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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

असंख्येय, नवाभरण, श्रेष्ठ वस्त्र, स्वर्ग और रत्नो से युक्त राज्य तुम्हें भेंट दूँ, तो भी
वह तुम्हारे वीरतापूर्ण कार्यों के लिए अल्प ही होगे । हे पवनपुत्र, तुम्हारे कार्य से मैं
अपने मन में बहुत संतुष्ट हूँ ।'
सीता की बातें सुनकर हनुमान् अत्यत हर्ष से कहने लगा--'हे माता ! आप मुझपर
इतनी करुणा-पूर्ण दृष्टि रखती है और मेरा इतना आदर करती है, यही मेरे लिए पर्याप्त है ।
सच तो यह है कि (आपका आदर प्राप्त करना ) इन्द्र-पद या किमी दूसरी वस्तु
से भी महान् है । तब भूमिसुता ने हनुमान् को देखकर कहा--'हे अनघ ! तुम्हें बल,
शौर्य, पराक्रम, अपार तेज, क्षमा, ज्ञान, उदारता, स्थैर्य, सतत निश्चल स्वामिभक्ति, विनय
आदि विश्रुत गुण प्राप्त हो ।' इसके पश्चात् हनुमान् ने उस देवी के निकट रहनेवाली
भयंकर आकारवाली राक्षसियो को देखकर कहा--'उस पापात्मा की आज्ञा का पालन करती
हुईं ये पापी स्त्रियाँ कदाचित् आपको हानि पहुँचायेंगी । मैं अभी इन्हें अपनी कठोर मुष्टि-
प्रहार से मार डालता हूँ ।' तब जानकी ने हनुमान् को देखकर कहा--'बाण चलानेवाले के
रहते हुए भला बाण को दोषी ठहराना क्या उचित है ? दासियो का वध करना कदापि
उचित नही । मैंने अपने पापो के फलस्वरूप यह सब विपत्ति पाई । इसके लिए ये कैसे
दोषी हो सकती है ? हे पुण्यचरित, महान् व्यक्ति पापियो पर भी दया दिखाते है ।
अत हे वानरोत्तम, इन राक्षसियो का मारना तुम्हारे लिए उचित नही है ।' तब हनुमान् ने
कहा--'हे देवी ! आप निर्मल गुण-रत्नो की निधि है । आप राम की धर्म-पत्नी बनने के
योग्य है । अब मुझे राम की सेवा में जाने की आज्ञा दीजिए ।' तब उस देवी ने कहा--
'हे वानरोत्तम, अबतक उन्ही को मैं अपनी आत्मा मानकर अपने प्राण रोके हुई हूँ ।
अब मैं उन्हें देखे बिना एक क्षण भी नही जी सकती । यह बात मेरे प्रभु को बतलाना ।
अब तुम जाओ ।' इस प्रकार कहने के पश्चात् उन्होने हनुमान् को आशीर्वाद दिया ।
हनुमान् ने बडी भक्ति से उन्हें प्रणाम किया और राम भूपाल के निकट पहुँचकर अत्यत
विनय से निवेदन किया कि हे देव, मैने आपकी विजय तथा कुशल का वृत्तांत देवी सीता
से निवेदन किया, तो वे बहुत हर्षित हुई । उन्होने मुझसे कहा कि तुम मेरी ओर से प्रभु
से निवेदन करना कि मैं उनके दर्शनो की अभिलाषिणी हूँ ।
१५४. राम के आदेश से विभीषण का सीता को लिवा लाना
तब राम ने थोडी देर तक मन-ही-मन सोचा और विभीषण को बुलाकर कहा--
'हे विभीषण ! तुम शीघ्र जानकी के मगल-स्नान का प्रबन्ध करो और दिव्य वस्त्राभरण
एव पुष्प-मालाओ से अलकृत कराके उन्हें यहाँ लिवा लाओ ।' तब उसने बडे हर्ष से
जाकर सरमा आदि अपने अन्त पुर की स्त्रियो से सारी बातें समझाकर जानकी को लिवा
लाने का आदेश दिया । वे भी बडी प्रीति से सीता के पास गई और उन्हें बडी भक्ति
के साथ प्रणाम करके कहा--'हे देवी, आपके पति राम देव ने विभीषण को, आपको
लिवा लाने की आज्ञा दी है । इस हेतु उन्होने हमें आपकी सेवा में भेजा है । आप प्रसन्न
होकर अभीष्ट मगलदाता राम के समक्ष पधारें । हे सुन्दरी, आप यह वेश तज दीजिए ।
आप तो शुभ-प्रदायिनी हैं ।' इस प्रकार कहने के पश्चात् उन्होने उनका मंगल-स्नान कराया,

४५६ रंगनाथ रामायण
उनकी तनुलता को पोंछकर दिव्य वस्त्रों से उन्हें सजाया, दिव्य मालाएँ और दिव्य आभूषणों
से उन्हें अलंकृत किया और उसके पश्चात् स्वर्ण-पालकी में बिठाकर उन्हें ले चलीं । तब
राक्षसेश्वर विभीषण बड़ी भक्ति के साथ राजचिह्न तथा वेत्र धारण करके अपने-आपको धन्य
मानते हुए, एक सेवक के समान प्रमुख राक्षसों के साथ पालकी के आगे-आगे चलने लगा । राम के
निवास से थोड़ी दूर पर पालकी को रोककर विभीषण राम की सेवा में उपस्थित हुआ और
हाथ जोड़कर नम्रता से बोला--'देव, लिवा लाया हूँ, देवी को ! देवी यहाँ पधारी हुई हैं ।'
तब राम ने अत्यन्त हर्ष, रोष एवं दैन्य से अभिभूत हो, मन में विचार कर
विभीषण से कहा--'लिवा लाओ ।' तब परम पावन तथा ज्ञानी विभीषण पावन-चरिता सीता को
बड़ी श्रद्धा से लिवा ले चला । उस समय राक्षसों एवं वानरों की भीड़ (सीता के दर्शनों
की तीव्र उत्कण्ठा से) उमड़-उमड़कर मार्ग को रोकने लगी । तब विभीषण निर्दय होकर अपने
हाथ की बेंत से उनपर कसकर प्रहार करने लगा । इस कारण से भीड़ में उठनेवाले आर्त्त-
नाद को सुनकर राम ने विभीषण से कहा--'हे विभीषण ! ऐसा भयंकर कार्य क्या तुम्हारे
लिए उचित है ? अब इनमें से हमारे लिए पराया कौन है ? अपनों को इस प्रकार दुःख
क्यों पहुँचाते हो ? उन्हें रोको मत । सभी लोग आकर देखें । इसमें बुरा क्या है ? (स्त्री
के लिए) कालान्तर एवं देशान्तर में नष्ट न होनेवाला एक शील ही गोपन की वस्तु है ।
ये विशाल दुर्ग, भवन, पर्दे आदि कभी स्त्रियों के लिए उचित आवरण नहीं हो सकते ।
व्यसनों में, विवाहों में, युद्धों में, मित्रों में और उत्सवों में स्त्रियों के लिए आवरण अनावश्यक है ।
मैं यहाँ हूँ और यह रण-भूमि है । अतः, इसमें कोई दोष नहीं है; उन्हें आने दो ।'
तब राम के आदेशानुसार विभीषण सीता को लिवा लाया । उस समय कल्याणी
सीता का शरीर स्वेद-बिन्दुओं से ऐसे आप्लावित हो रहा था, मानो उनके हृदय में उमड़ता
हुआ आनन्द (हृदय से) छलककर सारे शरीर में व्याप्त हो गया हो । उन्होंने राका-शशि
रामचन्द्र के दर्शनामृत का पान करके चिरविरहाग्नि को शान्त किया और परम-अनुराग से
भरी हुई अपने मन की उत्कंठ इच्छा से प्रेरित हो राघव को देखने लगीं । राघव को
देखते ही उनके धवल-लोचन-उत्पलों से अश्रु-प्रवाह उमड़ आया । वे भय, प्रीति एवं व्रीड़ा
से अभिभूत होकर सिर झुकाये खड़ी रहीं ।
तब रघुराम का मन क्रोधावेश से भर गया । उन्होंने उस रमणी को देखकर
कहा--'हे नारी, पुण्यशीला स्त्रियों के लिए लज्जा ही प्राण है । हे लज्जावती, प्रतिष्ठा
की रक्षा का विचार करके मैंने तुम्हें मुक्त किया है । इसके सिवा मेरे हृदय में तुम्हारे
प्रति कोई आसक्ति शेष नहीं है । काकुत्स्थ-वंशज धैर्य के धनी होते हैं, लोक-रक्षण-तत्पर होते हैं,
तथा लोक-प्रशंसा के योग्य होते हैं । उनके वंश में जन्म लेकर (यदि मैं तुम्हें ग्रहण
करूँ, तो) लोग कहेंगे कि मैंने अपने औचित्य को त्याग दिया । शत्रु के घर में रही हुई
तुम्हारा स्पर्श करके तुम्हें अपनाना धर्म-संगत नहीं हो सकता । इस भय से कि लोग यह
न कह बैठें कि यह अपनी पत्नी को खो बैठा और उसे छुड़ाकर नहीं ला सका, मैंने
तुम्हें छुड़ाया है । इसके सिवा तुम्हें लाने का मेरा कोई दूसरा उद्देश्य नहीं है । मैं तुम्हें
स्वीकार नहीं कर सकता । तुम जहाँ चाहो, जा सकती हो ।'

राम के इन निष्ठुर वचन-बाणों के लगने से सीता तिलमिला उठी । वह कमलाक्षी
सद्य प्राप्त आनन्द को भूल गई और अवाक् एवं स्तम्भित-सी रह गई । क्षोभ, दुःख एवं
क्रोध से अभिभूत हो, वे रामचन्द्र को देखकर गद्गद कंठ से कहने लगी—'हे देव, क्या आप
मेरा हृदय नहीं जानते ? क्या, आप सर्वज्ञ एवं मनीषी नहीं हैं ? बाल्यावस्था में आप मुझे
ले आये और तब से मेरा पालन-पोषण तथा रक्षण करते रहे । आप ऐसे कठोर वचनों से
मुझे क्यों दुःखी बना रहे हैं ? मैं कहाँ, आप कहाँ और आपके ये वचन कैसे ? मैंने भू-
माता के गर्भ से जन्म लिया, उसके पश्चात् महाराज जनक ने मुझे पाल-पोसकर बड़ा
किया, फिर आप-जैसे नृप-शिरोमणि की पत्नी हुई । क्या, चंचल चित्तवाली स्त्रियों का-सा
व्यवहार मेरे लिए कभी सह्य हो सकता है ? पुरुष, अविश्वसनीय स्त्रियों के प्रति जैसे वचन
कहते हैं, वैसे वचन आप मेरे प्रति कह रहे हैं । क्या, यह आपके लिए उचित है ? यदि
आपको मुझपर विश्वास नहीं था, तो जिस दिन मेरा पता जानने के लिए हनुमान् को भेजा था,
उसी दिन कहला भेजते, तो उसी दिन मैं अपनी सभी आशाओं को तजकर प्राण
त्याग देती ।'
इसके पश्चात् सीता ने लक्ष्मण को देखकर कहा—'हे अनघ, तुम्हारे अग्रज मुझपर
संदेह करके मेरे प्रति परुष वचन कह रहे हैं । क्या मेरे प्रति ऐसा व्यवहार उचित है ?
क्या, ऐसी बातें वे मुझे कह सकते हैं ? क्या, तुम्हें उनसे यह कहना नहीं चाहिए कि ऐसे
वचन कहना उचित नहीं है ? मेरा आचरण देखते हुए, क्या, तुम मुझमें किसी पाप का
अनुमान कर सकते हो ?'

