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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 508 में से

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पृष्ठ 55

बालकाण्ड २५

संतापन, तामस, जैसे दारुण अस्त्र, ककोल, करवाल, मूसल आदि धारण-योग्य अस्त्र राम
को दिये । उन्हें लेते हुए राम ने उस महात्मा को देखकर कहा "हे मुनिनाथ, आपकी
कृपा से अभी अस्त्र प्राप्त करके मैं कृतार्थ हुआ । अब आप मुझे उपसंहार के अस्त्र प्रदान
कीजिए ।"
इस पर प्रसन्न हो उस मुनि ने उन्हें सत्यवत, रभस, पराङ्मुख, सत्य-कीर्त्ति, दशाक्ष,
अवाङ्मुख, प्रतिहारतर, मारण, शुचि, शतवक्त्र, दैत्य, धृष्ट, लक्ष्य, कृशन, करवीरक, दश-
शीर्ष, शतोदर, ज्योतिष, विमल, मकर, विरुचि, निष्कुलि, प्रमथन, सुनाम, सर्वनाम, दुदुनाभ,
पद्मनाभ, तृणनाभ, नैराश्य, का रूप, योगधर, सैमन, निद्रा, सधान, मोहन, विषमाक्ष, महानाभ,
बाहुविभूति, जृम्भक, धन, धान्य, वृत्तवत, रुचिर, सार्चिमाली, धृतिमाली नामक कामरूपवाले
महान् अस्त्रो का उपदेश राजकुमार को दिया । इनके अतिरिक्त भी (मुनि ने) उस रघु-
वश प्रभु को अनेक शस्त्रास्त्र-समूह दिये, उनकी शक्ति बताई, उनसे सबध रखनेवाले मत्र
बताये, उनके प्रयोग की तथा उपसहार की विधि बताई । शस्त्रास्त्र-सबंधी सभी
मर्म बताये ।
तब राम के आगे वे सभी ( शस्त्रास्त्र ) तरह-तरह के रूप धारण करके
प्रकट हुए । उनमें कुछ अग्नि-सदृश थे, कुछ भयकर थे, कुछ धूमिल कांति के थे, कुछ
अनुपम दीप्तिमान् थे, कुछ दिव्य शरीरवाले थे, कुछ चंद्र-प्रभा-विलसित थे, कुछ भानु-
दीप्ति-विलसित थे, कुछ अधकार-विलसित थे, कुछ भयकर अट्टहास कर रहे थे और
कुछ पवित्र रूप धारण किये हुए थे । उन सब ने मुकुलित करो से (राम के आगे) खडे
होकर कहा—'हे राजन्, हम कौन-सा कार्य करें, हमें क्या आदेश देते हैं ? हमें कहाँ
भेजेंगे ?' तब राम ने कहा—'मेरे स्मरण करने पर तुम चले आना, अभी तुम जा
सकते हो ।' यह सुनकर सभी शस्त्रो ने उस वसुवेश की प्रदक्षिणा की और नमस्कार
करके चले गये ।
तब राघव ने मुनिनाथ के सामने हाथ जोडकर विनय, भक्ति तथा विश्वास प्रकट
करते हुए कहा—'हे अनघ, आपकी कृपा से में कृतार्थ हुआ ।'
उसके पश्चात् वे विश्वामित्र के पीछे-पीछे चलने लगे । चलते-चलते उन्हें वामनाश्रम
का सुदर प्रदेश दिखाई पडा । उसे देखकर काकुत्स्थवंशी राम ने कहा—"हे सयमीद्र, इस
पर्वत के निकट, नाना मृगो की ध्वनियो, सुदर पक्षियो तथा मृगो से भरा यह दर्शनीय तथा
सुदर वन किसका आश्रम है ? यहाँ सब मृग बडे सुख से रह रहे हैं । हे सर्वज्ञ, आपकी
यज्ञ-भूमि यहाँ से कितनी दूर है ? चचल तथा उद्धत राक्षस आपके यज्ञ को अपवित्र करने
के लिए कहाँ से आते हैं ? में अपने तेज बाणो से उन समस्त राक्षसो को मार डालूँगा
और यज्ञ की रक्षा करूँगा ।"
तब कौशिक ने जगदभिराम राम के कपोल स्नेह से छूकर बडे प्रेम से कहा—
'हे अनघ, क्या कोई ऐसा विषय है, जिसे तुम नही जानते ? यदि मुझसे ही सुनने की
इच्छा है, तो सुनो ।'
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