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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 494, कुल 508 में से

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पृष्ठ 494

तुम शिवलिंग को लेकर वापस आओ । कही भी विलम्ब किये बिना शीघ्र आना । पृथ्वी
पर मूर्च्छित होकर गिरे हुए मेरे भाई के लिए तुम तेईस लाख बीस सहस्र और दस योजन
की दूरी पवन-वेग से पार करके ओषधी-शैल ले आये थे और फिर उसे यथास्थान पहुँचा
दिया था । यह सारा कार्य तुमने एक अर्द्ध प्रहर में सपन्न किया था । यह कार्य तुम्हारे
लिए कोई बड़ा नही है ।'
यह सुनकर हनुमान् ने हर्ष से फूलते 'हुए रामचन्द्र को प्रणाम किया और उनकी
आज्ञा लेकर चल पड़ा । वह तुरन्त महेन्द्राचल पर चढ़कर अपनी सारी शक्ति के साथ
आकाश की ओर उछलकर आकाश-मार्ग से काशी नगरी में पहुँच गया । उसने वहाँ पुण्य-
तरङ्गिणी गंगा में स्नान किया, काशी में विलसित परम दयालु भक्तजन-पालक विश्वनाथजी
के दर्शन करके उनकी स्तुति की । वहाँ से एक शिवलिंग को लेकर हनुमान् तुरन्त अत्यधिक
वेग से लौटने लगा ।
हनुमान् के आगमन की प्रतीक्षा में बैठे हुए वधु-जन-वन्दित राम मन-ही-मन सोचने
लगे—'शुभ लग्न आसन्न हो रहा है । पता नहीं कि हनुमान् अभी तक क्यो नही आया है।
कदाचित् किसी राक्षस से छेड़े जाने पर उससे युद्ध कर रहा होगा । न जाने क्या वात हुई ?'
फिर, उन्होंने निश्चय किया—'शुभ मुहूर्त्त के बीतने के पहले ही मैं एक सैकत
लिंग बनाकर उसकी प्रतिष्ठा कर दूँगा ।' ऐसा निश्चय करके राम ने एक योग्य स्थल
को चुनकर वहाँ अपने हाथो से एक सैकत लिंग बनाया। कमलाक्षी सीता ने पार्वती-नाथ
के लिंग के ठीक सामने रेत से एक नन्दी बनाई । उसके पश्चात् राम उस लिंग की पूजा
करने लगे ।
उसी समय वायुपुत्र वायु वेग से वहाँ पहुँचकर रामचन्द्र के चरणो में प्रणाम किया ।
फिर, वह रामचन्द्र द्वारा प्रतिष्ठित शिवलिंग को देखकर खिन्न हुआ । उसका सारा शरीर
दुःख के आवेश से कांपने लगा और गद्गद कंठ से वह राम को देखकर बोला—'हे सूर्य-
वंशतिलक, आपकी आज्ञा के अनुसार मैं काशी गया और ब्रह्मा आदि देवताओ के समक्ष
ही मैं वहाँ से एक शिवलिंग ले आया हूँ । मुझे भेजकर, मेरे लौटने के पहले ही आपने
शिवजी का प्रतिष्ठापन संपूर्ण कर दिया । क्या, यह आपके लिए उचित था ? हे देव, कदाचित्
मैं आपके विश्वास के अयोग्य हो गया हूँ, आपके मन में मेरे प्रति प्रेम नहीं है ।'
तब राम ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए हनुमान् के देखकर कहा—'हे पवन-पुत्र, तुम भी मेरे
भाइयो में एक हो । मेरा तुम पर अपार स्नेह है । शुभ मुहूर्त्त न बीत जाय, यही विचार
करके मैंने रेत से शिवजी का प्रतिष्ठापन किया । इतने में तुम आ गये । मुझे बडी प्रसन्नता हुई।
अब बुरा ही क्या है ? तुम इस शिवलिंग को हटाकर अपने लाये हुए शिवलिंग का
प्रतिष्ठापन करो ।' तब वायुपुत्र ने बड़े हर्ष से अपनी पूँछ से उस शिवलिंग को लपेटा
और बार-बार उसे हिलाने का प्रयत्न किया, किन्तु वह शिवलिंग किंचित् भी नही हिला।
हनुमान् मन-ही-मन आशंकित होने लगा । फिर भी, उसने अनेक बार प्रयत्न किया, किन्तु
उसे हिलाने में अपने को असमर्थ पाकर मन-ही-मन चिंताकुल हो सोचने लगा—'हाय मैं
पूर्व में सहज ही द्रोणाचल को उखाड़कर लाया था । शिव तथा भूतगण से युक्त कैलास