रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 485, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंअसंख्येय, नवाभरण, श्रेष्ठ वस्त्र, स्वर्ग और रत्नो से युक्त राज्य तुम्हें भेंट दूँ, तो भी
वह तुम्हारे वीरतापूर्ण कार्यों के लिए अल्प ही होगे । हे पवनपुत्र, तुम्हारे कार्य से मैं
अपने मन में बहुत संतुष्ट हूँ ।'
सीता की बातें सुनकर हनुमान् अत्यत हर्ष से कहने लगा--'हे माता ! आप मुझपर
इतनी करुणा-पूर्ण दृष्टि रखती है और मेरा इतना आदर करती है, यही मेरे लिए पर्याप्त है ।
सच तो यह है कि (आपका आदर प्राप्त करना ) इन्द्र-पद या किमी दूसरी वस्तु
से भी महान् है । तब भूमिसुता ने हनुमान् को देखकर कहा--'हे अनघ ! तुम्हें बल,
शौर्य, पराक्रम, अपार तेज, क्षमा, ज्ञान, उदारता, स्थैर्य, सतत निश्चल स्वामिभक्ति, विनय
आदि विश्रुत गुण प्राप्त हो ।' इसके पश्चात् हनुमान् ने उस देवी के निकट रहनेवाली
भयंकर आकारवाली राक्षसियो को देखकर कहा--'उस पापात्मा की आज्ञा का पालन करती
हुईं ये पापी स्त्रियाँ कदाचित् आपको हानि पहुँचायेंगी । मैं अभी इन्हें अपनी कठोर मुष्टि-
प्रहार से मार डालता हूँ ।' तब जानकी ने हनुमान् को देखकर कहा--'बाण चलानेवाले के
रहते हुए भला बाण को दोषी ठहराना क्या उचित है ? दासियो का वध करना कदापि
उचित नही । मैंने अपने पापो के फलस्वरूप यह सब विपत्ति पाई । इसके लिए ये कैसे
दोषी हो सकती है ? हे पुण्यचरित, महान् व्यक्ति पापियो पर भी दया दिखाते है ।
अत हे वानरोत्तम, इन राक्षसियो का मारना तुम्हारे लिए उचित नही है ।' तब हनुमान् ने
कहा--'हे देवी ! आप निर्मल गुण-रत्नो की निधि है । आप राम की धर्म-पत्नी बनने के
योग्य है । अब मुझे राम की सेवा में जाने की आज्ञा दीजिए ।' तब उस देवी ने कहा--
'हे वानरोत्तम, अबतक उन्ही को मैं अपनी आत्मा मानकर अपने प्राण रोके हुई हूँ ।
अब मैं उन्हें देखे बिना एक क्षण भी नही जी सकती । यह बात मेरे प्रभु को बतलाना ।
अब तुम जाओ ।' इस प्रकार कहने के पश्चात् उन्होने हनुमान् को आशीर्वाद दिया ।
हनुमान् ने बडी भक्ति से उन्हें प्रणाम किया और राम भूपाल के निकट पहुँचकर अत्यत
विनय से निवेदन किया कि हे देव, मैने आपकी विजय तथा कुशल का वृत्तांत देवी सीता
से निवेदन किया, तो वे बहुत हर्षित हुई । उन्होने मुझसे कहा कि तुम मेरी ओर से प्रभु
से निवेदन करना कि मैं उनके दर्शनो की अभिलाषिणी हूँ ।
१५४. राम के आदेश से विभीषण का सीता को लिवा लाना
तब राम ने थोडी देर तक मन-ही-मन सोचा और विभीषण को बुलाकर कहा--
'हे विभीषण ! तुम शीघ्र जानकी के मगल-स्नान का प्रबन्ध करो और दिव्य वस्त्राभरण
एव पुष्प-मालाओ से अलकृत कराके उन्हें यहाँ लिवा लाओ ।' तब उसने बडे हर्ष से
जाकर सरमा आदि अपने अन्त पुर की स्त्रियो से सारी बातें समझाकर जानकी को लिवा
लाने का आदेश दिया । वे भी बडी प्रीति से सीता के पास गई और उन्हें बडी भक्ति
के साथ प्रणाम करके कहा--'हे देवी, आपके पति राम देव ने विभीषण को, आपको
लिवा लाने की आज्ञा दी है । इस हेतु उन्होने हमें आपकी सेवा में भेजा है । आप प्रसन्न
होकर अभीष्ट मगलदाता राम के समक्ष पधारें । हे सुन्दरी, आप यह वेश तज दीजिए ।
आप तो शुभ-प्रदायिनी हैं ।' इस प्रकार कहने के पश्चात् उन्होने उनका मंगल-स्नान कराया,