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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 486, कुल 508 में से

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पृष्ठ 486

४५६ रंगनाथ रामायण
उनकी तनुलता को पोंछकर दिव्य वस्त्रों से उन्हें सजाया, दिव्य मालाएँ और दिव्य आभूषणों
से उन्हें अलंकृत किया और उसके पश्चात् स्वर्ण-पालकी में बिठाकर उन्हें ले चलीं । तब
राक्षसेश्वर विभीषण बड़ी भक्ति के साथ राजचिह्न तथा वेत्र धारण करके अपने-आपको धन्य
मानते हुए, एक सेवक के समान प्रमुख राक्षसों के साथ पालकी के आगे-आगे चलने लगा । राम के
निवास से थोड़ी दूर पर पालकी को रोककर विभीषण राम की सेवा में उपस्थित हुआ और
हाथ जोड़कर नम्रता से बोला--'देव, लिवा लाया हूँ, देवी को ! देवी यहाँ पधारी हुई हैं ।'
तब राम ने अत्यन्त हर्ष, रोष एवं दैन्य से अभिभूत हो, मन में विचार कर
विभीषण से कहा--'लिवा लाओ ।' तब परम पावन तथा ज्ञानी विभीषण पावन-चरिता सीता को
बड़ी श्रद्धा से लिवा ले चला । उस समय राक्षसों एवं वानरों की भीड़ (सीता के दर्शनों
की तीव्र उत्कण्ठा से) उमड़-उमड़कर मार्ग को रोकने लगी । तब विभीषण निर्दय होकर अपने
हाथ की बेंत से उनपर कसकर प्रहार करने लगा । इस कारण से भीड़ में उठनेवाले आर्त्त-
नाद को सुनकर राम ने विभीषण से कहा--'हे विभीषण ! ऐसा भयंकर कार्य क्या तुम्हारे
लिए उचित है ? अब इनमें से हमारे लिए पराया कौन है ? अपनों को इस प्रकार दुःख
क्यों पहुँचाते हो ? उन्हें रोको मत । सभी लोग आकर देखें । इसमें बुरा क्या है ? (स्त्री
के लिए) कालान्तर एवं देशान्तर में नष्ट न होनेवाला एक शील ही गोपन की वस्तु है ।
ये विशाल दुर्ग, भवन, पर्दे आदि कभी स्त्रियों के लिए उचित आवरण नहीं हो सकते ।
व्यसनों में, विवाहों में, युद्धों में, मित्रों में और उत्सवों में स्त्रियों के लिए आवरण अनावश्यक है ।
मैं यहाँ हूँ और यह रण-भूमि है । अतः, इसमें कोई दोष नहीं है; उन्हें आने दो ।'
तब राम के आदेशानुसार विभीषण सीता को लिवा लाया । उस समय कल्याणी
सीता का शरीर स्वेद-बिन्दुओं से ऐसे आप्लावित हो रहा था, मानो उनके हृदय में उमड़ता
हुआ आनन्द (हृदय से) छलककर सारे शरीर में व्याप्त हो गया हो । उन्होंने राका-शशि
रामचन्द्र के दर्शनामृत का पान करके चिरविरहाग्नि को शान्त किया और परम-अनुराग से
भरी हुई अपने मन की उत्कंठ इच्छा से प्रेरित हो राघव को देखने लगीं । राघव को
देखते ही उनके धवल-लोचन-उत्पलों से अश्रु-प्रवाह उमड़ आया । वे भय, प्रीति एवं व्रीड़ा
से अभिभूत होकर सिर झुकाये खड़ी रहीं ।
तब रघुराम का मन क्रोधावेश से भर गया । उन्होंने उस रमणी को देखकर
कहा--'हे नारी, पुण्यशीला स्त्रियों के लिए लज्जा ही प्राण है । हे लज्जावती, प्रतिष्ठा
की रक्षा का विचार करके मैंने तुम्हें मुक्त किया है । इसके सिवा मेरे हृदय में तुम्हारे
प्रति कोई आसक्ति शेष नहीं है । काकुत्स्थ-वंशज धैर्य के धनी होते हैं, लोक-रक्षण-तत्पर होते हैं,
तथा लोक-प्रशंसा के योग्य होते हैं । उनके वंश में जन्म लेकर (यदि मैं तुम्हें ग्रहण
करूँ, तो) लोग कहेंगे कि मैंने अपने औचित्य को त्याग दिया । शत्रु के घर में रही हुई
तुम्हारा स्पर्श करके तुम्हें अपनाना धर्म-संगत नहीं हो सकता । इस भय से कि लोग यह
न कह बैठें कि यह अपनी पत्नी को खो बैठा और उसे छुड़ाकर नहीं ला सका, मैंने
तुम्हें छुड़ाया है । इसके सिवा तुम्हें लाने का मेरा कोई दूसरा उद्देश्य नहीं है । मैं तुम्हें
स्वीकार नहीं कर सकता । तुम जहाँ चाहो, जा सकती हो ।'