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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

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पृष्ठ 503

युद्धकांड ४७५
अपने निकट बुलाकर उसे ललित दिव्याम्बर आभूषण तथा स्वर्ण-कुसुमो की माला दी, अगद को
अमूल्य रत्न-जटित स्वर्ण-अगद (केयूर) दिये, पुण्यात्मा विभीषण को अमूल्य केयूर एव मुकुट
दिये । नील को लोल कान्तियो से विलसित नील मणियो का और नल को नव-रत्नो
का सुन्दर हार दिया । उसके पश्चात् प्रसन्नचित्त हो राम भूपाल ने सभी वानरो को देख-देख-
कर, एक को भी छोडे विना, सबको दिव्य वस्त्र तथा आभूषण दिये । फिर, उन्होने सीता को
शरच्चन्द्र से भी उज्ज्वल कान्तियुक्त मणिमय हार दिया । किन्तु सीता ने उसे पहना नही,
किन्तु वह उस उपहार को हाथ में लिये साभिप्राय दृष्टि से रामचन्द्र के मुख की ओर देखने
लगी । उनकी दृष्टि का अभिप्राय समझकर चतुर राम ने अनुमति दी, तो उन्होने अपने
कृपा-रस से सींचते हुए उस हार को हनुमान् के कठ में पहना दिया । उस पवित्र हार को
धारण कर वह पुण्यात्मा पवन-पुत्र, शरत्काल के बादलो से घिरे हुए मेरु पर्वत की भांति
सुशोभित होने लगा ।
उसके पश्चात् वसिष्ठ की आज्ञा से राम अन्त पुर में गये और क्रमश अपनी सभी
माताओ को प्रणाम किया । सभी माताओ ने बडे स्नेह से उन्हें आशीर्वाद दिये । सीता ने भी
अपनी सासो को बडी भक्ति से प्रणाम किया । तव उन्होने सीता को हृदय से लगाकर
आशीर्वाद दिया—'तुम लक्ष्मी के सदृश, सरस्वती की भांति, पार्वती के समान पति-भक्ति,
सुमति, सौभाग्य, तेज एव अतुल कीर्त्ति से सम्पन्न होती हुई, सूर्य-चन्द्र के समान तेजस्वी पुत्रो
की माता बनो ।'
१६९. मित्रों को प्रीतिभोज देना
उसके पश्चात् रघुकुलाधिप बडे उल्लास से भोजनालय में गये । उन्होने मित्रो,
वधुओ, अनुजो तथा रवि-पुत्र आदि वानरो, विभीषण आदि दैत्य-वीरो एव पवित्रात्मा गुह
आदि लोगो को बडे स्नेह से बुलवा भेजा और उन्हें उचित आसनो पर बिठाया । बडे स्नेह
से सच्चरित्र हनुमान् को अपने साथ बैठकर भोजन करने के लिए कहा । (जब सब लोग
उचित आसनो पर उपस्थित हुए), सुन्दरियो ने प्रत्येक के आगे सोने के थाले लगाये और
पायस, भात, दाल, मिष्टान्न, बढिया सूखा शाक, विविध स्वादिष्ट शाक, कई प्रकार की चटनियां
शिखरन, अँचार, ताजा घी और मीठे फल आदि परोसे । तब सूर्यवंशाधीश ने दुगुनी प्रीति
से हनुमान् से कहा—'हे अनिलकुमार, भोजन प्रारंभ करो ।' इतना कहकर उन्होंने स्वय एक
कौर ग्रहण किया । तब हनुमान् ने अत्यन्त भक्ति से उस थाल को, जिसमें रामचन्द्र ने भोजन
प्रारंभ किया था, उठाकर अपने सिर पर रख लिया और आनन्दातिरेक से नृत्य करते हुए
कहने लगा—'हे वानरो, आओ । राम के थाल का प्रसाद प्रचुर मात्रा में हम सब को मिल
गया है ।' यो कहते हुए उसने सामने के अगस्त्य वृक्ष पर चढकर उसके पत्ते तोड लिये और
उन पत्तो में उस प्रसाद को रखकर वडी भक्ति से सभी वानर-वीरो को बाँटा । वे भी उस
प्रसाद को ग्रहण करके अत्यन्त सन्तुष्ट हुए । यही कारण है कि उस दिन से अगस्त्य वृक्ष के पर्ण
एकादशी (पारण) के लिए बहुत ही मुख्य माने जाते है ।
रघुराम ने, अजना-सुत (हनुमान्) की भक्ति से अत्यन्त सन्तुष्ट हो, दूसरा थाल मँगवा-
कर भोजन तथा जल ग्रहण किया । तदनतर उन्होने सुगन्ध-पुष्पो की मालाओ से सब लोगो का