१५६. सीता का अग्नि-प्रवेश

वे आगे कहने लगीं—'अब शंका मत करो । तुम भली भाँति विचार करो और
यदि तुम लोगों का यही निश्चय है, तो यहाँ चिता सजाओ । मैं सबके समक्ष, बिना
विचलित हुए अग्नि में प्रवेश करूँगी । अग्नि के द्वारा मैं अपनी पवित्रता का प्रमाण दूँगी
और ब्रह्मादि देवताओं की प्रशंसा प्राप्त करते हुए भूमि में प्रवेश कर जाऊँगी ।'
तब लक्ष्मण ने बड़ी व्याकुलता से अपने अग्रज की ओर देखा और उनके मन के
भावों को समझकर सीता के लिए चिता का प्रबन्ध किया । तब सीता ने बड़ी भक्ति से
चिता की परिक्रमा की और उसकी स्तुति करके, उसे प्रणाम किया । फिर, अग्निदेव के
समक्ष खड़े होकर हाथ जोड़े हुए वे कहने लगी—'हे धर्मादि देवताओ, हे धर्मों, हे निर्मला-
त्माओ, हे नियतात्माओ, हे जगत् के अधिष्ठाताओ, हे सूर्य-चन्द्र, हे वेदसाधको, हे वेदों,
हे महात्माओ, हे सर्वज्ञो, हे पञ्चभूतो, हे परहितात्माओ, हे श्रेष्ठ नरो, हे श्रेष्ठ किन्नरो,
हे सुरवरो, हे भूसुरवरो, हे कृपालुओ, हे दिक्पालो, हे सन्मतियो, हे पापसंहारको, मैंने
मन-वचन-कर्म से राजा राम के सिवा और किसी का स्मरण नहीं किया है । यदि मैंने
ऐसा किया हो, तो मैं इस अग्नि का सहन नहीं कर सकूँगी और सब के समक्ष इसी अग्नि
में भस्म हो जाऊँगी ।' यों कहती हुई सीता ने आकाश तक व्याप्त होनेवाली अनुपम
आकार की भयंकर ज्वालाओं से युक्त प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश किया । अग्नि-कुण्ड में
अविचल खड़ी रहनेवाली सीता किंचित् भी नहीं जली । कर-चरण-आनन-रूपी कमल, वय-

४५६ रंगनाथ रामायण
वाक-रूपी कुच-द्वय, बाहुलताएँ-रूपी मृणाल, विमल त्रिवली-रूपी तरंगें, विशाल एवं चंचल
नेत्र-रूपी मत्स्य, सहज नील चिकुर-रूपी शैवाल से युक्त सरोवर की भाँति सुशोभित उस
कमलाक्षी को देखकर वानर एवं राक्षस शोक करने लगे । सुर, सिद्ध एवं साध्य स्तुति करने लगे ।
पवन-पुत्र, सूर्य-पुत्र, सौमित्र, विभीषण, अंगद, वानर-सेना, दानव-वीर, साथ ही सरमा
आदि राक्षस-वधुएँ अत्यधिक गोक से सतप्त हो उठी । राम निर्वेद से अभिभूत हो
स्थिर रहे ।
तब शिव, ब्रह्मा, अखिल दिक्पाल, गरुड़-गंधर्व एवं खेचर-श्रेष्ठ विमान पर आरूढ़
हो वहाँ आ पहुँचे । राम उन्हें देखकर उनके स्वागतार्थ खड़े हुए । राम को देखकर उन्होंने
कहा—"हे देव ! आप वेदान्त के द्वारा ज्ञेय हैं, (अखिल ससार के) साक्षी हैं, कर्त्ता हैं, ज्ञान-स्वरूप हैं,
मुक्त हैं, नित्यपूर्ण हैं, सर्वज्ञ हैं, जगदेकनिधि हैं, अक्षीण पुण्यात्मा हैं, अव्यक्त हैं, अक्षर
त्रिमूर्ति हैं और आद्यत-पति हैं । भुवन, समुद्र, भूत, नदियाँ, यज्ञ, पर्वत, जन्तु-समूह, वृक्ष,
मार्ग, तन्त्र, विधियाँ, सुर, नक्षत्र, वेद, गास्त्र आदि सहस्रों, लाखों, करोड़ों तथा अरबों
की सख्या में एक-एक ब्रह्माण्ड में पाये जाते हैं, उनकी गणना कोई भी नहीं कर सकता ।
ऐसे असंख्य ब्रह्माण्ड आपके उदर में रहते हैं । उनकी गणना ही नहीं हो सकती । आपके
स्वरूप का पार पाना किसके लिए संभव है ? आपकी माया का प्रभाव जानना आपके
मिवा दूसरों के लिए कहाँ संभव है ? 'आपने अमुक का संहार किया, आपने अमुक को
जीता, अमुक ने आपको जीता, अमुक आपके अवीन हैं, अमुक आपसे श्रेष्ठ हैं'—ऐसी
निन्दा एवं स्तुति आपका स्पर्श भी नहीं कर सकती । दास-भाव को छोड़कर अन्य किसी
भी मार्ग से आपके ज्ञान-रूप का दर्गन दुर्लभ हैं । हे राजन्, आप आदिनारायण हैं और
जानकी आदिलक्ष्मी हैं । लोक-रक्षणार्थ आप काकुत्स्थ के रूप में विख्यात हुए हैं । आप
स्वयं अपने को क्यों भूल गये हैं ? निष्ठुर वह्नि में स्थित जानकी को देखते हुए चुप रहना
आपके लिए उचितं नहीं है । आप उन्हें अपनाइए, प्रीति से आदर कीजिए । उस वनजाक्षी
की उपेक्षा मत कीजिए ।"
१५७. सीता-परिग्रहण
देवताओ ने जब रामचन्द्र को कई रीतियो से समझाया, तब दैत्य तथा कपि परस्पर
कहने लगे—'इस साध्वी के शरीर से न श्रम-बिन्दु निकल रहे हैं, न इनका मुख कुम्हला
रहा है, न इनकी तनुलता सूख रही है, न ये व्याकुल हो रही हैं, न इनकी धारण की हुई
पुष्प-मालाएँ मुरझाई हैं और न इनका अंगराग ही छूटा है ।' वे सीता को देखकर शोक-
सतप्त होते हुए गद्गद कठ से कहने लगे—'रामचन्द्र को ऐसी पवित्र पत्नी के प्रति ऐसे
निष्ठुर वचन नहीं कहना चाहिए । ऐसा साहस उचित नहीं हैं । उनके इस प्रकार कहते
समय अग्निदेव कोमलांगी सीता को अपनी गोद में उठाकर बाहर निकले और उन्हें बड़ी
प्रीति से राम के सामने खड़ा करके कहा—'यह कल्याणी मुग्धा है । तुम्हीं इसके देवता हो,
तुम्हीं इसके प्राण हो, तुम्हीं इसके बन्धु हो और तुम्हीं इसके मर्वस्व हो । तुम्हारे सिवा
और किमी को इसके हृदय में स्थान नहीं है । रावण की आज्ञा से कई राक्षस-स्त्रियों ने
कई प्रकार से इसे पीड़ित किया, भयंकर कृत्यों से इसे डराया, धमकाया और छल किया ।

: that is 100% the glyph म!
Why would the typesetter use म?
Because in Devanagari composing cases, स and म are often near each other, or a novice compositor confused them.
Wait, let's check:
L3: तुम्हारे विश्वाम पर -> विश्वाम
L13: इस मसार में और कौन हो मकता है -> मसार, मकता
L19: ऐमे -> ऐमे लोक-कल्याण
L22: उम पर आक्रमण -> उम
L24: इस समार में कौन हो मकता हैं -> समार, मकता
L27: आप उम सत्यनिधि -> उम
L32: तुम जेमे -> जेमे
Wait, what about विया in L33? Look at नहीं विया: yes, it's विया!
And line 36: अधिकार वहाँ ? -> look at the last line:
पुत्र-शोक में मैंने मृत्यु को प्राप्त किया । ऐसे मुझे इन्द्र-लोक में प्रवेश करने का अधिकार वहाँ ? -> wait, अधिकार वहाँ ? or कहाँ ?!
Look at वहाँ: the first letter is व!
Wait, why व instead of क?

