रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 496, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंफिर, वे सेतु पर कुछ कदम आगे चले और उस पर खडे होकर अपने अनुज के हाथ का
धनुष अपने हाथ में लिया और उसकी नोक से उस सेतु पर एक रेखा खींचकर उसे इस
प्रकार काट दिया कि कपियों के द्वारा निर्मित उस सेतु के सभी जोड टूट गये । उसके
पश्चात् वे बोले--'जो व्यक्ति इस स्थान पर स्नान करेगा, उसके परस्त्रीगमन, ब्रह्महत्या, गुरु-
द्रोह, गो-वध, सुरापान, वेद-दूषण, पर-वित्तापहरण, सहोदरी रति, स्त्री-हत्या, चोरो की
मित्रता, गृह-दाह, मास-भक्षण आदि कार्यों के द्वारा उत्पन्न समस्त पाप नष्ट हो जायेंगे, पुण्य की प्राप्ति
होगी, और उसे चिरायु, आरोग्य, पर-हितवृद्धि, सौभाग्य एव शाश्वत कीर्त्ति प्राप्त होगी ।'
इसके पश्चात् राघव बडे हर्ष से पुष्पक पर आरूढ हुए । यह पुष्पक देवताओ के
आशीर्वाद तथा वानरो की प्रशसा प्राप्त करते हुए पूर्ववत् आकाश-मार्ग में बड़े वेग से जाने
लगा । तब मनुकुलेश्वर भूमि सुता को देखकर बोले--'हे विधुवदनी, इसी स्थान पर
विभीषण हम से मिला था। यही पर मैने कुश-शय्या पर शयन किया था । यही पर मैने
एकान्त-सेवा की और ब्रह्मास्त्र को चढाकर समुद्र पर चलाने का उपक्रम किया, तो नदियों
के साथ समुद्र ने आकर इसी स्थान पर मुझे प्रणाम किया था । हे कमलमुखी, यहाँ पर
मैंने अनुपम विक्रम एव शान्ति से वाण का सधान करके वालि का वध किया था । वहाँ
देखो, प्रचुर वनो और फलो से युक्त किष्किन्धापुरी है, जो सुग्रीव की राजधानी है ।
तब चचल नेत्रवाली जानकी ने रामचन्द्र से कहा--'हे नाथ, मेरी इच्छा है कि
सुग्रीव की पत्नियों को भी अपने साथ अयोध्या ले चलूँ ।' तब राम ने पुष्पक को वहाँ
रोक दिया । राम की आज्ञा से सुग्रीव आकाश-मार्ग से जाकर तारा आदि अपनी पत्नियों
को ले आया । वे बड़ी भक्ति के साथ सीता को प्रणाम करके पुष्पक विमान में बैठ गई ।
फिर, पुष्पक पूर्ववत् चलने लगा । ऋष्यमूक पर्वत के निकट पहुँचते ही रघुराम ने जानकी
को देखकर कहा--'यही ऋष्यमूक पर्वत मेरे वानर-मित्रो का निवास है । इसी पर्वत पर
मैंने सभी रहस्यो को जानकर सुग्रीव से मित्रता की थी । यही वह पपा सरोवर है,
जो सदा रवि-किरणो से विकसित कमलो से दीप्तिमान् रहता है । हे सीते, तुम्हारे वियोग
से तप्त में इस पुण्य सरोवर के मृदुल तटों पर जब अपार दुख का अनुभव कर रहा था,
तब पुण्यात्मा पवनकुमार हमसे मिला और मेरे हृदय-कमल को शान्ति पहुँचाकर सुग्रीव
से हमारी भेंट कराई । वहाँ देखो, उस वन के मध्य शबरी का आश्रम सुशोभित हो रहा है ।
यही पर मैंने क्रुद्ध होकर घोर युद्ध-कौशल दिखाया था और महा वलशाली कबध का
वध किया था । इसी स्थान पर उन्नतात्मा जटायु का स्वर्गवास हुआ । तुम्हें ले जानेवाले
नीच रावण को उसने रोका था और उसके साथ युद्ध करके यही पर आहत होकर गिरा था ।
वहाँ झाड़ियो एव वनो से आकीर्ण प्रदेश ही 'जनस्थान' कहलाता है । वहाँ देखो,
उसी स्थान पर सौमित्र ने शूर्पणखा के नाक-कान काटे थे । यहाँ देखो, इस स्थान पर मद-
मत्त हो हम पर आक्रमण करने आये हुए खर-दूषण आदि राक्षसो का सहार हुआ था ।
यहाँ पर मायामृग के रूप में मारीच ने मुझे तग किया था और यहाँ पर उसकी मृत्यु हुई ।
यही पंचवटी है । लो, यही वह पर्णशाला है, जहाँ से रावण मायारूप धरकर तुम्हें
चुरा ले गया था । वहाँ देखो, वही सुतीक्ष्ण मुनि का आश्रम है और उससे थोड़ी दूर पर