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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 497, कुल 508 में से

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पृष्ठ 497

युद्धकांड ४६७
दीखने वाला आश्रम अगस्त्य का है। वहीं शरभंग मुनि का आश्रम है और वह देखो महामुनि
अत्रि का आश्रम दीख रहा है । वही पर सती अनसूया ने तुम्हें प्रेम से अंगराग प्रदान
किया था । वही चित्रकूट पर्वत है, जहाँ भरत ने मुझसे (घर लौटने की) प्रार्थना की थी।
वहाँ देखो, अनतिदूर विमल काननों के मध्य यमुना सुशोभित हो रही है। वहाँ देखो, अनेक दिव्य
मुनि जिसकी सेवा करते हैं, ऐसी विमल तरंगावली से युक्त गंगा नदी प्रवाहित हो रही है । उसके
किनारे अनेक उद्यानों से परिपूर्ण शृंगवेरपुर विलसित हो रहा है । वही वह सुन्दर स्थान है, जहाँ
गुह बड़ी भक्ति के साथ हमसे मिला था । वह देखो, वही सरयू नदी है, जिसके तट पर
अनेक यूप-काष्ठ विलसित हैं । हे कमलाक्षी, विशाल पुण्य-राशि अयोध्या वहाँ दीख रही है,
उसे प्रणाम करो ।' इस प्रकार, जब राम ने सीता को संकेत से अयोध्या दिखाई, तब बड़े
कुतूहल से वानर एवं राक्षस उचक-उचककर उस सुन्दर नगर को देखने लगे, जो असंख्य
रत्नों, स्वर्ण-सौधों, असंख्य तोरणों, ध्वजाओं तथा बहुत-से गज, अश्व, रथ, पदाति-सेना से
युक्त हो अपार वैभव से विलसित होते हुए अमरावती के समान दीख रहा था ।
१६४ भरद्वाज मुनि का आतिथ्य
चौदह वर्ष की समाप्ति के पश्चात् शुक्ल पंचमी (पंचम) के शुभ दिन में राम
अविरत तेजस्वी भरद्वाज मुनि के आश्रम के निकट उतरे । वे पुष्पक को आकाश में ठहरा-
कर आप आश्रम में गये और उस मुनि के चरण-कमलों में अपना मस्तक झुकाकर प्रणाम
किया और बड़े हर्ष से मुनि के आशीर्वाद प्राप्त किये । उसके पश्चात् उन्होंने अत्यन्त
विनय के साथ कहा—'हे अनघ, बहुत समय से मुझे आपका कुशल-समाचार ज्ञात नहीं
हुआ था । वनवास में रहते हुए बहुत समय व्यतीत हो गया है। आप को, कद, मूल, फल,
जल आदि उपलब्ध होने में कोई कष्ट तो नहीं होता ? आप की तपस्या बिना विघ्न-
बाधा के सतत चल रही है न ?'
राम के विनयपूर्ण वचनों को सुनकर मुनि अत्यन्त प्रसन्न हुए । वे बोले—
'हे निखिल लोकाराध्य, जब तुम स्वयं यहाँ जन्म लेकर बड़ी निष्ठा से समस्त लोकों का पालन
करते हो, तब भला, कही किसी को कष्ट या कोई दुःख हो सकता है ? पुण्य-कर्म करने-
वालों को कही कोई विघ्न-बाधा हो सकती है ? हे सत्यनिष्ठ, तुम्हारे प्रसाद से हम अत्यंत
सुखी हो सभी धर्म-कार्य संपन्न करते, वेद-विहितअनुष्ठान का आचरण करते हुए तपस्या
करते हैं । वनवास के लिए जाते समय तुम यहाँ आये थे । यहाँ से जाने के दिन से फिर
आज लौटकर आने तक तुम्हारा सारा वृत्तांत मैंने अपनी दिव्य दृष्टि से जान लिया है ।
तुम्हारे किये हुए अद्भुत कार्य देवताओं के लिए भी असंभव हैं । तुम्हारे वन जाने
के दिन से ही समस्त सुख-भोगों का त्याग कर घन जटा-भार एवं वल्कल धारण किये हुए,
भरत अत्यन्त भक्ति से तुम्हारी पादुकाओं पर समस्त राज्य-भार डालकर राज्य चला रहा है।
आश्चर्यजनक श्रद्धा से वह तुम्हारे आगमन की प्रतीक्षा कर रहा होगा । अपने अनुज की
श्रद्धा का विचार करके तुम्हें वहाँ शीघ्र पहुँच जाना चाहिए । किन्तु हे अनघ, तुम वनवास
से थके हुए आये हो, अतः आज तुम हमारे आश्रम में विश्राम करो । कल प्रात काल ही
हम से विदा लेकर यहाँ से जाना । मैं प्रीतिभोज की व्यवस्था करता हूँ ।