४६० रंगनाथ रामायण
वह दु ख सतत प्रज्वलित अग्नि के समान मेरे हृदय में जलता रहता है । अमर
लोक में भी जो अग्नि शमित नही हुई, वही आज तुम्हारे समक्ष उपशमित (शान्त)
हो गई । हे कमलाप्त-सम-तेजस्वी, हे कमलाभिराम, हे कमलाप्तवंशज, तुम अयोध्या को लौट
जाओ और निखिल धर्मों का पालन करते हुए साम्राज्य को ग्रहण करके अक्षय कीर्त्ति के
साथ चिर काल तक इस पृथ्वी का ऐसा पालन करो कि प्रजा कहे कि राम लोकाभिराम हैं।
उसके पश्चात् उन्होने लक्ष्मण को देखकर कहा—'हे सौमित्र, तुमने राम के साथ
अरण्य में घूमते हुए अनेक उत्तम एव साहसपूर्ण कार्य करके पुण्य प्राप्त किया है । भविष्य
में भी सावधानी के साथ, अपने 'अग्रज के मन को दुखी बनाये विना आचरण करते रहना।'
तदनन्तर उन्होने अपना सिर झुकाकर प्रणाम करके खडी हुई सीता को देखकर कहा—'हे
पुत्री, परम पवित्र पातिव्रत्य धर्म में तुम्हारी समता कोई स्त्री नही कर सकती । तुम उत्तम
साध्वी हो । राम ने तुम्हें जो निष्ठुर वचन कहे, उनके लिए तुम रुष्ट और दुःखी मत
होना । तुम राघव के समान महान् कीर्त्तिवान् पुत्रो को प्राप्त करो, पुण्य प्राप्त करते हुए
जीवन व्यतीत करो ।' इस प्रकार, तीनो को आशीर्वाद देकर महाराज दशरथ मन-ही-मन
सतुष्ट हुए ।
१५९. देवताओं का अभिनन्दन
तब चन्द्र-सम शीतल प्रभु राम को देखकर इन्द्र आदि देवताओ ने कहा—'हे पुण्यात्मा,
आपने हमारे निमित्त मनुष्य के रूप में जन्म लिया, राक्षसो का सहार किया, अनेक
प्रकार के दुखो का सहन किया और भूमि का भार उतारकर हमारी रक्षा की, हमें जीवन-
दान दिया और हमें शान्ति प्रदान करके भेज रहे है । हम आपको वर देंगे। आप अपना
अभीष्ट कहें ।'
तब राम ने देवताओ को देखकर मदहास करते हुए कहा—'आपकी कृपा से इस
ससार में मेरे सभी कार्य सम्पन्न हो गये । कितने ही वानर, अपना-अपना देश, घर-द्वार,
बन्धुजन, पुत्र तथा मित्रो को छोडकर, बडे साहस के साथ, अपने प्राणो की भी परवाह
किये विना मेरे लिए शत्रुओ के साथ युद्ध करके प्राण खो बैठे हैं । ये कपि-वीर
उन्नतात्मा है । उन्हें जीवन प्रदान कीजिए।' तब देवताओ ने कहा—'ऐसा ही हो । ये वानर प्राण
प्राप्त करेंगे।' इतना कहकर महादेव, ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवता तथा दिक्पाल, मुनि, सुर सभी राम की
प्रशसा करते हुए स्वर्गलोक को चले गये । उसके पश्चात् दशरथ भी स्वर्ग को चले गये ।
देवताओ के वर के प्रताप से युद्धभूमि में कटकर गिरे हुए सभी वानर जीवन
प्राप्त करके ऐसे उठे, मानो वे नीद से जाग रहे हो । फिर, राम को देखकर बडे हर्ष से
उन्होने प्रणाम किया । तब राम वडी दया से उन सब को निहारकर बहुत प्रसन्न हुए ।
तब विभीषण ने राम को देखकर बडी भक्ति के साथ कहा—'हे देव, हे राघव-
राज, आपके लका में पधारकर अभिषेक स्वीकार करने का यही उचित समय है ।' तब
राघव ने कहा—'जटाओ का भार धारण किये हुए तथा वल्कल पहने भरत के (अयोध्या
में) तप में निरत रहते समय, उसको बिना देखे हमारा यहाँ सुख-भोग में तत्पर रहना
अनुचित है ।'

युद्धकांड ४६१
तब विचारवान् विभीषण ने बडी भक्ति से पुण्यात्मा स्त्रियो तथा पुरुषो को, पुण्य
वाद्यों के साथ भेजकर चन्दन एव अक्षत-भरे स्वर्णपात्र, रत्नाभरण एव कनकावर मँगाये
और अत्यन्त विनय के साथ उन्हें राम-लक्ष्मण तथा सीता को धारण करने के निमित्त
दिया । तब आकाश से देव-दु दुभियाँ वज उठी, देवता स्तुति करने लगे और अप्सराएँ पुष्प-
वृष्टि करने लगी । तब राम ने निश्चल आनन्द में भरे हुए प्रीति के साथ कहा--'हे
विभीषण हमें और भी कितने ही महान् कार्य करना शेष हैं । हम अब यहाँ विलम्ब नहीं
कर सकते । हमें शीघ्र अयोध्या पहुँचना चाहिए ।'
१६०. पुष्पक-आरोहण
तब विभीषण ने राम को देखकर भक्ति से कहा--'हे देव, पूर्वकाल में रावण ने
क्रुद्ध होकर कुवेर के साथ भयकर युद्ध किया था और युद्ध में उसे पराजित करके उसका
विमान छीन लिया था, वह विमान तैयार है । इन्द्रलोक के पुष्पक विमान की भाँति यह
भी अद्भुत वेग से जा सकता है, अत आप उस पुष्पक में आरूढ हो, हर्ष के साथ अयोध्या
लौटें । यही अच्छा होगा ।'
इस पर राम ने (उसे लाने की) अनुमति दी । तब राक्षसराज अत्यधिक सभ्रम
एव प्रीति से समस्त वैभवो से विलसित उस पुष्पक को ले आया । वह पुष्पक अचल
नवरत्न-दीपो तथा मन्द पवन से युक्त था । वे दीप ऐसे दीखते थे, मानो समस्त लोको को
जला देने की शक्ति रखनेवाले रावण की शक्ति की कल्पना करके अनिल दीपो को हिलाने
से डरता हो और दीप भी हिलने से डरते हो । उसके विमल द्वारो पर हरित-नील मणियां
ऐसी भासमान हो रही थी, मानो विमान के भीतर सजे हुए पुष्पो का रसपान करने के
लिए आये हुए भ्रमर भय के कारण भीतर प्रवेश नही कर रहे हो । उन नील-मणियो के
निकट ही जडी हुई मुक्ता-मणियाँ ऐसी दीख रही थी, मानो पुष्प-वाटिका में मुग्धावस्था
में रहनेवाली मल्लिका की कलियो को मुग्ध करके उन्हें छोडकर भ्रमर यहां चले आये हैं
और उनके विरह से मल्लिका की कलियाँ यहाँ आकर भ्रमरो के साथ रहने लगी हो ।
हसो तथा कमलो के चित्र काढे हुए दुकूलो से रचित उसका वितान ऐसा दीख रहा था,
मानो त्रिभुवन में भ्रमण करने के पश्चात् यहाँ आकर गगा अलसाई हुई लेटी हो । उसके
उज्ज्वल स्तम्भो में खचित मणिमय मूर्त्तियाँ ऐसी दीखती थी, मानो देव-कन्याएँ, यह विचार
करती हुई कि राम यहाँ कब (इस पुष्पक विमान में) पधारेंगे, हम उन्हें कब देखेंगे, स्तम्भो
पर अपनी तनु-लताओ को टेके हुए प्रतीक्षा कर रही हो । वह विमान ऐसा सुन्दर दीख
रहा था, मानो समस्त सृष्टि के रक्षणार्थ जब विष्णु राम के रूप में पृथ्वी पर आये, तब
वैकुण्ठ ही पुष्पक के रूप में यहाँ आ गया हो । ऐसे पुष्पक विमान को देखकर काकुत्स्थ-
वशज बडे प्रेम से विभीषण को देखकर और वानरो को लक्ष्य करके कहने लगे--'हे
विभीषण, ये (वानर) ही रावण-रूपी भयकर अग्नि को बुझानेवाले महान् मेघ-पुज हैं ।
अत इनका आदर-सत्कार करो तथा विपुल धन-सपत्ति से इन्हें पुरस्कृत करो ।' तब
विभीषण ने बडी प्रीति से धन, वस्त्र, योग्य आभूषण तथा स्वर्ण आदि मँगाकर राम के समक्ष
ही उन वानरो को क्रमश भेंट किये । उसके पश्चात् राम ने अपनी पत्नी तथा अनुज के

साथ उस पुष्पक की पूजा की और उसकी परिक्रमा करने के बाद बड़े हर्ष से उस विमान
पर आरूढ़ हुए ।
तब राम ने सुग्रीव आदि मित्रों तथा अन्य वानरों को देखकर कहा—'तुम लोगों ने
मित्रता के नाते जो कार्य किये, उन्हें देवता भी नहीं कर सकते थे । मैंने तुम्हारे कारण
समस्त तेज, समस्त सुख तथा अपार कीर्त्ति प्राप्त की । तुम पुण्यात्मा, परम-पावन तथा
धन्यजीवी होओगे । अब तुम लोग अपने-अपने देश को लौट जाओ ।' तब कपियों ने
कहा—'हे राजन्, हम भी आपकी सेवा करते हुए अयोध्या जायेंगे, आपका राजतिलक
देखेंगे और आपके अनुपम चरित्रवान् अनुज भरत-शत्रुघ्न को, परम-पावनी आपकी माताओं
को देखेंगे और आपके नगर तथा गंगाजी के दर्शन करके लौटेंगे ।'
तब राम ने मन-ही-मन हर्षित होते हुए विभीषण, सुग्रीव, अंगद, हनुमान्, नील
आदि अनेक महान् वानर-श्रेष्ठों को पुष्पक में चढ़ने की अनुमति दे दी । वे भी बड़े उत्साह
से पुष्पक में बैठ गये । दनुज-स्त्रियाँ सीता को प्रणाम करके अपने-अपने निवास को लौट गईं।
तब दाशरथि को देखकर विभीषण ने कहा—'हे देव, इस पुष्पक की विशेषता यह है
कि इसमें कितने लोग भी बैठें, सब के लिए तो इसमें स्थान निकल आयगा, साथ ही
एक कोने में पाँच सौ लोगों के लिए स्थान बचा रहेगा ।' तब राम ने बड़े हर्ष से असंख्य
वानर एवं राक्षसों को उस विमान में बैठने की अनुमति दी । इसके पश्चात् वह पुष्पक
गगन की ओर उड़कर आकाश-मार्ग से, मनोवेग के सदृश वेग से ऐसा जाने लगा,
मानो सूर्यविम्ब पूर्व से पश्चिम को जाना छोड़ दक्षिण से उत्तर की ओर जा
रहा हो ।
१६१ श्रीराम का सीता को विभिन्न दृश्यों को दिखाकर समझाना
तब नित्य-पुण्यवान् राम ने सीता से कहा—'हे शुकवयनी, क्या तुमने अक लंक श्री
से विलसित इस लंका को देखा ? यह विश्वकर्मा द्वारा निर्मित हुई है और त्रिकूट पर्वत
के मध्य में स्थित है । इस लंका का राज्य करने का भाग्य रावण को नहीं था, इसलिए
उस दुर्जन का नाश हुआ ।' उसके पश्चात् राम ने उन्हें रक्त, मांस, मज्जा तथा अस्थि-
खण्डों से परिपूर्ण समर-भूमि को दिखाते हुए कहा—'हे कमलाक्षी, यहीं पर रावण अपना
रण-कौशल दिखाते हुए युद्ध करके मारा गया । देखो, वहाँ महान् शक्ति-सम्पन्न कुम्भकर्ण
घोर युद्ध करने के पश्चात् हत हुआ । यहाँ पर प्रहस्त नील पर आक्रमण करके नष्ट हुआ।
यहीं पर हनुमान् ने महान् बली धूम्राक्ष का संहार किया । उस स्थान पर अजेय हो मेघ-
नाद ने हमें नाग-पाशों से बाँधा था । वहाँ पर सौमित्र ने अपना शौर्य तथा शक्ति दिखाते
हुए अतिकाय का वध किया था । यहाँ पर अक्षीण वलशाली मकराक्ष युद्ध करते हुए
गिरा था । इस स्थान पर शत्रु-दलन तथा अकुंठित विक्रमी अग्निवर्ण गिरा । उस स्थान
पर सौमित्र ने इंद्रजीत का संहार किया । हे सरोजाक्षी, इसी स्थान पर अंगद ने अनुपम
बली अतिकाय का वध किया था । इसी स्थान पर महोदर तथा महापार्श्व नामक भयंकर
विक्रमी लड़ते हुए गिरे थे । यहाँ देवांतक एव नरांतक क्रता से युद्ध करते हुए मारे
गये थे ।

