रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 502, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें४७४ रंगनाथ रामायण
वालि-पुत्र अंगद है । (उस पवन-पुत्र को देखो) उस पुण्यात्मा ने समुद्र को पार करके सीता को
पता लगाया, सहज ही सेतु को बँधवाकर राम को लका में ले गया और युद्ध में गिरे हुए
लक्ष्मण के लिए ओषधियों को लाकर उन्हें प्राण-प्रदान किया ।'
पुरजनों के ऐसे वार्तालापों के बीच सूर्यवंशज रामचन्द्र ने अन्तःपुर में प्रवेश किया ।
फिर, उन्होंने भरत-शत्रुघ्न को बुलाकर उन्हें दैत्यराज तथा वानर-नायकों के ठहरने
के लिए आवश्यक प्रबन्ध करने का आदेश दिया और उन्हें विविध स्वादिष्ट भोजन आदि
भिजवाये । इसके पश्चात् भरत ने सुग्रीव से कहा—'हे अनघ, हमने कल सूर्यवंश-मणि रामचन्द्र
के राजतिलक करने का प्रबन्ध किया है । इसके लिए हमें चारों समुद्र का जल तथा गंगा आदि
तीर्थों के जल चाहिए । उनको मँगवाने का प्रबन्ध करो । सूर्य-पुत्र ने परम हर्ष से गज, सुषेण,
जाम्बवान् और शीघ्रगामी वेगदर्शी को बुलाकर उन्हें सुन्दर रत्न-कलश देकर तीर्थों का जल
लाने के लिए भेजा । फिर नल, गवाक्ष, वायुपुत्र तथा ऋषभ को समुद्र का जल लाने के लिए
भेजा । तब वानर-वीर अत्यन्त वेग से गये और दूसरे ही दिन प्रातःकाल तक आवश्यक तीर्थों
के जल आदि ले आये । यह देखकर सब लोग आश्चर्यचकित रह गये ।
१६८. राजतिलक
भरत ने निर्मलचेता एवं सदाचार-सम्पन्न वसिष्ठ, गौतम, जावालि, कश्यप, कण्व,
वामदेव आदि मुनीश्वरों को तथा चतुर्वेद-पारंगत विबुधों को बुलाकर विनय एवं भक्ति के
साथ उनसे कहा—'आप कृपया विधिवत् श्रीराम का राजतिलक कीजिए ।' तब वे मंगल-
वाद्यों की ध्वनि के साथ जानकी तथा राम को बुला लाये और रमणीय रत्न-पीठ पर उन दोनों
को आसीन किया और वेदमन्त्र-पूर्वक पुण्य-सलिल से उनका अभिषेक किया । राम के सिर पर
से गिरनेवाली पूर्ण जल की धारा देखने में बहुत ही रमणीय प्रतीत होती थी । देवताओ की
स्तुतियों को प्राप्त करते हुए, पार्वती के साथ विलसित होनेवाले परमशिव की जटा से झरने-
वाली गगनदी की भाँति वह जल-धारा अत्यन्त कमनीय दीख रही थी । वह जल-धारा क्रमशः
उनके चरणों से होकर पृथ्वी पर ऐसे गिरने लगी, मानो विष्णु के चरणों से जन्म लेकर
पवित्र गंगा पृथ्वी पर उतर रही हो । इस प्रकार, उस समय रामचन्द्र स्वयं विष्णु तथा शिव
की भाँति शोभायमान हुए । राज्याभिषिक्त राम उस समय अपने ललाट पर बँधे राजपट्ट के साथ,
देखनेवालों को शिव की भाँति दीख रहे थे और ललाट पर बँधा हुआ पट्ट, ऐसा दीखता था
मानो शिव की जटाओं में स्थित हो, अपनी सरस कान्ति से जटाओं को आलोकित करनेवाली
शशिरंखा ही गंगा की लहरों के धक्के से फिसलकर ललाट पर आ गई हो । उस समय
गरुड, खेचर, गंधर्व, सुर, सिद्ध तथा साध्य, आकाश से अत्यन्त उत्साह से जय-निनाद करने
लगे । अप्सराएँ नृत्य करने लगी । उस शुभ घड़ी में इन्द्र ने अनिल के द्वारा बड़े प्रेम से राम
के पास पारिजात पुष्पों की माला तथा मोती के हार भेजे । राघव ने बड़े आदर के साथ
उन्हें धारण किया । उस महान् उत्सव के समय, पृथ्वी सस्यश्यामला हो गई, वृक्ष पुष्पों एवं
फलो से लद गये, पुष्पों में अद्वितीय सुगन्ध आ गई और दिशाएँ निर्मल हो गईं ।
तब रघुराम ने भूसुरो तथा महात्माओं को अनुपम भक्ति-युक्त हृदय से तीस करोड
मुद्राएँ, एक लाख अश्व, एक लाख गज तथा एक लाख गायें दान दीं, सुग्रीव को प्रिय वचनों से