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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 500, कुल 508 में से

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पृष्ठ 500

आगे बढे और जनस्थान में राक्षसराज की वहन शूर्पणखा की नाक और कान काटे ।
उसके वाद उन्होने खर, दूषण आदि चौदह सहस्र राक्षसो का सहार किया और वहाँ (पच-
वटी में) पर्णशाला बनाकर रहने लगे । वहाँ रहते समय राक्षसराज रावण की प्रेरणा से
मारीच नामक मायावी राक्षस सुन्दर स्वर्ण-मृग का रूप धारण किये हुए वहाँ दिखाई पडा । तब
मृगनेत्री सीता ने उस मृग को देखकर राम से कहा--'हे नाथ मुझे यह मृग बहुत प्रिय
लग रहा है । आप इसे अवश्य ला दीजिए ।' राघवेस्वर ने चाप लेकर पीछा किया और
निदान उसपर तीक्ष्ण वाण चलाया, तो वह कुटिल राक्षस--'हाय लक्ष्मण ! हाय लक्ष्मण !'
कहकर आर्त्तनाद करते हुए गिर पडा । यह आर्त्तस्वर सुनकर साध्वी सीता ने भय से
व्याकुल होकर लक्ष्मण को भेज दिया । तब मुनि-वेष धरकर रावण वहाँ आया और
सीता को वलात् उठाकर ले जाने लगा । तब जटायु ने इसे देखा । उसने रावण को
रोका, तो रावण ने उसके साथ युद्ध करके उसे परास्त करके मार डाला । उसने समुद्र
पार किया और लका के अपने उद्यान में सीता देवी को वंदिनी बनाकर रखा । जब रामचन्द्र
मायामृग का वध करके क्लान्त हो लौटने लगे, तब उन्होने मार्ग में लक्ष्मण को देखा ।
तुरन्त उन्होने व्याकुल हो लक्ष्मण से पूछा कि सीता को अकेली छोडकर यहाँ क्यो आये ?
दोनो भाई शीघ्र पर्णशाला में लौट आये । किन्तु वहाँ सीता को न देखकर वे अत्यन्त
शोकाभिभूत हो गये । फिर, सीता की खोज करते हुए वे दोनो वनो में से होकर जाने लगे ।
मार्ग में उन्होने रावण के वाहुबल से कटकर पृथ्वी पर गिरे हुए जटायु को देखा । जटायु
से उन्हें विदित हुआ कि दशकंठ उसकी ऐसी दशा करके सीता को ले गया है। फिर, उस
विहंगेश की दाह-क्रिया करके वे जगलो में भटकते हुए जाने लगे । ऋष्यमूक पर पहुँचकर
उन्होने सुग्रीव से मित्रता की । राम ने सुग्रीव के लिए वालि का सहार किया और तारा
के साथ वानर-राज्य सुग्रीव को प्रदान किया । सुग्रीव बड़े हर्ष से सीता के अन्वेषणार्थ दो
लाख असमान वलगाली तथा यशस्वी वानरो को प्रत्येक दिशा में भेजा । वानर दत्तचित्त
हो सीता का अन्वेषण करने लगे, तो सपाति ने उन्हें बतलाया कि सीता लका में है ।
तुम चिन्ता मत करो । मैं जैसा कहता हूँ वैसा करो । मैं ने सपाति के परामर्श से सौ
योजन समुद्र को पार करके अशोक-वन में शोक-सतप्त हो रहनेवाली वैदेही के दर्शन किये ।
उन्हें रामचन्द्र की मुद्रिका दी। उस देवी से चूडामणि प्राप्त की और उसे लाकर रामचन्द्र
को दिया । तब राम अत्यन्त प्रसन्न हुए और फिर समस्त वानर-सेना के साथ वे लका
पर आक्रमण करने के लिए चले, समुद्र पर सेतु को बांधा, लंका पर आक्रमण किया और
अपने प्रशंसनीय पराक्रम से लंकेश्वर का सहार किया और ससार का दुख दूर किया । फिर,
उन्होने पुण्यात्मा विभीषण को लका का राजा बनाया और पवित्रात्मा ब्रह्मादि देवताओ से
अनेक वर प्राप्त किये । तदनन्तर देवताओ के साथ आये हुए आपके पिता के चरणो में
प्रणाम करके, अग्नि-मुख से पवित्र घोषित की हुई सीता को स्वीकार किया । फिर, उन्होने
वानरो, राक्षसो, सुग्रीव, विभीषण, अगद आदि के साथ पुष्पक विमान पर आरूढ हो
लंका से प्रस्थान किया और सफल, विक्रम तथा यश से सुशोभित होते हुए भरद्वाज मुनि
के आश्रम में पहुँचकर वहाँ ठहरे हुए हैं । वे अवश्य ही कल यहाँ पधारेंगे ।"