'यह लो, यही पर महान् सेतु है, जिसे हमने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए
समुद्र पर बाँधा था । यही गधमादन नामक पुण्य-तीर्थ है । यह सदाशिव का सर्वमान्य
निवास-स्थान है । हे कमलाक्षी, यह जो काचनाचल दीख रहा है, वही हिरण्यनाभ है ।
हे सुदरी, पवन-पुत्र तुम्हारा अन्वेषण करते हुए बडे वेग से लका की ओर जा रहा था,
तब उसको आतिथ्य देने के उद्देश्य से यह महान् पर्वत समुद्र से ऊपर निकल आया था ।'
जब राम इस प्रकार वर्णन कर ही रहे थे कि राम ने अपने समक्ष भयकर आकार
से युक्त रावण का रूप देखा । उसे देखते ही सभ्रमचित्त हो राम ने विभीषण से कहा—
'हे विभीषण, यह कैसा विचित्र है ? मैं ने अपने प्रचण्ड बाहुबल से युद्ध-क्षेत्र में दशकठ का
सहार किया था, और इसके लिए ब्रह्मा-आदि समस्त देवताओ ने बार-बार मेरी प्रशसा
भी की थी । तब फिर आज मेरी आँखो के सामने रावण आकर कैसे खडा है ? इसका
क्या रहस्य है ?' तब विभीषण ने कहा--'हे राजन्, ब्रह्मा की सतति में जन्म लिये हुए
दुर्जन रावण का आपने वध किया था । अत, आपको ब्रह्म-हत्या का दोष लग गया है ।
इसलिए कदाचित् रावण आपको दीख पडा है । इस पाप का प्रायश्चित्त यही करके आगे
बढना चाहिए । नही तो आगे के कार्य सफल नही होगे । अत', आप मन-ही-मन ब्रह्मा
का स्मरण कीजिए । देवताओ के साथ वे बडे हर्ष से आयेंगे और कर्तव्य का निर्देश करेंगे ।
तब राम ने पुष्पक विमान को पृथ्वी पर उतरवाया और मन-ही-मन बडी श्रद्धा
से ब्रह्मा का स्मरण किया । तुरन्त सभी दिक्पालो, मुनियो तथा देवताओ के साथ ब्रह्मा
वहाँ आये और बडी प्रीति से बोले--'हे देव, आपने मुझे किसलिए स्मरण किया है ?'
तब रघुराम ने अपने देखे हुए रावण के रूप का वृत्तान्त सुनाया । तब ब्रह्मा विस्मित होकर
बोले--'हे देव, यह दैत्य मेरे तेज से इस पृथ्वी पर पैदा हुआ और इतने घोर पाप किये,
'फिर भी अन्त में पाप-रहित होकर मरा । इस पृथ्वी पर विप्र अपने वर्णाश्रम धर्म का ज्ञान
रखते हुए, उसके अनुसार कर्म न करे, उसके विपरीत कर्म करे, अतुल पाप करे, गुरु-
दूषण करे, कुल-भ्रष्ट हो जाय और गो-ब्राह्मण हत्या आदि घोर पाप भी क्यो न करे,
'फिर भी वह इस पृथ्वी पर वध के योग्य नही है । राजा को यही चाहिए कि ऐसे दुर्जन,
क्रूर एव पापी के वश को निर्मूल कर दे और उसे अपने देश से निर्वासित कर दे ।
हे जगदीश, विश्रववसु का पुत्र, अब मोक्षार्थी हो आपके सामने खडा हुआ है । उसे सतुष्ट
कीजिए और एक शुभ लग्न में समुद्र के सेतु पर अपने नाम पर शिव की प्रतिष्ठा कीजिए।
इसके पश्चात् उसकी विधि बतलाकर ब्रह्मा चले गये ।
१६२. राम के द्वारा शिवलिंग का प्रतिष्ठापन
तुरन्त राम ने अपने निकट रहनेवाले पवन-पुत्र को देखकर कहा--'हे प्रशसनीय
बलाढ्य तथा साहसी हनुमान्, तुमने हमारा कार्य पूरा करके हमारा उद्धार किया है और
हमारी कीर्त्ति को चारो ओर फैलाकर हमें कृतार्थ किया है । विनय, विक्रम, धैर्य एव
प्रसिद्धि में निखिल लोको में तुम्हारी समता कोई नही कर सकता । अभी हमारा एक और
कार्य सपंन्न करो । हे वानरोत्तम, तुम असख्यफलप्रदायिनी काशी को शीघ्र जाकर वहाँ से
एक शिवलिंग ले आओ । यहाँ से काशी दो सौ दस योजन दूर है । दो घडी में

तुम शिवलिंग को लेकर वापस आओ । कही भी विलम्ब किये बिना शीघ्र आना । पृथ्वी
पर मूर्च्छित होकर गिरे हुए मेरे भाई के लिए तुम तेईस लाख बीस सहस्र और दस योजन
की दूरी पवन-वेग से पार करके ओषधी-शैल ले आये थे और फिर उसे यथास्थान पहुँचा
दिया था । यह सारा कार्य तुमने एक अर्द्ध प्रहर में सपन्न किया था । यह कार्य तुम्हारे
लिए कोई बड़ा नही है ।'
यह सुनकर हनुमान् ने हर्ष से फूलते 'हुए रामचन्द्र को प्रणाम किया और उनकी
आज्ञा लेकर चल पड़ा । वह तुरन्त महेन्द्राचल पर चढ़कर अपनी सारी शक्ति के साथ
आकाश की ओर उछलकर आकाश-मार्ग से काशी नगरी में पहुँच गया । उसने वहाँ पुण्य-
तरङ्गिणी गंगा में स्नान किया, काशी में विलसित परम दयालु भक्तजन-पालक विश्वनाथजी
के दर्शन करके उनकी स्तुति की । वहाँ से एक शिवलिंग को लेकर हनुमान् तुरन्त अत्यधिक
वेग से लौटने लगा ।
हनुमान् के आगमन की प्रतीक्षा में बैठे हुए वधु-जन-वन्दित राम मन-ही-मन सोचने
लगे—'शुभ लग्न आसन्न हो रहा है । पता नहीं कि हनुमान् अभी तक क्यो नही आया है।
कदाचित् किसी राक्षस से छेड़े जाने पर उससे युद्ध कर रहा होगा । न जाने क्या वात हुई ?'
फिर, उन्होंने निश्चय किया—'शुभ मुहूर्त्त के बीतने के पहले ही मैं एक सैकत
लिंग बनाकर उसकी प्रतिष्ठा कर दूँगा ।' ऐसा निश्चय करके राम ने एक योग्य स्थल
को चुनकर वहाँ अपने हाथो से एक सैकत लिंग बनाया। कमलाक्षी सीता ने पार्वती-नाथ
के लिंग के ठीक सामने रेत से एक नन्दी बनाई । उसके पश्चात् राम उस लिंग की पूजा
करने लगे ।
उसी समय वायुपुत्र वायु वेग से वहाँ पहुँचकर रामचन्द्र के चरणो में प्रणाम किया ।
फिर, वह रामचन्द्र द्वारा प्रतिष्ठित शिवलिंग को देखकर खिन्न हुआ । उसका सारा शरीर
दुःख के आवेश से कांपने लगा और गद्गद कंठ से वह राम को देखकर बोला—'हे सूर्य-
वंशतिलक, आपकी आज्ञा के अनुसार मैं काशी गया और ब्रह्मा आदि देवताओ के समक्ष
ही मैं वहाँ से एक शिवलिंग ले आया हूँ । मुझे भेजकर, मेरे लौटने के पहले ही आपने
शिवजी का प्रतिष्ठापन संपूर्ण कर दिया । क्या, यह आपके लिए उचित था ? हे देव, कदाचित्
मैं आपके विश्वास के अयोग्य हो गया हूँ, आपके मन में मेरे प्रति प्रेम नहीं है ।'
तब राम ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए हनुमान् के देखकर कहा—'हे पवन-पुत्र, तुम भी मेरे
भाइयो में एक हो । मेरा तुम पर अपार स्नेह है । शुभ मुहूर्त्त न बीत जाय, यही विचार
करके मैंने रेत से शिवजी का प्रतिष्ठापन किया । इतने में तुम आ गये । मुझे बडी प्रसन्नता हुई।
अब बुरा ही क्या है ? तुम इस शिवलिंग को हटाकर अपने लाये हुए शिवलिंग का
प्रतिष्ठापन करो ।' तब वायुपुत्र ने बड़े हर्ष से अपनी पूँछ से उस शिवलिंग को लपेटा
और बार-बार उसे हिलाने का प्रयत्न किया, किन्तु वह शिवलिंग किंचित् भी नही हिला।
हनुमान् मन-ही-मन आशंकित होने लगा । फिर भी, उसने अनेक बार प्रयत्न किया, किन्तु
उसे हिलाने में अपने को असमर्थ पाकर मन-ही-मन चिंताकुल हो सोचने लगा—'हाय मैं
पूर्व में सहज ही द्रोणाचल को उखाड़कर लाया था । शिव तथा भूतगण से युक्त कैलास

