रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 487, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंराम के इन निष्ठुर वचन-बाणों के लगने से सीता तिलमिला उठी । वह कमलाक्षी
सद्य प्राप्त आनन्द को भूल गई और अवाक् एवं स्तम्भित-सी रह गई । क्षोभ, दुःख एवं
क्रोध से अभिभूत हो, वे रामचन्द्र को देखकर गद्गद कंठ से कहने लगी—'हे देव, क्या आप
मेरा हृदय नहीं जानते ? क्या, आप सर्वज्ञ एवं मनीषी नहीं हैं ? बाल्यावस्था में आप मुझे
ले आये और तब से मेरा पालन-पोषण तथा रक्षण करते रहे । आप ऐसे कठोर वचनों से
मुझे क्यों दुःखी बना रहे हैं ? मैं कहाँ, आप कहाँ और आपके ये वचन कैसे ? मैंने भू-
माता के गर्भ से जन्म लिया, उसके पश्चात् महाराज जनक ने मुझे पाल-पोसकर बड़ा
किया, फिर आप-जैसे नृप-शिरोमणि की पत्नी हुई । क्या, चंचल चित्तवाली स्त्रियों का-सा
व्यवहार मेरे लिए कभी सह्य हो सकता है ? पुरुष, अविश्वसनीय स्त्रियों के प्रति जैसे वचन
कहते हैं, वैसे वचन आप मेरे प्रति कह रहे हैं । क्या, यह आपके लिए उचित है ? यदि
आपको मुझपर विश्वास नहीं था, तो जिस दिन मेरा पता जानने के लिए हनुमान् को भेजा था,
उसी दिन कहला भेजते, तो उसी दिन मैं अपनी सभी आशाओं को तजकर प्राण
त्याग देती ।'
इसके पश्चात् सीता ने लक्ष्मण को देखकर कहा—'हे अनघ, तुम्हारे अग्रज मुझपर
संदेह करके मेरे प्रति परुष वचन कह रहे हैं । क्या मेरे प्रति ऐसा व्यवहार उचित है ?
क्या, ऐसी बातें वे मुझे कह सकते हैं ? क्या, तुम्हें उनसे यह कहना नहीं चाहिए कि ऐसे
वचन कहना उचित नहीं है ? मेरा आचरण देखते हुए, क्या, तुम मुझमें किसी पाप का
अनुमान कर सकते हो ?'
१५६. सीता का अग्नि-प्रवेश
वे आगे कहने लगीं—'अब शंका मत करो । तुम भली भाँति विचार करो और
यदि तुम लोगों का यही निश्चय है, तो यहाँ चिता सजाओ । मैं सबके समक्ष, बिना
विचलित हुए अग्नि में प्रवेश करूँगी । अग्नि के द्वारा मैं अपनी पवित्रता का प्रमाण दूँगी
और ब्रह्मादि देवताओं की प्रशंसा प्राप्त करते हुए भूमि में प्रवेश कर जाऊँगी ।'
तब लक्ष्मण ने बड़ी व्याकुलता से अपने अग्रज की ओर देखा और उनके मन के
भावों को समझकर सीता के लिए चिता का प्रबन्ध किया । तब सीता ने बड़ी भक्ति से
चिता की परिक्रमा की और उसकी स्तुति करके, उसे प्रणाम किया । फिर, अग्निदेव के
समक्ष खड़े होकर हाथ जोड़े हुए वे कहने लगी—'हे धर्मादि देवताओ, हे धर्मों, हे निर्मला-
त्माओ, हे नियतात्माओ, हे जगत् के अधिष्ठाताओ, हे सूर्य-चन्द्र, हे वेदसाधको, हे वेदों,
हे महात्माओ, हे सर्वज्ञो, हे पञ्चभूतो, हे परहितात्माओ, हे श्रेष्ठ नरो, हे श्रेष्ठ किन्नरो,
हे सुरवरो, हे भूसुरवरो, हे कृपालुओ, हे दिक्पालो, हे सन्मतियो, हे पापसंहारको, मैंने
मन-वचन-कर्म से राजा राम के सिवा और किसी का स्मरण नहीं किया है । यदि मैंने
ऐसा किया हो, तो मैं इस अग्नि का सहन नहीं कर सकूँगी और सब के समक्ष इसी अग्नि
में भस्म हो जाऊँगी ।' यों कहती हुई सीता ने आकाश तक व्याप्त होनेवाली अनुपम
आकार की भयंकर ज्वालाओं से युक्त प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश किया । अग्नि-कुण्ड में
अविचल खड़ी रहनेवाली सीता किंचित् भी नहीं जली । कर-चरण-आनन-रूपी कमल, वय-