रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयुद्धकांड ४६९
कमलो की सेवा करते हुए गया, वैसे मै भी उस दिन जा नही सका। राम से अलग हो,
मै कैसे इस पृथ्वी पर जीवित रह सकता हूँ ? मैने उसी दिन प्रतिज्ञा की थी कि यदि
चौदह वर्ष समाप्त होने के पश्चात् भी रघुपति लौटने की कृपा नही करेंगे, तो मै चिता
में जलकर अपने प्राण त्याग दूँगा । क्या, मै उस प्रतिज्ञा को झूठी होने दूँ ।' ऐसा निश्चय
करके उन्होने अपने मन्त्रियो को बुलाकर कहा—'मै राम से मिलने के लिए अग्नि-प्रवेश
करके अपने प्राण त्यागूँगा । तुम शत्रुओं का मद हरण करनेवाले, शौर्य-सम्पन्न शत्रुघ्न का
राजतिलक कर दो ।' तब शत्रुघ्न ने भरत को देखकर कहा—'हे राजन्, आपके न रहने
पर मुझे यह राज्य किसलिए चाहिए ? यह शरीर किसलिए ? मैं भी आपके चरणो की
सेवा करते हुए आपके साथ ही चलूँगा।' ऐसा दृढ़ निश्चय किये हुए उनको देखकर सभी
लोग भयभीत हो गये ।
१६५. हनुमान् का भरत को राघवौं का कुशल-समाचार सुनाना
इसी समय अनिलकुमार अत्यन्त वेग के साथ वहाँ पहुँच गया और भरत को बहुत
विनय से प्रणाम करके खडा रहा । तब भरत ने पूछा—'तुम कौन हो ? तुम्हारा नाम
क्या है ? तुम्हारे यहाँ आने का क्या कारण है ? तुम किस कुल के हो ? तुम कहाँ से
आ रहे हो और कहाँ जा रहे हो ?' तब अनिलपुत्र ने भरत से कहा—'हे देव, मैं
वानर हूँ और रघुराम का प्रिय दूत हूँ । सूर्य-कुल-कमल-भानु, उत्तमचरित्र राम ने
अपने वनवास की अवधि समाप्त करके सौमित्र तथा जानकी के साथ वन में ठहरे हुए हैं ।
उन्होने आपका कुशल-समाचार जानकर यहाँ आने के लिए मुझे भेजा है, इसीलिए मै
आया हूँ ।'
तब भरत अत्यधिक हर्ष से पुलकित हो उठे और बोले—'हे पुण्यवत्सल, हे वानर-
श्रेष्ठ, हे पवन कुमार, मै तुम्हारा स्वागत करता हूँ ।' इसके पश्चात् उन्होंने उस वानर-
श्रेष्ठ को हृदय से लगा लिया और उन्हें गज-मुक्ताओं तथा मणियो की मालाएँ, कनकावर,
श्रेष्ठ आभूषण, असख्य धन तथा नगर भेंट किये और कहा—'हमारे प्रभु राम के वनवास
गये हुए बहुत समय व्यतीत हो गया है । वे कहाँ रहे ? कहाँ-कहाँ विचरे ? अब वे
कहाँ हैं ? तुम राघव के प्रिय दूत हो, इसलिए हे अनघ, तुम सभी बातें विस्तार से कहो ।
मै तुम्हारी बातो का विश्वास नही कर पा रहा हूँ । हे वानरश्रेष्ठ, क्या उनका आना सत्य है ?'
तब उस विमलात्मा ने हँसकर बडी भक्ति से कहा—"आपके पिता महाराज ने
राम को राज्याधिकार से वचित करके उनके वनवास की आज्ञा दी, तो वे बडी भक्ति मे
जटाएँ तथा वल्कल धारण किये हुए जानकी तथा लक्ष्मण के साथ पैदल ही वनवास के
लिए रवाना हुए और बडे हर्ष से श्रेष्ठ मुनियो की सगति में चित्रकूट पर्वत में रहने लगे ।
तब आपने राज्य-ग्रहण को अस्वीकार कर अपने अग्रज को लौटा लाने का प्रयत्न किया ।
उनके अस्वीकार करने पर आप बडी भक्ति के साथ उनकी पादुकाओ को ले आये और
उनपर राज्य-भार डालकर राज-भोग त्याग कर तपस्वी के समान यहाँ रहने लगे । वहाँ से
राघव कुटिल दानवो से पूर्ण दण्डक-वन में पहुँचे। पहले वे शरभग मुनि के आश्रम में ठहरे
और वहाँ मुनियो के प्रति होनेवाले राक्षसो के अत्याचारो को दूर करके, सात्वना देने के पश्चात्