[Header] युद्धकांड ४६५

पर्वत को उठानेवाले रावण भी जब सौमित्र को उठाने में अपने आपको असमर्थ पाया, तब
मैंने सौमित्र को उठाकर इन्द्र आदि देवताओ की प्रशसा प्राप्त की । मेरु तथा मन्दर पर्वतो
को मैंने अपने पैर के अंगूठे से उछालने की शक्ति रखता हूँ । क्या आश्चर्य है कि यह
शिवलिंग मेरे लिए बहुत भारी हो रहा है । कदाचित् मेरी शक्ति ही घट गई है, अथवा
सूर्यवंशज को क्रोध से अपशब्द कहने का पाप मुझे लग गया है या काशी का शिवलिंग यहाँ
तक ले आने के कारण ही ऐसा हो रहा है । अन्यथा यह कैसे हो सकता है कि यह शिव-
लिंग मेरे लिए भारी पड़ जाय ।'
इस प्रकार सोचकर हनुमान् ने अपनी सारी शक्ति का सचय किया और उस शिव-
लिंग को उखाडने का शक्ति-भर प्रयत्न किया, किन्तु वह असफल हुआ । उसकी सारी
शक्ति जाती रही और वह रक्त उगलते हुए मूच्छित हो नीचे गिर पडा । तब राम ने अपने
दीप्तिमान् एव कोमल कर-कमल फैलाकर हनुमान् को उठाया । तब उसकी चेतना लौट
आई और उसने राम को साष्टाग प्रणाम करके कहा—'हे सीता के हृदय-कमल-पट्चरण,
आपकी जय हो । हे घोर कुटिल-राक्षस-समूह-सहारक, आपकी जय हो । हे शिव के उद्दण्ड-
कोदण्ड-भजक, आपकी जय हो । हे बाणाग्नि से समुद्र को सोखनेवाले वीर, आपकी जय हो ।
हे रावण-रूपी उन्नत शैल के लिए अमरेन्द्र-स्वरूप, आपकी जय हो । हे भक्तवत्सल !
आपकी जय हो । हे निर्मलात्मा, सज्जन-कल्पतरु, शतकोटि सूर्य-सम तेजस्वी, आपकी जय हो ।
आपकी महिमा महेश्वर, इन्द्र, नागेन्द्र तथा वागीश, इनमें कोई भी जान नही सकते ।
तब भला मेरी शक्ति ही क्या है कि मै आपकी महिमा जानूँ ? आपके द्वारा प्रतिष्ठित
शिवलिंग को अबोध की भाँति उखाडने का प्रयत्न करके मैंने जो अपराध किया है, उसे आप
क्षमा कीजिए और आपकी आज्ञा के अनुसार मेरे द्वारा लाये गये इस शिवलिंग की यथोचित
व्यवस्था कीजिए ।"
इस प्रकार अत्यन्त भक्ति से स्तुति करनेवाले हनुमान् को देखकर राघव ने कहा--
'हे पवनपुत्र, तुम मन-ही-मन ऐसे क्यो दुःखी होते हो ? तुम अपने लाये हुए लिंग को
यही पर प्रतिष्ठित करो । इस पृथ्वी के लोग पहले उसी शिव की पूजा करेंगे, उनके
पश्चात्, मेरे द्वारा प्रतिष्ठित ईश्वर की अर्चना करेंगे । जो भक्त जाह्‌नवी का पुण्य-सलिल
ले आकर उससे तुम्हारे लाये हुए शिवलिंग का अभिपेक करेंगे, उनके किये हुए ब्रह्म-हत्या
आदि पाप नष्ट हो जायेंगे, उनकी कीर्ति शाश्वत होगी, अनुपम पुत्र-पौत्रो की वृद्धि उन्हें प्राप्त होगी
और वे अनुपम संपत्ति प्राप्त करेंगे ।' यह सुनकर हनुमान् अत्यन्त हर्पित एव सतुष्ट हुआ ।
उसके पश्चात् राम ने काशी-लिंग को वहाँ प्रतिष्ठित किया और पहले उसी लिंग
की पोडशोपचार पूजा बडी भक्ति के साथ की और उसके पश्चात् अत्यन्त हर्प मे अपने
द्वारा प्रतिष्ठित शिव की पूजा की । तब देवताओ ने राम पर पुष्प-वृष्टि की और सभी
वानर आनन्द से प्रफुल्लित हो उठे । तब विभीपण ने राम से कहा--'हे जगदीश, आप
ऐसी कोई व्यवस्था कीजिए कि इस सेतु-मार्ग से कोई लका में न आ सके ।'
१६३. श्रीराम का सेंतु की महिमा बताना
श्रीराम ने तब बडे हर्प से उस विभीपण को देखकर कहा--'ऐसा ही होगा ।'
५६

फिर, वे सेतु पर कुछ कदम आगे चले और उस पर खडे होकर अपने अनुज के हाथ का
धनुष अपने हाथ में लिया और उसकी नोक से उस सेतु पर एक रेखा खींचकर उसे इस
प्रकार काट दिया कि कपियों के द्वारा निर्मित उस सेतु के सभी जोड टूट गये । उसके
पश्चात् वे बोले--'जो व्यक्ति इस स्थान पर स्नान करेगा, उसके परस्त्रीगमन, ब्रह्महत्या, गुरु-
द्रोह, गो-वध, सुरापान, वेद-दूषण, पर-वित्तापहरण, सहोदरी रति, स्त्री-हत्या, चोरो की
मित्रता, गृह-दाह, मास-भक्षण आदि कार्यों के द्वारा उत्पन्न समस्त पाप नष्ट हो जायेंगे, पुण्य की प्राप्ति
होगी, और उसे चिरायु, आरोग्य, पर-हितवृद्धि, सौभाग्य एव शाश्वत कीर्त्ति प्राप्त होगी ।'
इसके पश्चात् राघव बडे हर्ष से पुष्पक पर आरूढ हुए । यह पुष्पक देवताओ के
आशीर्वाद तथा वानरो की प्रशसा प्राप्त करते हुए पूर्ववत् आकाश-मार्ग में बड़े वेग से जाने
लगा । तब मनुकुलेश्वर भूमि सुता को देखकर बोले--'हे विधुवदनी, इसी स्थान पर
विभीषण हम से मिला था। यही पर मैने कुश-शय्या पर शयन किया था । यही पर मैने
एकान्त-सेवा की और ब्रह्मास्त्र को चढाकर समुद्र पर चलाने का उपक्रम किया, तो नदियों
के साथ समुद्र ने आकर इसी स्थान पर मुझे प्रणाम किया था । हे कमलमुखी, यहाँ पर
मैंने अनुपम विक्रम एव शान्ति से वाण का सधान करके वालि का वध किया था । वहाँ
देखो, प्रचुर वनो और फलो से युक्त किष्किन्धापुरी है, जो सुग्रीव की राजधानी है ।
तब चचल नेत्रवाली जानकी ने रामचन्द्र से कहा--'हे नाथ, मेरी इच्छा है कि
सुग्रीव की पत्नियों को भी अपने साथ अयोध्या ले चलूँ ।' तब राम ने पुष्पक को वहाँ
रोक दिया । राम की आज्ञा से सुग्रीव आकाश-मार्ग से जाकर तारा आदि अपनी पत्नियों
को ले आया । वे बड़ी भक्ति के साथ सीता को प्रणाम करके पुष्पक विमान में बैठ गई ।
फिर, पुष्पक पूर्ववत् चलने लगा । ऋष्यमूक पर्वत के निकट पहुँचते ही रघुराम ने जानकी
को देखकर कहा--'यही ऋष्यमूक पर्वत मेरे वानर-मित्रो का निवास है । इसी पर्वत पर
मैंने सभी रहस्यो को जानकर सुग्रीव से मित्रता की थी । यही वह पपा सरोवर है,
जो सदा रवि-किरणो से विकसित कमलो से दीप्तिमान् रहता है । हे सीते, तुम्हारे वियोग
से तप्त में इस पुण्य सरोवर के मृदुल तटों पर जब अपार दुख का अनुभव कर रहा था,
तब पुण्यात्मा पवनकुमार हमसे मिला और मेरे हृदय-कमल को शान्ति पहुँचाकर सुग्रीव
से हमारी भेंट कराई । वहाँ देखो, उस वन के मध्य शबरी का आश्रम सुशोभित हो रहा है ।
यही पर मैंने क्रुद्ध होकर घोर युद्ध-कौशल दिखाया था और महा वलशाली कबध का
वध किया था । इसी स्थान पर उन्नतात्मा जटायु का स्वर्गवास हुआ । तुम्हें ले जानेवाले
नीच रावण को उसने रोका था और उसके साथ युद्ध करके यही पर आहत होकर गिरा था ।
वहाँ झाड़ियो एव वनो से आकीर्ण प्रदेश ही 'जनस्थान' कहलाता है । वहाँ देखो,
उसी स्थान पर सौमित्र ने शूर्पणखा के नाक-कान काटे थे । यहाँ देखो, इस स्थान पर मद-
मत्त हो हम पर आक्रमण करने आये हुए खर-दूषण आदि राक्षसो का सहार हुआ था ।
यहाँ पर मायामृग के रूप में मारीच ने मुझे तग किया था और यहाँ पर उसकी मृत्यु हुई ।
यही पंचवटी है । लो, यही वह पर्णशाला है, जहाँ से रावण मायारूप धरकर तुम्हें
चुरा ले गया था । वहाँ देखो, वही सुतीक्ष्ण मुनि का आश्रम है और उससे थोड़ी दूर पर

युद्धकांड ४६७
दीखने वाला आश्रम अगस्त्य का है। वहीं शरभंग मुनि का आश्रम है और वह देखो महामुनि
अत्रि का आश्रम दीख रहा है । वही पर सती अनसूया ने तुम्हें प्रेम से अंगराग प्रदान
किया था । वही चित्रकूट पर्वत है, जहाँ भरत ने मुझसे (घर लौटने की) प्रार्थना की थी।
वहाँ देखो, अनतिदूर विमल काननों के मध्य यमुना सुशोभित हो रही है। वहाँ देखो, अनेक दिव्य
मुनि जिसकी सेवा करते हैं, ऐसी विमल तरंगावली से युक्त गंगा नदी प्रवाहित हो रही है । उसके
किनारे अनेक उद्यानों से परिपूर्ण शृंगवेरपुर विलसित हो रहा है । वही वह सुन्दर स्थान है, जहाँ
गुह बड़ी भक्ति के साथ हमसे मिला था । वह देखो, वही सरयू नदी है, जिसके तट पर
अनेक यूप-काष्ठ विलसित हैं । हे कमलाक्षी, विशाल पुण्य-राशि अयोध्या वहाँ दीख रही है,
उसे प्रणाम करो ।' इस प्रकार, जब राम ने सीता को संकेत से अयोध्या दिखाई, तब बड़े
कुतूहल से वानर एवं राक्षस उचक-उचककर उस सुन्दर नगर को देखने लगे, जो असंख्य
रत्नों, स्वर्ण-सौधों, असंख्य तोरणों, ध्वजाओं तथा बहुत-से गज, अश्व, रथ, पदाति-सेना से
युक्त हो अपार वैभव से विलसित होते हुए अमरावती के समान दीख रहा था ।
१६४ भरद्वाज मुनि का आतिथ्य
चौदह वर्ष की समाप्ति के पश्चात् शुक्ल पंचमी (पंचम) के शुभ दिन में राम
अविरत तेजस्वी भरद्वाज मुनि के आश्रम के निकट उतरे । वे पुष्पक को आकाश में ठहरा-
कर आप आश्रम में गये और उस मुनि के चरण-कमलों में अपना मस्तक झुकाकर प्रणाम
किया और बड़े हर्ष से मुनि के आशीर्वाद प्राप्त किये । उसके पश्चात् उन्होंने अत्यन्त
विनय के साथ कहा—'हे अनघ, बहुत समय से मुझे आपका कुशल-समाचार ज्ञात नहीं
हुआ था । वनवास में रहते हुए बहुत समय व्यतीत हो गया है। आप को, कद, मूल, फल,
जल आदि उपलब्ध होने में कोई कष्ट तो नहीं होता ? आप की तपस्या बिना विघ्न-
बाधा के सतत चल रही है न ?'
राम के विनयपूर्ण वचनों को सुनकर मुनि अत्यन्त प्रसन्न हुए । वे बोले—
'हे निखिल लोकाराध्य, जब तुम स्वयं यहाँ जन्म लेकर बड़ी निष्ठा से समस्त लोकों का पालन
करते हो, तब भला, कही किसी को कष्ट या कोई दुःख हो सकता है ? पुण्य-कर्म करने-
वालों को कही कोई विघ्न-बाधा हो सकती है ? हे सत्यनिष्ठ, तुम्हारे प्रसाद से हम अत्यंत
सुखी हो सभी धर्म-कार्य संपन्न करते, वेद-विहितअनुष्ठान का आचरण करते हुए तपस्या
करते हैं । वनवास के लिए जाते समय तुम यहाँ आये थे । यहाँ से जाने के दिन से फिर
आज लौटकर आने तक तुम्हारा सारा वृत्तांत मैंने अपनी दिव्य दृष्टि से जान लिया है ।
तुम्हारे किये हुए अद्भुत कार्य देवताओं के लिए भी असंभव हैं । तुम्हारे वन जाने
के दिन से ही समस्त सुख-भोगों का त्याग कर घन जटा-भार एवं वल्कल धारण किये हुए,
भरत अत्यन्त भक्ति से तुम्हारी पादुकाओं पर समस्त राज्य-भार डालकर राज्य चला रहा है।
आश्चर्यजनक श्रद्धा से वह तुम्हारे आगमन की प्रतीक्षा कर रहा होगा । अपने अनुज की
श्रद्धा का विचार करके तुम्हें वहाँ शीघ्र पहुँच जाना चाहिए । किन्तु हे अनघ, तुम वनवास
से थके हुए आये हो, अतः आज तुम हमारे आश्रम में विश्राम करो । कल प्रात काल ही
हम से विदा लेकर यहाँ से जाना । मैं प्रीतिभोज की व्यवस्था करता हूँ ।

