ माँगता है, वह दे रहा है । उस
यज्ञ की समाप्ति के पहले ही आप हमारा हित सिद्ध कीजिए ।'
"उसी समय उज्ज्वल व्रत-निष्ठ कश्यप ने अदिति के साथ एक सहस्र वर्ष का तप
पूरा किया । उसके उपरांत संतुष्ट हो विष्णु ने उन्हें दर्शन दिये । तब (उस दंपति ने)
प्रार्थना की—'हे रवि-शशि-लोचन, आप अपने शरीर में हमें समस्त लोकों के दर्शन
कराइए । हे आद्यन्त-रहित और वेद-वेद्य, हम आपकी शरण में आये हैं ।'
"विष्णु ने कृपा-दृष्टि से कश्यप को देखकर कहा—'आप अपने इच्छानुसार कोई
वर माँग लीजिए, मैं दे दूँगा ।' कश्यप ने बड़ी प्रसन्नता तथा भक्ति से हाथ जोड़कर
कहा—'हे भगवन्, आप अत्यंत तेज-समन्वित होकर मेरे तथा अदिति के पुत्र होकर जन्म
लीजिए तथा सुरों की रक्षा कीजिए । यही मेरी तथा देवताओं की इच्छा है । हम सब
की इच्छा आप पूर्ण कीजिए ।"
"कश्यप के इस प्रकार कहने पर विष्णु ने अपने अनुपम तेज से युक्त हो अदिति
के गर्भ में जन्म लिया । उन्होंने वामन का रूप धारण कर उस दानव (बलि) से तीन
पग धरती माँगी । फिर, दो पगों से पृथ्वी तथा आकाश को नाप लिया और उस धन्यात्मा
(बलि) को बाँधकर इन्द्र को तीनों लोक देते हुए कहा—'तुम इन पर शासन करो !'
इसलिए यह स्थान वामनाश्रम कहलाता है । यही हमारा आश्रम है । इस पुण्यभूमि के
निवासी तपोसिद्ध हैं, अतः यह सिद्धाश्रम भी कहलाता है । तुम्हीं वामन होकर त्रिविक्रम
का अवतार लेनेवाले विष्णु हो । उन दिनों में भी यह तुम्हारा ही वन था । हे राम,
आज भी उसी रीति से यह तुम्हारा ही वन है ।" इस प्रकार, कहते हुए कौशिक अपने
आश्रम में गये और (वहाँ जाकर) राम-लक्ष्मण का सत्कार किया ।
२४. विश्वामित्र का यज्ञ
वहाँ के मुनियों ने बड़े प्रेम के साथ राम की पूजा की । तब राघव ने विश्वामित्र
के देखकर बड़े हर्ष से कहा—'हे मुनीश्वर, आप निश्चित होकर आज ही यज्ञ-दीक्षा
ले लीजिए । यज्ञ के शत्रुओं का संहार मैं अवश्य करूँगा ।'
तब विश्वामित्र अत्यंत हर्षित हुए और मुनियों को बुलाकर स्वयं यज्ञ-दीक्षा ली ।
मुनियों ने यज्ञ की वेदियाँ तैयार कर दीं और यज्ञ के आवश्यक अंगों से यज्ञ-वेदी संपन्न
हो गई । घी की आहुतियाँ पड़ने लगीं और अग्नि की ज्वालाएँ आकाश तक फैलने लगीं ।
हवन की अग्नि के प्रज्ज्वलित होने के साथ-ही-साथ साम आदि वेदों के आनन्द-घोष, निरंतर