रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 504, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंअलकार किया और कर्पूर, ताम्बूल, चन्दन आदि सब को बाँट दिये । फिर, अत्यन्त प्रसन्नता
एव प्रीति से सकल भृत्य एवं अमात्यों के साथ राजसभा में बैठे ।
उसी समय निद्रा देवी सौमित्र को अपने वश कर लेने का उपक्रम करने लगी । सभा में
राम के समक्ष बैठे हुए लक्ष्मण यह देखकर जोर से हँसने लगे । तब राम, सीता, विभीषण,
सुग्रीव, हनुमान्, अगद, नल, नील, शरभ, सम्पाद, तार आदि वानर तथा शत्रुघ्न, भरत आदि ने
अपने-अपने कलक की बात सोचकर अपने सिर झुका लिये । तब राम ने सब की यह दशा देखकर
अपने अनुज से कहा—'हे लक्ष्मण, तुम अकारण ही क्यों हँसे ? इसका क्या अभिप्राय है बताओ ।'
तब लक्ष्मण ने भयभीत हो हाथ जोडकर कहा—'हे देव, जब में आपकी सेवा करते
हुए वन में आपके साथ रहने लगा, तब निद्रा मुझ पर अपना प्रभाव डालने लगी । तव मैने
उससे कहा कि तुम चौदह वर्ष तक मेरे पास मत आओ । मेरी बात मानकर वह चली गई ।
चौदह वर्ष समाप्त होते ही वह फिर लौटकर मेरे पास आई । हे देव, यही सोचकर में हँसा
और यही मेरे हँसने का मूल कारण है । हे दयासमुद्र, में आपके चरणों की सौगध खाकर कहता हूँ,
इसके सिवा मेरे हँसने का और कोई कारण नहीं है ।' तब सब लोगो के मन की शंकाएँ
दूर हुईं और सभी प्रसन्न हुए ।
करुणामूर्त्ति राम ने सब वानरों को देखकर कहा—'सभी कार्यों में सदा किसी भी धर्म
की अपेक्षा किये बिना, उनका आचरण करते रहो ।' इतना कहकर उन्होंने उन्हें बडे आदर से कई
प्रकार के उपदेश देकर प्रिय वचनो से जाने की अनुमति दी । उसके पश्चात् उन्होने
अनिलकुमार, सुग्रीव आदि प्रमुख वानरो को तथा विभीषण को विदा किया । सुग्रीव आदि
वानर प्रसन्नचित्त हो किष्किंधा लौट गये । विभीषण भी राक्षसों के साथ बडे उत्साह से लका
लौट गया ।
राम ने मनस्वी सौमित्र एवं भरत को युवराज बनाया और विशाल राज-वैभव का
अनुभव करते हुए, सीता के साथ समस्त सुखो को भोगते हुए राज्य करने लगे । वे अपने
पूर्वजो की अपेक्षा अधिक वेद-विहित धर्मों का आचरण करते हुए, कई प्रकार के अनुष्ठान
आदि करते थे । उन्होंने अश्वमेव तथा वाजपेय आदि कई श्रेष्ठ यज्ञ करते-हुए, देवता और
भूसुरों की रक्षा करते हुए परिपूर्ण रूप से धर्मनिष्ठ हो, ग्यारह सहस्र वर्ष तक पृथ्वी का पालन
किया । उनके राज्य में प्रजा को कोई दुःख नही था, अकाल और पाप कही नही था, सत्य
तथा धर्म नष्ट नहीं होते थे और सभी जन परहित-रत थे ।
इस प्रकार, आन्ध्र-भाषा का सम्राट्, काव्य, आगम आदि के प्रशंसनीय ज्ञाता, आचार-
वान्, अपार धैर्य-सपन्न, भूलोक-निधि, गोनबुद्ध भूपाल ने सुन्दर गुणो से सम्पन्न, धैर्यवान्,
शत्रुओं के लिए भयंकर, महात्मा, महान्, दयालु तथा ललित सद्गुणालकार अपने पिता विट्ठल-
नरेश के नाम पर, अनुपम तथा ललित शब्द एवं अर्थ से सम्पन्न, रामायण के इस युद्धकांड
की, श्रेष्ठ अलंकार एव सुन्दर भावो से परिपूर्ण बनाकर, इस प्रकार रचना की, कि वह इस ससार
में आचन्द्रार्क अत्यन्त पूजनीय हो, शोभायमान होता रहे ।
रसिकजनो के लिए आनन्ददायक, इस प्रसिद्ध तथा आर्ष आदि काव्य का पठन जो कोई करेगा,
या जो इसका श्रवण करेगा, उसे सामवेद आदि विविध वेदो का आधार राम-नाम-रूपी चिन्तामणि के