४६८ रंगनाथ रामायण
इतना कहकर मुनि ने अपने श्रेष्ठ तप की महिमा से राम को चकित करते हुए
कामधेनु का स्मरण किया । तुरन्त उस कामधेनु ने स्वच्छ कान्ति से चमकता हुआ, भात,
फल, घृत, दाल, विविध मिष्टान्न, मधुर शाक, शक्कर, दधि, परमान्न, औँटाया हुआ दूध,
मधु, शिखरन, शरबत, चटनी, पेवस, वरी, सुगंधित जल और स्वादिष्ट अँचार आदि का
प्रबन्ध कर दिया । तब राम ने वानर तथा दैत्य-नायकों के साथ बडी भक्ति एवं प्रीति से
भोजन किया । तदनन्तर भरद्वाज ने राम से कहा--'हे सुगुणाभिराम, हे कल्याणगुणधाम,
मैं तुम्हें कोई वर देना चाहता हूँ । तुम अपनी इच्छा से माँग लो ।' तब राम ने हाथ
जोडकर कहा--'हे मुनीश्वर, आप कृपा करके ऐसा वर प्रदान कीजिए कि साकेत नगरी
के चारो ओर तीन योजन तक की भूमि वर्ष भर शस्य-श्यामल बनी रहे और वहाँ के वृक्ष
सदा फूलते-फलते रहें । इसके सिवा मै और कोई वर नही चाहता ।' मुनि ने ऐसा ही
वर देने की कृपा की । वानर-वीर मुनि के दर्शन करके हर्ष से प्रफुल्लित होकर अपने को
कृतार्थ मानने लगे ।
तब रघुपति अनिलकुमार को देखकर बोले--'हे मारुति, तुम अपनी अनुपम शक्ति
से शीघ्र शृंगवेरपुर जाकर पुण्यात्मा गुह से मिलो और हमारे आगमन की सूचना उसे दो ।
उस पुण्यात्मा से मार्ग जानकर नंदीग्राम पहुँचकर हमारे अनुज शुभव्रती, दयालु तथा
उन्नतात्मा भरत को हमारे आगमन का समाचार देकर शीघ्र लौट आओ ।'
तब हनुमान् ने मानव-रूप धारण कर बडे वेग से गगा नदी को पार किया, और
शृंगवेरपुर में पहुँचा । वहाँ परहितात्मा परमेश्वर के आगमन का समाचार न जानने के
कारण गुह मन-ही-मन सोचने लगा--'मैं अपने प्रभु राजाराम के चरण-कमलो की सेवा
करते हुए उनके साथ वन में नही जा सका । पता नही, वे वहाँ कैसे रहते हैं और कहाँ हैं ?
कदाचित् वे सिंह, भेरुण्ड, राक्षस, अग्नि, भुजंग, विष आदि से पीडित हो कही
नष्ट तो नही हो गये । अन्यथा, (चौदह वर्ष की) अवधि समाप्त होने के पश्चात् भी
रघुराम लौटकर क्यो नही आये । राम अपने वचन तोडनेवाले नही हैं । मुझसे भूल

युद्धकांड ४६९
कमलो की सेवा करते हुए गया, वैसे मै भी उस दिन जा नही सका। राम से अलग हो,
मै कैसे इस पृथ्वी पर जीवित रह सकता हूँ ? मैने उसी दिन प्रतिज्ञा की थी कि यदि
चौदह वर्ष समाप्त होने के पश्चात् भी रघुपति लौटने की कृपा नही करेंगे, तो मै चिता
में जलकर अपने प्राण त्याग दूँगा । क्या, मै उस प्रतिज्ञा को झूठी होने दूँ ।' ऐसा निश्चय
करके उन्होने अपने मन्त्रियो को बुलाकर कहा—'मै राम से मिलने के लिए अग्नि-प्रवेश
करके अपने प्राण त्यागूँगा । तुम शत्रुओं का मद हरण करनेवाले, शौर्य-सम्पन्न शत्रुघ्न का
राजतिलक कर दो ।' तब शत्रुघ्न ने भरत को देखकर कहा—'हे राजन्, आपके न रहने
पर मुझे यह राज्य किसलिए चाहिए ? यह शरीर किसलिए ? मैं भी आपके चरणो की
सेवा करते हुए आपके साथ ही चलूँगा।' ऐसा दृढ़ निश्चय किये हुए उनको देखकर सभी
लोग भयभीत हो गये ।
१६५. हनुमान् का भरत को राघवौं का कुशल-समाचार सुनाना
इसी समय अनिलकुमार अत्यन्त वेग के साथ वहाँ पहुँच गया और भरत को बहुत
विनय से प्रणाम करके खडा रहा । तब भरत ने पूछा—'तुम कौन हो ? तुम्हारा नाम
क्या है ? तुम्हारे यहाँ आने का क्या कारण है ? तुम किस कुल के हो ? तुम कहाँ से
आ रहे हो और कहाँ जा रहे हो ?' तब अनिलपुत्र ने भरत से कहा—'हे देव, मैं
वानर हूँ और रघुराम का प्रिय दूत हूँ । सूर्य-कुल-कमल-भानु, उत्तमचरित्र राम ने
अपने वनवास की अवधि समाप्त करके सौमित्र तथा जानकी के साथ वन में ठहरे हुए हैं ।
उन्होने आपका कुशल-समाचार जानकर यहाँ आने के लिए मुझे भेजा है, इसीलिए मै
आया हूँ ।'
तब भरत अत्यधिक हर्ष से पुलकित हो उठे और बोले—'हे पुण्यवत्सल, हे वानर-
श्रेष्ठ, हे पवन कुमार, मै तुम्हारा स्वागत करता हूँ ।' इसके पश्चात् उन्होंने उस वानर-
श्रेष्ठ को हृदय से लगा लिया और उन्हें गज-मुक्ताओं तथा मणियो की मालाएँ, कनकावर,
श्रेष्ठ आभूषण, असख्य धन तथा नगर भेंट किये और कहा—'हमारे प्रभु राम के वनवास
गये हुए बहुत समय व्यतीत हो गया है । वे कहाँ रहे ? कहाँ-कहाँ विचरे ? अब वे
कहाँ हैं ? तुम राघव के प्रिय दूत हो, इसलिए हे अनघ, तुम सभी बातें विस्तार से कहो ।
मै तुम्हारी बातो का विश्वास नही कर पा रहा हूँ । हे वानरश्रेष्ठ, क्या उनका आना सत्य है ?'
तब उस विमलात्मा ने हँसकर बडी भक्ति से कहा—"आपके पिता महाराज ने
राम को राज्याधिकार से वचित करके उनके वनवास की आज्ञा दी, तो वे बडी भक्ति मे
जटाएँ तथा वल्कल धारण किये हुए जानकी तथा लक्ष्मण के साथ पैदल ही वनवास के
लिए रवाना हुए और बडे हर्ष से श्रेष्ठ मुनियो की सगति में चित्रकूट पर्वत में रहने लगे ।
तब आपने राज्य-ग्रहण को अस्वीकार कर अपने अग्रज को लौटा लाने का प्रयत्न किया ।
उनके अस्वीकार करने पर आप बडी भक्ति के साथ उनकी पादुकाओ को ले आये और
उनपर राज्य-भार डालकर राज-भोग त्याग कर तपस्वी के समान यहाँ रहने लगे । वहाँ से
राघव कुटिल दानवो से पूर्ण दण्डक-वन में पहुँचे। पहले वे शरभग मुनि के आश्रम में ठहरे
और वहाँ मुनियो के प्रति होनेवाले राक्षसो के अत्याचारो को दूर करके, सात्वना देने के पश्चात्

