रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयुद्धकांड ४६१
तब विचारवान् विभीषण ने बडी भक्ति से पुण्यात्मा स्त्रियो तथा पुरुषो को, पुण्य
वाद्यों के साथ भेजकर चन्दन एव अक्षत-भरे स्वर्णपात्र, रत्नाभरण एव कनकावर मँगाये
और अत्यन्त विनय के साथ उन्हें राम-लक्ष्मण तथा सीता को धारण करने के निमित्त
दिया । तब आकाश से देव-दु दुभियाँ वज उठी, देवता स्तुति करने लगे और अप्सराएँ पुष्प-
वृष्टि करने लगी । तब राम ने निश्चल आनन्द में भरे हुए प्रीति के साथ कहा--'हे
विभीषण हमें और भी कितने ही महान् कार्य करना शेष हैं । हम अब यहाँ विलम्ब नहीं
कर सकते । हमें शीघ्र अयोध्या पहुँचना चाहिए ।'
१६०. पुष्पक-आरोहण
तब विभीषण ने राम को देखकर भक्ति से कहा--'हे देव, पूर्वकाल में रावण ने
क्रुद्ध होकर कुवेर के साथ भयकर युद्ध किया था और युद्ध में उसे पराजित करके उसका
विमान छीन लिया था, वह विमान तैयार है । इन्द्रलोक के पुष्पक विमान की भाँति यह
भी अद्भुत वेग से जा सकता है, अत आप उस पुष्पक में आरूढ हो, हर्ष के साथ अयोध्या
लौटें । यही अच्छा होगा ।'
इस पर राम ने (उसे लाने की) अनुमति दी । तब राक्षसराज अत्यधिक सभ्रम
एव प्रीति से समस्त वैभवो से विलसित उस पुष्पक को ले आया । वह पुष्पक अचल
नवरत्न-दीपो तथा मन्द पवन से युक्त था । वे दीप ऐसे दीखते थे, मानो समस्त लोको को
जला देने की शक्ति रखनेवाले रावण की शक्ति की कल्पना करके अनिल दीपो को हिलाने
से डरता हो और दीप भी हिलने से डरते हो । उसके विमल द्वारो पर हरित-नील मणियां
ऐसी भासमान हो रही थी, मानो विमान के भीतर सजे हुए पुष्पो का रसपान करने के
लिए आये हुए भ्रमर भय के कारण भीतर प्रवेश नही कर रहे हो । उन नील-मणियो के
निकट ही जडी हुई मुक्ता-मणियाँ ऐसी दीख रही थी, मानो पुष्प-वाटिका में मुग्धावस्था
में रहनेवाली मल्लिका की कलियो को मुग्ध करके उन्हें छोडकर भ्रमर यहां चले आये हैं
और उनके विरह से मल्लिका की कलियाँ यहाँ आकर भ्रमरो के साथ रहने लगी हो ।
हसो तथा कमलो के चित्र काढे हुए दुकूलो से रचित उसका वितान ऐसा दीख रहा था,
मानो त्रिभुवन में भ्रमण करने के पश्चात् यहाँ आकर गगा अलसाई हुई लेटी हो । उसके
उज्ज्वल स्तम्भो में खचित मणिमय मूर्त्तियाँ ऐसी दीखती थी, मानो देव-कन्याएँ, यह विचार
करती हुई कि राम यहाँ कब (इस पुष्पक विमान में) पधारेंगे, हम उन्हें कब देखेंगे, स्तम्भो
पर अपनी तनु-लताओ को टेके हुए प्रतीक्षा कर रही हो । वह विमान ऐसा सुन्दर दीख
रहा था, मानो समस्त सृष्टि के रक्षणार्थ जब विष्णु राम के रूप में पृथ्वी पर आये, तब
वैकुण्ठ ही पुष्पक के रूप में यहाँ आ गया हो । ऐसे पुष्पक विमान को देखकर काकुत्स्थ-
वशज बडे प्रेम से विभीषण को देखकर और वानरो को लक्ष्य करके कहने लगे--'हे
विभीषण, ये (वानर) ही रावण-रूपी भयकर अग्नि को बुझानेवाले महान् मेघ-पुज हैं ।
अत इनका आदर-सत्कार करो तथा विपुल धन-सपत्ति से इन्हें पुरस्कृत करो ।' तब
विभीषण ने बडी प्रीति से धन, वस्त्र, योग्य आभूषण तथा स्वर्ण आदि मँगाकर राम के समक्ष
ही उन वानरो को क्रमश भेंट किये । उसके पश्चात् राम ने अपनी पत्नी तथा अनुज के