रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] युद्धकांड ४६५
पर्वत को उठानेवाले रावण भी जब सौमित्र को उठाने में अपने आपको असमर्थ पाया, तब
मैंने सौमित्र को उठाकर इन्द्र आदि देवताओ की प्रशसा प्राप्त की । मेरु तथा मन्दर पर्वतो
को मैंने अपने पैर के अंगूठे से उछालने की शक्ति रखता हूँ । क्या आश्चर्य है कि यह
शिवलिंग मेरे लिए बहुत भारी हो रहा है । कदाचित् मेरी शक्ति ही घट गई है, अथवा
सूर्यवंशज को क्रोध से अपशब्द कहने का पाप मुझे लग गया है या काशी का शिवलिंग यहाँ
तक ले आने के कारण ही ऐसा हो रहा है । अन्यथा यह कैसे हो सकता है कि यह शिव-
लिंग मेरे लिए भारी पड़ जाय ।'
इस प्रकार सोचकर हनुमान् ने अपनी सारी शक्ति का सचय किया और उस शिव-
लिंग को उखाडने का शक्ति-भर प्रयत्न किया, किन्तु वह असफल हुआ । उसकी सारी
शक्ति जाती रही और वह रक्त उगलते हुए मूच्छित हो नीचे गिर पडा । तब राम ने अपने
दीप्तिमान् एव कोमल कर-कमल फैलाकर हनुमान् को उठाया । तब उसकी चेतना लौट
आई और उसने राम को साष्टाग प्रणाम करके कहा—'हे सीता के हृदय-कमल-पट्चरण,
आपकी जय हो । हे घोर कुटिल-राक्षस-समूह-सहारक, आपकी जय हो । हे शिव के उद्दण्ड-
कोदण्ड-भजक, आपकी जय हो । हे बाणाग्नि से समुद्र को सोखनेवाले वीर, आपकी जय हो ।
हे रावण-रूपी उन्नत शैल के लिए अमरेन्द्र-स्वरूप, आपकी जय हो । हे भक्तवत्सल !
आपकी जय हो । हे निर्मलात्मा, सज्जन-कल्पतरु, शतकोटि सूर्य-सम तेजस्वी, आपकी जय हो ।
आपकी महिमा महेश्वर, इन्द्र, नागेन्द्र तथा वागीश, इनमें कोई भी जान नही सकते ।
तब भला मेरी शक्ति ही क्या है कि मै आपकी महिमा जानूँ ? आपके द्वारा प्रतिष्ठित
शिवलिंग को अबोध की भाँति उखाडने का प्रयत्न करके मैंने जो अपराध किया है, उसे आप
क्षमा कीजिए और आपकी आज्ञा के अनुसार मेरे द्वारा लाये गये इस शिवलिंग की यथोचित
व्यवस्था कीजिए ।"
इस प्रकार अत्यन्त भक्ति से स्तुति करनेवाले हनुमान् को देखकर राघव ने कहा--
'हे पवनपुत्र, तुम मन-ही-मन ऐसे क्यो दुःखी होते हो ? तुम अपने लाये हुए लिंग को
यही पर प्रतिष्ठित करो । इस पृथ्वी के लोग पहले उसी शिव की पूजा करेंगे, उनके
पश्चात्, मेरे द्वारा प्रतिष्ठित ईश्वर की अर्चना करेंगे । जो भक्त जाह्नवी का पुण्य-सलिल
ले आकर उससे तुम्हारे लाये हुए शिवलिंग का अभिपेक करेंगे, उनके किये हुए ब्रह्म-हत्या
आदि पाप नष्ट हो जायेंगे, उनकी कीर्ति शाश्वत होगी, अनुपम पुत्र-पौत्रो की वृद्धि उन्हें प्राप्त होगी
और वे अनुपम संपत्ति प्राप्त करेंगे ।' यह सुनकर हनुमान् अत्यन्त हर्पित एव सतुष्ट हुआ ।
उसके पश्चात् राम ने काशी-लिंग को वहाँ प्रतिष्ठित किया और पहले उसी लिंग
की पोडशोपचार पूजा बडी भक्ति के साथ की और उसके पश्चात् अत्यन्त हर्प मे अपने
द्वारा प्रतिष्ठित शिव की पूजा की । तब देवताओ ने राम पर पुष्प-वृष्टि की और सभी
वानर आनन्द से प्रफुल्लित हो उठे । तब विभीपण ने राम से कहा--'हे जगदीश, आप
ऐसी कोई व्यवस्था कीजिए कि इस सेतु-मार्ग से कोई लका में न आ सके ।'
१६३. श्रीराम का सेंतु की महिमा बताना
श्रीराम ने तब बडे हर्प से उस विभीपण को देखकर कहा--'ऐसा ही होगा ।'
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