आगे बढे और जनस्थान में राक्षसराज की वहन शूर्पणखा की नाक और कान काटे ।
उसके वाद उन्होने खर, दूषण आदि चौदह सहस्र राक्षसो का सहार किया और वहाँ (पच-
वटी में) पर्णशाला बनाकर रहने लगे । वहाँ रहते समय राक्षसराज रावण की प्रेरणा से
मारीच नामक मायावी राक्षस सुन्दर स्वर्ण-मृग का रूप धारण किये हुए वहाँ दिखाई पडा । तब
मृगनेत्री सीता ने उस मृग को देखकर राम से कहा--'हे नाथ मुझे यह मृग बहुत प्रिय
लग रहा है । आप इसे अवश्य ला दीजिए ।' राघवेस्वर ने चाप लेकर पीछा किया और
निदान उसपर तीक्ष्ण वाण चलाया, तो वह कुटिल राक्षस--'हाय लक्ष्मण ! हाय लक्ष्मण !'
कहकर आर्त्तनाद करते हुए गिर पडा । यह आर्त्तस्वर सुनकर साध्वी सीता ने भय से
व्याकुल होकर लक्ष्मण को भेज दिया । तब मुनि-वेष धरकर रावण वहाँ आया और
सीता को वलात् उठाकर ले जाने लगा । तब जटायु ने इसे देखा । उसने रावण को
रोका, तो रावण ने उसके साथ युद्ध करके उसे परास्त करके मार डाला । उसने समुद्र
पार किया और लका के अपने उद्यान में सीता देवी को वंदिनी बनाकर रखा । जब रामचन्द्र
मायामृग का वध करके क्लान्त हो लौटने लगे, तब उन्होने मार्ग में लक्ष्मण को देखा ।
तुरन्त उन्होने व्याकुल हो लक्ष्मण से पूछा कि सीता को अकेली छोडकर यहाँ क्यो आये ?
दोनो भाई शीघ्र पर्णशाला में लौट आये । किन्तु वहाँ सीता को न देखकर वे अत्यन्त
शोकाभिभूत हो गये । फिर, सीता की खोज करते हुए वे दोनो वनो में से होकर जाने लगे ।
मार्ग में उन्होने रावण के वाहुबल से कटकर पृथ्वी पर गिरे हुए जटायु को देखा । जटायु
से उन्हें विदित हुआ कि दशकंठ उसकी ऐसी दशा करके सीता को ले गया है। फिर, उस
विहंगेश की दाह-क्रिया करके वे जगलो में भटकते हुए जाने लगे । ऋष्यमूक पर पहुँचकर
उन्होने सुग्रीव से मित्रता की । राम ने सुग्रीव के लिए वालि का सहार किया और तारा
के साथ वानर-राज्य सुग्रीव को प्रदान किया । सुग्रीव बड़े हर्ष से सीता के अन्वेषणार्थ दो
लाख असमान वलगाली तथा यशस्वी वानरो को प्रत्येक दिशा में भेजा । वानर दत्तचित्त
हो सीता का अन्वेषण करने लगे, तो सपाति ने उन्हें बतलाया कि सीता लका में है ।
तुम चिन्ता मत करो । मैं जैसा कहता हूँ वैसा करो । मैं ने सपाति के परामर्श से सौ
योजन समुद्र को पार करके अशोक-वन में शोक-सतप्त हो रहनेवाली वैदेही के दर्शन किये ।
उन्हें रामचन्द्र की मुद्रिका दी। उस देवी से चूडामणि प्राप्त की और उसे लाकर रामचन्द्र
को दिया । तब राम अत्यन्त प्रसन्न हुए और फिर समस्त वानर-सेना के साथ वे लका
पर आक्रमण करने के लिए चले, समुद्र पर सेतु को बांधा, लंका पर आक्रमण किया और
अपने प्रशंसनीय पराक्रम से लंकेश्वर का सहार किया और ससार का दुख दूर किया । फिर,
उन्होने पुण्यात्मा विभीषण को लका का राजा बनाया और पवित्रात्मा ब्रह्मादि देवताओ से
अनेक वर प्राप्त किये । तदनन्तर देवताओ के साथ आये हुए आपके पिता के चरणो में
प्रणाम करके, अग्नि-मुख से पवित्र घोषित की हुई सीता को स्वीकार किया । फिर, उन्होने
वानरो, राक्षसो, सुग्रीव, विभीषण, अगद आदि के साथ पुष्पक विमान पर आरूढ हो
लंका से प्रस्थान किया और सफल, विक्रम तथा यश से सुशोभित होते हुए भरद्वाज मुनि
के आश्रम में पहुँचकर वहाँ ठहरे हुए हैं । वे अवश्य ही कल यहाँ पधारेंगे ।"

भरत ने हनुमान् की बातो से अत्यन्त हर्षित होकर, शत्रुघ्न से कहा--'हे शत्रुघ्न,
तुम तुरन्त अयोध्या में जाकर सर्वत्र मगलोत्सव की घोषणा करा दो । राज-सभा-भवन में
राम के सेतु-बन्धन आदि के चित्र बनवाओ । देव-गृहो, भूदेव-गृहो (ब्राह्मण-गृह) का
अलंकरण, तुम स्वय अपने समक्ष कराओ, नगर-मार्ग को श्रेष्ठ तोरणो तथा ध्वजाओ से
सजाओ । युवतियो के द्वारा मोतियो से (घरो के आगे) चौक पुरवाओ, सभी घरो में
सुन्दर वस्तुएँ वितरित कराओ । और, सभी नगर-वासियो को सुन्दर वस्त्राभूषणो से
सुसज्जित रहने का आदेश दो । श्रीराम के आगमन का शुभ समाचार निकटवर्त्ती देशो के
राजाओ के पास भेजो और गज-तुरगो की विपुल ध्वनि किये विना चतुरगिणी सेना तथा
मंत्रियो को साथ लेकर माताओ की सेवा में तुम शीघ्र यहाँ लौट आओ ।'
भरत का आदेश प्राप्त करके अनघ शत्रुघ्न अत्यन्त वेग से अयोध्या में गये और बडे
उल्लास के साथ राघव के आगमन का शुभ समाचार अपने सभी वधु-जनो को सुनाया,
कौशल्या से कहा, कैकेयी से कहा और फिर सुमित्रा को कह सुनाया । फिर, उन्होने भरत
के आदेशानुसार नगर को सजवाया और अकलक रीति से अन्त पुरो का अलंकरण कराया,
चन्दन एव कर्पूर से सुगन्धित जल आँगनो में छिडकवाया और नगर-वीथियो में नव-रत्न-
तोरण बँधवाये । तब महात्मा वसिष्ठ आदि मुनि, पुरोहित, मुनि-पत्नियां, माताएँ, बन्धु-जन,
मंत्री, मित्र, स्त्रियाँ, नगर-निवासी तथा वृद्ध-जन, कुछ रथो में, कुछ पालकियों में, कुछ
अश्वो पर, कुछ गजो पर आरूढ हो चल पडे । शत्रुघ्न पंच महावाद्यों के रव के साथ
सभी को साथ लेकर भरत की सेवा में पहुँच गये ।
१६६. भरत-मिलाप
भरत अपनी माताओ, अनुज तथा सेना के साथ राम की अगवानी करने के लिए,
अत्यधिक उल्लास से चले । तब हनुमान् ने भरत से कहा--'हे अनघ, वह देखिए । राघव
भरद्वाज मुनि के आश्रम से आ रहे है । वही पुष्पक है । वहाँ देखिए, वे ही राम है ।
वही कपि-सेना है । वह सुनिए, वानरो के सरयू नदी को पार करने की ध्वनि सुनाई
पड रही है ।' भरत विमान को देखकर फूले नही समाये और जहाँ उस पुष्पक को देखा,
उसी स्थान पर वह बडी भक्ति से भाई को साष्टाग प्रणाम किया । फिर, उदयाद्रि पर
प्रकाशमान होनेवाले उदयोन्मुख सूर्य की भांति अपनी प्रभा को दसो दिशाओ में विकीर्ण
करते हुए पुष्पक पर आरूढ, पुण्यात्मा रघुराम के निकट पहुँचकर उन्हें प्रणाम किया ।
तब राम ने पुष्पक को पृथ्वी पर उतारा और लक्ष्मण के साथ बडे हर्ष से एक-एक
करके अपनी माताओ को प्रणाम किया । माताओ ने आशीर्वादि देकर उन्हें हृदय से लगाया ।
उसके पश्चात् भरत एव शत्रुघ्न ने बडी भक्ति से राम, सीता तथा लक्ष्मण को प्रणाम किया।
राम ने उन्हें हृदय से लगाकर आशीर्वादि दिया । फिर, सीता ने बडी प्रीति एव श्रद्धा से
अपनी सासो को प्रणाम किया, तो उन्होने अलग-अलग उन्हें हृदय से लगाकर आशीर्वादि
दिये । राम-लक्ष्मण ने बडी भक्ति से मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ को प्रणाम किया, तो उन मुनि ने
उन राजपुत्रो को आशीर्वाद देकर बडे स्नेह से उनका आलिंगन किया । भरत तथा शत्रुघ्न ने
संतुष्ट हृदयो से अपनी माताओ को प्रणाम किया और राम के पीछे भक्ति-युक्त हो रहनेवाले

४७४ रंगनाथ रामायण
वालि-पुत्र अंगद है । (उस पवन-पुत्र को देखो) उस पुण्यात्मा ने समुद्र को पार करके सीता को
पता लगाया, सहज ही सेतु को बँधवाकर राम को लका में ले गया और युद्ध में गिरे हुए
लक्ष्मण के लिए ओषधियों को लाकर उन्हें प्राण-प्रदान किया ।'
पुरजनों के ऐसे वार्तालापों के बीच सूर्यवंशज रामचन्द्र ने अन्तःपुर में प्रवेश किया ।
फिर, उन्होंने भरत-शत्रुघ्न को बुलाकर उन्हें दैत्यराज तथा वानर-नायकों के ठहरने
के लिए आवश्यक प्रबन्ध करने का आदेश दिया और उन्हें विविध स्वादिष्ट भोजन आदि
भिजवाये । इसके पश्चात् भरत ने सुग्रीव से कहा—'हे अनघ, हमने कल सूर्यवंश-मणि रामचन्द्र
के राजतिलक करने का प्रबन्ध किया है । इसके लिए हमें चारों समुद्र का जल तथा गंगा आदि
तीर्थों के जल चाहिए । उनको मँगवाने का प्रबन्ध करो । सूर्य-पुत्र ने परम हर्ष से गज, सुषेण,
जाम्बवान् और शीघ्रगामी वेगदर्शी को बुलाकर उन्हें सुन्दर रत्न-कलश देकर तीर्थों का जल
लाने के लिए भेजा । फिर नल, गवाक्ष, वायुपुत्र तथा ऋषभ को समुद्र का जल लाने के लिए
भेजा । तब वानर-वीर अत्यन्त वेग से गये और दूसरे ही दिन प्रातःकाल तक आवश्यक तीर्थों
के जल आदि ले आये । यह देखकर सब लोग आश्चर्यचकित रह गये ।
१६८. राजतिलक
भरत ने निर्मलचेता एवं सदाचार-सम्पन्न वसिष्ठ, गौतम, जावालि, कश्यप, कण्व,
वामदेव आदि मुनीश्वरों को तथा चतुर्वेद-पारंगत विबुधों को बुलाकर विनय एवं भक्ति के
साथ उनसे कहा—'आप कृपया विधिवत् श्रीराम का राजतिलक कीजिए ।' तब वे मंगल-
वाद्यों की ध्वनि के साथ जानकी तथा राम को बुला लाये और रमणीय रत्न-पीठ पर उन दोनों
को आसीन किया और वेदमन्त्र-पूर्वक पुण्य-सलिल से उनका अभिषेक किया । राम के सिर पर
से गिरनेवाली पूर्ण जल की धारा देखने में बहुत ही रमणीय प्रतीत होती थी । देवताओ की
स्तुतियों को प्राप्त करते हुए, पार्वती के साथ विलसित होनेवाले परमशिव की जटा से झरने-
वाली गगनदी की भाँति वह जल-धारा अत्यन्त कमनीय दीख रही थी । वह जल-धारा क्रमशः
उनके चरणों से होकर पृथ्वी पर ऐसे गिरने लगी, मानो विष्णु के चरणों से जन्म लेकर
पवित्र गंगा पृथ्वी पर उतर रही हो । इस प्रकार, उस समय रामचन्द्र स्वयं विष्णु तथा शिव
की भाँति शोभायमान हुए । राज्याभिषिक्त राम उस समय अपने ललाट पर बँधे राजपट्ट के साथ,
देखनेवालों को शिव की भाँति दीख रहे थे और ललाट पर बँधा हुआ पट्ट, ऐसा दीखता था
मानो शिव की जटाओं में स्थित हो, अपनी सरस कान्ति से जटाओं को आलोकित करनेवाली
शशिरंखा ही गंगा की लहरों के धक्के से फिसलकर ललाट पर आ गई हो । उस समय
गरुड, खेचर, गंधर्व, सुर, सिद्ध तथा साध्य, आकाश से अत्यन्त उत्साह से जय-निनाद करने
लगे । अप्सराएँ नृत्य करने लगी । उस शुभ घड़ी में इन्द्र ने अनिल के द्वारा बड़े प्रेम से राम
के पास पारिजात पुष्पों की माला तथा मोती के हार भेजे । राघव ने बड़े आदर के साथ
उन्हें धारण किया । उस महान् उत्सव के समय, पृथ्वी सस्यश्यामला हो गई, वृक्ष पुष्पों एवं
फलो से लद गये, पुष्पों में अद्वितीय सुगन्ध आ गई और दिशाएँ निर्मल हो गईं ।
तब रघुराम ने भूसुरो तथा महात्माओं को अनुपम भक्ति-युक्त हृदय से तीस करोड
मुद्राएँ, एक लाख अश्व, एक लाख गज तथा एक लाख गायें दान दीं, सुग्रीव को प्रिय वचनों से

