सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 501, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 501

भरत ने हनुमान् की बातो से अत्यन्त हर्षित होकर, शत्रुघ्न से कहा--'हे शत्रुघ्न,
तुम तुरन्त अयोध्या में जाकर सर्वत्र मगलोत्सव की घोषणा करा दो । राज-सभा-भवन में
राम के सेतु-बन्धन आदि के चित्र बनवाओ । देव-गृहो, भूदेव-गृहो (ब्राह्मण-गृह) का
अलंकरण, तुम स्वय अपने समक्ष कराओ, नगर-मार्ग को श्रेष्ठ तोरणो तथा ध्वजाओ से
सजाओ । युवतियो के द्वारा मोतियो से (घरो के आगे) चौक पुरवाओ, सभी घरो में
सुन्दर वस्तुएँ वितरित कराओ । और, सभी नगर-वासियो को सुन्दर वस्त्राभूषणो से
सुसज्जित रहने का आदेश दो । श्रीराम के आगमन का शुभ समाचार निकटवर्त्ती देशो के
राजाओ के पास भेजो और गज-तुरगो की विपुल ध्वनि किये विना चतुरगिणी सेना तथा
मंत्रियो को साथ लेकर माताओ की सेवा में तुम शीघ्र यहाँ लौट आओ ।'
भरत का आदेश प्राप्त करके अनघ शत्रुघ्न अत्यन्त वेग से अयोध्या में गये और बडे
उल्लास के साथ राघव के आगमन का शुभ समाचार अपने सभी वधु-जनो को सुनाया,
कौशल्या से कहा, कैकेयी से कहा और फिर सुमित्रा को कह सुनाया । फिर, उन्होने भरत
के आदेशानुसार नगर को सजवाया और अकलक रीति से अन्त पुरो का अलंकरण कराया,
चन्दन एव कर्पूर से सुगन्धित जल आँगनो में छिडकवाया और नगर-वीथियो में नव-रत्न-
तोरण बँधवाये । तब महात्मा वसिष्ठ आदि मुनि, पुरोहित, मुनि-पत्नियां, माताएँ, बन्धु-जन,
मंत्री, मित्र, स्त्रियाँ, नगर-निवासी तथा वृद्ध-जन, कुछ रथो में, कुछ पालकियों में, कुछ
अश्वो पर, कुछ गजो पर आरूढ हो चल पडे । शत्रुघ्न पंच महावाद्यों के रव के साथ
सभी को साथ लेकर भरत की सेवा में पहुँच गये ।
१६६. भरत-मिलाप
भरत अपनी माताओ, अनुज तथा सेना के साथ राम की अगवानी करने के लिए,
अत्यधिक उल्लास से चले । तब हनुमान् ने भरत से कहा--'हे अनघ, वह देखिए । राघव
भरद्वाज मुनि के आश्रम से आ रहे है । वही पुष्पक है । वहाँ देखिए, वे ही राम है ।
वही कपि-सेना है । वह सुनिए, वानरो के सरयू नदी को पार करने की ध्वनि सुनाई
पड रही है ।' भरत विमान को देखकर फूले नही समाये और जहाँ उस पुष्पक को देखा,
उसी स्थान पर वह बडी भक्ति से भाई को साष्टाग प्रणाम किया । फिर, उदयाद्रि पर
प्रकाशमान होनेवाले उदयोन्मुख सूर्य की भांति अपनी प्रभा को दसो दिशाओ में विकीर्ण
करते हुए पुष्पक पर आरूढ, पुण्यात्मा रघुराम के निकट पहुँचकर उन्हें प्रणाम किया ।
तब राम ने पुष्पक को पृथ्वी पर उतारा और लक्ष्मण के साथ बडे हर्ष से एक-एक
करके अपनी माताओ को प्रणाम किया । माताओ ने आशीर्वादि देकर उन्हें हृदय से लगाया ।
उसके पश्चात् भरत एव शत्रुघ्न ने बडी भक्ति से राम, सीता तथा लक्ष्मण को प्रणाम किया।
राम ने उन्हें हृदय से लगाकर आशीर्वादि दिया । फिर, सीता ने बडी प्रीति एव श्रद्धा से
अपनी सासो को प्रणाम किया, तो उन्होने अलग-अलग उन्हें हृदय से लगाकर आशीर्वादि
दिये । राम-लक्ष्मण ने बडी भक्ति से मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ को प्रणाम किया, तो उन मुनि ने
उन राजपुत्रो को आशीर्वाद देकर बडे स्नेह से उनका आलिंगन किया । भरत तथा शत्रुघ्न ने
संतुष्ट हृदयो से अपनी माताओ को प्रणाम किया और राम के पीछे भक्ति-युक्त हो रहनेवाले