युद्धकांड ४७५
अपने निकट बुलाकर उसे ललित दिव्याम्बर आभूषण तथा स्वर्ण-कुसुमो की माला दी, अगद को
अमूल्य रत्न-जटित स्वर्ण-अगद (केयूर) दिये, पुण्यात्मा विभीषण को अमूल्य केयूर एव मुकुट
दिये । नील को लोल कान्तियो से विलसित नील मणियो का और नल को नव-रत्नो
का सुन्दर हार दिया । उसके पश्चात् प्रसन्नचित्त हो राम भूपाल ने सभी वानरो को देख-देख-
कर, एक को भी छोडे विना, सबको दिव्य वस्त्र तथा आभूषण दिये । फिर, उन्होने सीता को
शरच्चन्द्र से भी उज्ज्वल कान्तियुक्त मणिमय हार दिया । किन्तु सीता ने उसे पहना नही,
किन्तु वह उस उपहार को हाथ में लिये साभिप्राय दृष्टि से रामचन्द्र के मुख की ओर देखने
लगी । उनकी दृष्टि का अभिप्राय समझकर चतुर राम ने अनुमति दी, तो उन्होने अपने
कृपा-रस से सींचते हुए उस हार को हनुमान् के कठ में पहना दिया । उस पवित्र हार को
धारण कर वह पुण्यात्मा पवन-पुत्र, शरत्काल के बादलो से घिरे हुए मेरु पर्वत की भांति
सुशोभित होने लगा ।
उसके पश्चात् वसिष्ठ की आज्ञा से राम अन्त पुर में गये और क्रमश अपनी सभी
माताओ को प्रणाम किया । सभी माताओ ने बडे स्नेह से उन्हें आशीर्वाद दिये । सीता ने भी
अपनी सासो को बडी भक्ति से प्रणाम किया । तव उन्होने सीता को हृदय से लगाकर
आशीर्वाद दिया—'तुम लक्ष्मी के सदृश, सरस्वती की भांति, पार्वती के समान पति-भक्ति,
सुमति, सौभाग्य, तेज एव अतुल कीर्त्ति से सम्पन्न होती हुई, सूर्य-चन्द्र के समान तेजस्वी पुत्रो
की माता बनो ।'
१६९. मित्रों को प्रीतिभोज देना
उसके पश्चात् रघुकुलाधिप बडे उल्लास से भोजनालय में गये । उन्होने मित्रो,
वधुओ, अनुजो तथा रवि-पुत्र आदि वानरो, विभीषण आदि दैत्य-वीरो एव पवित्रात्मा गुह
आदि लोगो को बडे स्नेह से बुलवा भेजा और उन्हें उचित आसनो पर बिठाया । बडे स्नेह
से सच्चरित्र हनुमान् को अपने साथ बैठकर भोजन करने के लिए कहा । (जब सब लोग
उचित आसनो पर उपस्थित हुए), सुन्दरियो ने प्रत्येक के आगे सोने के थाले लगाये और
पायस, भात, दाल, मिष्टान्न, बढिया सूखा शाक, विविध स्वादिष्ट शाक, कई प्रकार की चटनियां
शिखरन, अँचार, ताजा घी और मीठे फल आदि परोसे । तब सूर्यवंशाधीश ने दुगुनी प्रीति
से हनुमान् से कहा—'हे अनिलकुमार, भोजन प्रारंभ करो ।' इतना कहकर उन्होंने स्वय एक
कौर ग्रहण किया । तब हनुमान् ने अत्यन्त भक्ति से उस थाल को, जिसमें रामचन्द्र ने भोजन
प्रारंभ किया था, उठाकर अपने सिर पर रख लिया और आनन्दातिरेक से नृत्य करते हुए
कहने लगा—'हे वानरो, आओ । राम के थाल का प्रसाद प्रचुर मात्रा में हम सब को मिल
गया है ।' यो कहते हुए उसने सामने के अगस्त्य वृक्ष पर चढकर उसके पत्ते तोड लिये और
उन पत्तो में उस प्रसाद को रखकर वडी भक्ति से सभी वानर-वीरो को बाँटा । वे भी उस
प्रसाद को ग्रहण करके अत्यन्त सन्तुष्ट हुए । यही कारण है कि उस दिन से अगस्त्य वृक्ष के पर्ण
एकादशी (पारण) के लिए बहुत ही मुख्य माने जाते है ।
रघुराम ने, अजना-सुत (हनुमान्) की भक्ति से अत्यन्त सन्तुष्ट हो, दूसरा थाल मँगवा-
कर भोजन तथा जल ग्रहण किया । तदनतर उन्होने सुगन्ध-पुष्पो की मालाओ से सब लोगो का

अलकार किया और कर्पूर, ताम्बूल, चन्दन आदि सब को बाँट दिये । फिर, अत्यन्त प्रसन्नता
एव प्रीति से सकल भृत्य एवं अमात्यों के साथ राजसभा में बैठे ।
उसी समय निद्रा देवी सौमित्र को अपने वश कर लेने का उपक्रम करने लगी । सभा में
राम के समक्ष बैठे हुए लक्ष्मण यह देखकर जोर से हँसने लगे । तब राम, सीता, विभीषण,
सुग्रीव, हनुमान्, अगद, नल, नील, शरभ, सम्पाद, तार आदि वानर तथा शत्रुघ्न, भरत आदि ने
अपने-अपने कलक की बात सोचकर अपने सिर झुका लिये । तब राम ने सब की यह दशा देखकर
अपने अनुज से कहा—'हे लक्ष्मण, तुम अकारण ही क्यों हँसे ? इसका क्या अभिप्राय है बताओ ।'
तब लक्ष्मण ने भयभीत हो हाथ जोडकर कहा—'हे देव, जब में आपकी सेवा करते
हुए वन में आपके साथ रहने लगा, तब निद्रा मुझ पर अपना प्रभाव डालने लगी । तव मैने
उससे कहा कि तुम चौदह वर्ष तक मेरे पास मत आओ । मेरी बात मानकर वह चली गई ।
चौदह वर्ष समाप्त होते ही वह फिर लौटकर मेरे पास आई । हे देव, यही सोचकर में हँसा
और यही मेरे हँसने का मूल कारण है । हे दयासमुद्र, में आपके चरणों की सौगध खाकर कहता हूँ,
इसके सिवा मेरे हँसने का और कोई कारण नहीं है ।' तब सब लोगो के मन की शंकाएँ
दूर हुईं और सभी प्रसन्न हुए ।
करुणामूर्त्ति राम ने सब वानरों को देखकर कहा—'सभी कार्यों में सदा किसी भी धर्म
की अपेक्षा किये बिना, उनका आचरण करते रहो ।' इतना कहकर उन्होंने उन्हें बडे आदर से कई
प्रकार के उपदेश देकर प्रिय वचनो से जाने की अनुमति दी । उसके पश्चात् उन्होने
अनिलकुमार, सुग्रीव आदि प्रमुख वानरो को तथा विभीषण को विदा किया । सुग्रीव आदि
वानर प्रसन्नचित्त हो किष्किंधा लौट गये । विभीषण भी राक्षसों के साथ बडे उत्साह से लका
लौट गया ।
राम ने मनस्वी सौमित्र एवं भरत को युवराज बनाया और विशाल राज-वैभव का
अनुभव करते हुए, सीता के साथ समस्त सुखो को भोगते हुए राज्य करने लगे । वे अपने
पूर्वजो की अपेक्षा अधिक वेद-विहित धर्मों का आचरण करते हुए, कई प्रकार के अनुष्ठान
आदि करते थे । उन्होंने अश्वमेव तथा वाजपेय आदि कई श्रेष्ठ यज्ञ करते-हुए, देवता और
भूसुरों की रक्षा करते हुए परिपूर्ण रूप से धर्मनिष्ठ हो, ग्यारह सहस्र वर्ष तक पृथ्वी का पालन
किया । उनके राज्य में प्रजा को कोई दुःख नही था, अकाल और पाप कही नही था, सत्य
तथा धर्म नष्ट नहीं होते थे और सभी जन परहित-रत थे ।
इस प्रकार, आन्ध्र-भाषा का सम्राट्, काव्य, आगम आदि के प्रशंसनीय ज्ञाता, आचार-
वान्, अपार धैर्य-सपन्न, भूलोक-निधि, गोनबुद्ध भूपाल ने सुन्दर गुणो से सम्पन्न, धैर्यवान्,
शत्रुओं के लिए भयंकर, महात्मा, महान्, दयालु तथा ललित सद्गुणालकार अपने पिता विट्ठल-
नरेश के नाम पर, अनुपम तथा ललित शब्द एवं अर्थ से सम्पन्न, रामायण के इस युद्धकांड
की, श्रेष्ठ अलंकार एव सुन्दर भावो से परिपूर्ण बनाकर, इस प्रकार रचना की, कि वह इस ससार
में आचन्द्रार्क अत्यन्त पूजनीय हो, शोभायमान होता रहे ।
रसिकजनो के लिए आनन्ददायक, इस प्रसिद्ध तथा आर्ष आदि काव्य का पठन जो कोई करेगा,
या जो इसका श्रवण करेगा, उसे सामवेद आदि विविध वेदो का आधार राम-नाम-रूपी चिन्तामणि के